पीके बिगाड़ेंगे किसका खेल
बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा सितम्बर में होने की उम्मीद है और राजनीतिक सरगर्मी चरम पर है। भाजपा ‘अब नहीं तो कभी नहीं’ की रणनीति पर काम कर रही है तो नीतीश कुमार सुशासन और महिला वोट बैंक के भरोसे...

बिहार चुनाव – तिकड़ी मुकाबले में किसके पाले में जाएगी जनता..?
राधा रमण,
वरिष्ठ पत्रकार
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बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा सितम्बर में किसी समय होने की संभावना है। ज्यादा उम्मीद प्रधानमंत्री के बिहार दौरे के बाद की है। प्रधानमंत्री तकरीबन हर माह बिहार आते- जाते रहते हैं। जहां जाते हैं, करोड़ों की सौगात बांटते हैं, लोक लुभावन घोषणाएं करते हैं। इस बार भाजपा बिहार में सरकार बनाने पर आमादा दिखती है। उसके लिए ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ की स्थिति है। फिलहाल प्रदेश में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है। उसके 80 विधायक हैं। भाजपा के लिए यह संख्या सर्वाधिक है। 243 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए कम से कम 122 विधायक चाहिए। सवाल यह कि बाकी के विधायक कहां से आएंगे? पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व में प्रवक्ता रहे डॉ विनोद शर्मा कहते हैं कि बिहार में इस बार एनडीए की लहर है। नीतीश कुमार की अगुवाई में सरकार ने समाज के हर तबके के लोगों को राहत पहुंचाई है। किसानों को 120 यूनिट बिजली मुफ्त मिल रही है, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय बढ़ा है। पत्रकारों, बुजुर्गों, विधवाओं और जेपी आंदोलन के मीसाबंदियों के पेंशन में दोगुनी से अधिक की बढ़ोतरी की गई है। सड़कें चकाचक हैं और नौकरियों की बहार है। जनता को और क्या चाहिए?
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इसमें दो राय नहीं कि बिहार की महिलाओं के सिर पर नीतीश का जादू सिर चढ़कर बोलता रहा है। यह वोट इस बार नीतीश के पक्ष में कितना जाएगा, यह चुनाव परिणाम के बाद पता चलेगा, क्योंकि बिहार के अधिकांश जिले बाढ़ की चपेट में हैं और करीब 17 लाख आबादी सड़कों और राहत केंद्रों में शरण लिए हुए है। इनमें सर्वाधिक संख्या महिलाओं और बच्चों की है। दूसरी तरफ राज्य में अपराधी पुलिस के रसूख को खुलेआम चुनौती दे रहे हैं। विपक्ष इसे एनडीए का जंगलराज बता रहा है। महिलाएं इस अराजकता से भी पीड़ित हैं। ऐसे में महिला वोटरों में बिखराव हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। राज्य में नीतीश की बिरादरी कुर्मी जाति का वोट करीब 6 प्रतिशत है, यह वोट भी अभी तक नीतीश के पक्ष में पड़ता रहा है। यही वजह है की नीतीश पिछले 20 वर्षों से अधिक समय से बिहार की सत्ता पर काबिज हैं।
गठबंधन का पूरा जोर
बिहार में महागठबंधन भी इस बार पूरा जोर लगाये हुए है। राज्य में महागठबंधन की वोटर अधिकार यात्रा निकाली जा रही है। इसकी शुरुआत 17 अगस्त से शेरशाह सूरी की धरती सासाराम से हो चुकी है। इसे जनता का अपार समर्थन मिल रहा है। यह यात्रा एक सितम्बर को पटना के गांधी मैदान में समाप्त होगी। इसमें महागठबंधन के सभी घटक दल शामिल हैं। बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के अलावा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी शहर-शहर घूम रहे हैं। विपक्ष राज्य से पलायन, बेरोजगारी और कानून व्यवस्था का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहा है। लोगों को नौकरी और डोमिसाइल नीति बनाने की बात कह रहा है। एसआईआर के खतरे के प्रति आगाह कर रहा है। सरकार बनने पर महिलाओं को ढाई हजार रुपये प्रतिमाह देने और सुशासन का ख़्वाब दिखा रहा है।
इस बीच बिहार के माउन्टेन मैन दशरथ मांझी के परिजनों के लिए गयाजी के गहलोर गांव में पक्का घर बनवाकर राहुल गांधी ने अपनी जय-जयकार करा ली है। दशरथ के बेटे भागीरथ मांझी इसके लिए नीतीश कुमार से लेकर जीतनराम मांझी और भाजपा के कई बड़े नेताओं का चक्कर लगाकर थक चुके थे। इससे आसपास के गांवों में भी राहुल के लिए हमदर्दी जगी है। देखने वाली बात होगी कि यह सहानुभूति वोट में कितनी तब्दील हो पाती है।
जनसुराज की गतिविधियां बढ़ी
बिहार की सियासत का तीसरा केंद्र बने प्रशांत किशोर (पीके) की पार्टी जनसुराज पर सबकी निगाहें टिकी हैं। एनडीए और महागठबंधन से समान दूरी बनानेवाले लोग आजकल पीके की तरफ खींचे चले आ रहे हैं। कहना न होगा कि ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है। इनमें रिटायर्ड आईएएस, आईपीएस की संख्या काफी है। इसके लिए प्रशांत किशोर बिहार के बाहर रहने वाले प्रवासियों के संपर्क में हैं। उधर, राज्य में जनसुराज की गतिविधियां लगातार जारी हैं। विधानसभा स्तर तक कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। पीके ने पलायन के मुद्दे को ठीक से पकड़ा है। वह कहते हैं कि बिहार की बदहाली में यहां के नेताओं की बड़ी भूमिका है। जब तक झारखंड राज्य नहीं बना था, बिहार की बदहाली कम दिखती थी। अब सरेआम हो चुकी है। वह मतदाताओं से कहते हैं कि इस बार का मतदान अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए कीजिए। बिहार में रोजी-रोजगार की व्यवस्था के लिए कीजिए। प्रशांत अपनी सभाओं में नीतीश और लालू दोनों को बिहार की बदहाली के लिए बराबर का जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कहते हैं कि पिछले 35 वर्षों से बिहार में इन्हीं दोनों का शासन रहा है। वह दोनों को नागनाथ और सांपनाथ बताते हैं। कहते हैं कि दोनों विषधर हैं, दोनों डंसते हैं। प्रशांत किशोर जाने-माने चुनावी रणनीतिकार रहे हैं। वर्ष 2014 के संसदीय चुनाव में नरेंद्र मोदी के चुनावी रणनीतिकार रहे थे। भाजपा को सत्ता में लाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। इससे उनकी लोकप्रियता और कमाई दोनों बढ़ी है। इस बार वह जनता दल (यूनाइटेड) और राष्ट्रीय जनता दल दोनों पर बराबर हमलावर हो रहे हैं। आश्चर्य यह कि प्रशांत किशोर पर जवाबी हमला जदयू और राजद कम बल्कि भाजपा ज्यादा कर रही है।
अर्श पर या फिर फर्श पर
पिछले दिनों चार सीटों के हुए उपचुनाव में जनसुराज तीन सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी। उसे 10 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले थे। पीके बताते हैं कि भाजपा को दस प्रतिशत वोट पाने में 20 साल लगे थे। उपचुनाव के समय हमारी तैयारी प्रीमैच्योर थी। तब भी इतने वोट मिले। वह कहते हैं कि ‘विधानसभा चुनाव में जनसुराज या तो अर्श पर रहेगी या फर्श पर रहेगी। बीच की गुंजाइश काफी कम है। अगर लोगों ने जाति-धर्म से हटकर मतदान किया तो हम अकेले अपने बूते पर सरकार बना सकते हैं।‘ लेकिन बिहार में जाति की राजनीति लंबे समय से जड़ जमाये है। वहां के लोग डॉक्टर और मास्टर भी अपनी जाति का ही खोजते हैं। ऐसे में प्रशांत की जनसुराज क्या गुल खिलाती है, यह समय बताएगा।
रोहतास जिले के बगेयां गांव निवासी सामाजिक कार्यकर्ता सूर्यकेश्वर सिंह कहते हैं कि प्रशांत किशोर बिहार के केजरीवाल बनने की जुगत में हैं। वह चुनाव जीतें अथवा नहीं लेकिन दोनों मुख्य गठबंधनों (एनडीए और महागठबंधन) का खेल जरूर खराब करेंगे।
इस बीच, गंभीर अपराधों में 30 दिन के लिए जेल जाने पर प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्रियों को पद से हटाने संबंधी बिल को कैबिनेट की मंजूरी और संसद में पेश कर केंद्र सरकार ने बड़ा दांव चल दिया है। अगर यह बिल कानून बन जाता है तो इसका देशव्यापी असर पड़ेगा और बिहार भी इससे अछूता नहीं रहेगा। यही कारण है कि विपक्ष इस बिल का पुरजोर विरोध कर रहा है। विपक्ष की यह आशंका निर्मूल नहीं है कि सरकार इसका इस्तेमाल विपक्ष की सरकारों को बर्खास्त करने के लिए करेगी। बिहार में विपक्ष के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव हैं। उन पर पहले से ही कई आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं। ऐसे में यह सवाल मौजूं है कि अगर केंद्र सरकार का बिल संसद से पारित होकर कानून बन जाता है और महागठबंधन बिहार में चुनाव जीत भी जाता है तो उसकी सरकार कितनी टिकाऊ होगी। वैसे यह कानून बनाने के लिए संसद के दोनों सदनों में सरकार को दो तिहाई बहुमत की दरकार पड़ेगी जो सरकार के पास फिलहाल नहीं है।






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