जोधपुर की राजनीति इन दिनों किसी उफनती कड़ाही की तरह खौल रही है। बरसों तक कांग्रेस के भीतर सबसे भरोसेमंद समझे जाने वाले अंसारी ने अचानक ऐसा “चिरक” दिया कि पूरे शहर में चर्चा, घमासान और थू-थू की मिली-जुली आवाज़ें गूंज रहीं हैं। लंबे अरसे तक अशोक गहलोत के बेहद क़रीबी रहे सैय्यद अंसारी ने सोशल मीडिया पर जो आरोप लगाए, मुस्लिम समाज के वोट के दुरुपयोग से लेकर चुनाव हरवा देने जैसे गम्भीर आरोप। उन्होंने कांग्रेस के मारवाड़ी घराने में पहली बार इतनी तीखी खनक पैदा कर दी है।
गहलोत की राजनीति और शैली पर चाहे जितनी आलोचना होती हो, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि वे अपने साथ चलने वालों को संवारने, उनसे रिश्ते निभाने और वक़्त पर उनका साथ देने के लिए पहचाने जाते रहे हैं। जोधपुर की गलियों, चौराहों और चौपालों में यह चर्चा आज भी चलती है कि गहलोत ने जो अपने हाथ से पाला-पोसा, कंधे पर हाथ रख कर बराबरी की कुर्सी पर बैठाया। उन्हीं में से कई लोग आखिर में टिकट न मिलने पर उनसे टूट गए, बिछुड़ गए या नाराज़ होकर बाहर का रास्ता पकड़ लिया। राजेंद्र चौधरी हों, रामेश्वर दाधीच हों, पवन मेहता हों, या हालिया चुनावों में हनुमान खांगटा हर किसी की अपनी-अपनी कहानी है। उस सूची में अब सईद अंसारी का नाम भी जुड़ गया।
पर इस बार प्रतिक्रिया जरा ज़्यादा तेज़ है, क्योंकि अंसारी का आरोप बहुत बड़े सामाजिक समुदाय से जुड़ा है। उन्होंने लिखा कि गहलोत मुसलमानों का “केवल वोट के लिए उपयोग” करते रहे। उन्होंने यह भी कहा कि लगातार तीन चुनावों में टिकट तो मिला, पर सहयोग नहीं मिला, कार्यकर्ता संगठित नहीं हुए और गहलोत के करीबी नेताओं ने उनके हारने में भूमिका निभाई।
यहां सवाल उठता है, क्या चुनाव जीतने और हारने का पूरा भार किसी एक नेता पर डाल देना न्यायोचित है? टिकट, संसाधन और मंच मिल जाए तो उसके बाद जनता का दिल जीतना, बूथ प्रबंधन, मैदान में पसीना बहाना, अपनी लोकप्रियता बनाए रखना तो उम्मीदवार की ही जिम्मेदारी है। हर बार कम अंतर से हारना इस बात का संकेत है कि विपक्ष की साजिश से ज़्यादा कमज़ोरी कहीं और भी रही होगी।
कांग्रेस के भीतर से उठी प्रतिक्रियाओं में भी यह साफ झलकता है। सुपारस भंडारी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने जिस तरह का विस्तृत पत्र लिखकर अंसारी को आईना दिखाया, वह जोधपुर की आंतरिक राजनीति की तस्वीर को बहुत स्पष्ट करता है। भंडारी ने याद दिलाया कि 2018 में चौथी बार टिकट देने के लिए खुद गहलोत उतने ही उत्सुक थे, जितने अंसारी खुद। कैंसर डिटेक्ट होने के बाद भी गहलोत द्वारा तत्काल मदद, इलाज की चिंता और मानवीय भाव यह सब खुद अंसारी की ही जुबानी कभी सुना गया था। आज वही इतिहास पलट कर आरोपों के कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है।
जोधपुर आज यह प्रश्न पूछ रहा है,क्या यह नाराज़गी वाजिब है, या यह सिर्फ एक और असंतोष की कड़ी है जो टिकट न मिलने के बाद हर चुनावी मौसम में दिखाई देती है? क्या सचमुच गहलोत मुसलमानों को सत्ता में हिस्सेदारी नहीं देते, या यह अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों का तकनीकी हिस्सा है, जिसे मुद्दा बनाकर एक नाराज़ नेता ने हथियार की तरह इस्तेमाल किया?
सन्नाटा तो गहलोत की तरफ़ से भी कम दिलचस्प नहीं है। शहर भर में चर्चा होती रही, आरोप हवा में उड़ते रहे, बयानबाज़ी गर्म होती रही पर गहलोत की ओर से न कोई प्रतिवाद, न कोई सफाई। चेहरा जरूर बहुत कुछ कह गया, पर जुबान खामोश रही। यह वही राजनीतिक परिपक्वता है जिसने उन्हें राजस्थान की राजनीति में आज उस मुक़ाम पर पहुंचाया है, जहां वे कई बार के विद्रोह, असंतोष और ‘चिरक’ झेलकर भी खड़े रहे।
सच्चाई यह भी है कि राजनीति अपने साथ चलने वालों की परीक्षा हर मोड़ पर लेती है। कोई उम्मीदवार टिकट से जीतता है, कोई अपनी मेहनत से, कोई समुदाय के भरोसे से, और कोई अपने आचरण से। पर लगातार तीन बार हारकर भी टिकट को अपनी “मुस्लिम पहचान” के दुरुपयोग का प्रमाण मान लेना, यह शायद वही गलतफहमी है जिसे शहर आज खुलकर चर्चा में ले आया है।
जोधपुर में कांग्रेस के घर से उठी यह खनक एक पार्टी के भीतर का विवाद भर नहीं है। यह उस मनोविज्ञान का आईना है जिसमें व्यक्ति अपनी असफलता को बाहरी ताकतों से जोड़कर हल्का महसूस करता है। अंसारी का दावा है कि वे जीवन भर कांग्रेस में रहेंगे। यह अच्छी बात है लेकिन राजनीति में रहने के लिए रिश्तों की मर्यादा, वक्त की नजाकत और वफादारी के स्थायी मूल्य भी उतने ही जरूरी हैं।
आज जब कांग्रेस कमजोर दौर से गुजर रही है, तब इस तरह के घर-फोड़ बयान बाकी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मनोबल तोड़ते हैं। वफादारी पर सवाल उठाते हैं। यह वक्त पार्टी को मजबूत करने का है, न कि अतीत के कालीन को उलटकर अपने हिस्से की धूल निकालने का। फिलहाल जोधपुर में कांग्रेस के घर में बर्तन तो बज चुके हैं। अब देखना यह है कि पार्टी इस शोर में टूटती है या और मजबूत होकर उभरती है।
जिसे ऊपर उठाया था वही रूठ गया आज,
सियासत में यह किस्मत भी है और सबक भी।







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