कुर्सी के लिए इस बार बढ़ेगी रार!
मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए राजस्थान में दावेदारी आमतौर पर दो ही चेहरों के बीच रही है। इनमें अशोक गहलोत स्थाई चेहरा रहे हैं, बाकी चेहरे बदलते रहे हैं। जैसे 1998 में प्रमुख दावेदार परसराम मदेरणा और...

राजस्थान कांग्रेस में इस बार बहुत कुछ दिलचस्प होने के संकेत
मनीष गोधा,
वरिष्ठ पत्रकार
राजस्थान में कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति आने वाले समय और खासतौर पर अगले विधानसभा चुनाव के दौरान दिलचस्प होती नजर आ रही है। राजनीति में हालांकि कब क्या समीकरण बन जाएं, अभी कहना थोड़ा मुश्किल होता है, लेकिन राजस्थान कांग्रेस में पहले जो कुछ होता रहा है और अभी जो कुछ चल रहा है, उससे आने वाले समय में प्रदेश की बड़ी कुर्सी यानी मुख्यमंत्री पद के लिए मचने वाली रार का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
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पिछले पांच-छह चुनाव की बात करें तो मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए राजस्थान में दावेदारी आमतौर पर दो ही चेहरों के बीच रही है। इनमें अशोक गहलोत स्थाई चेहरा रहे हैं, बाकी चेहरे बदलते रहे हैं। जैसे 1998 में प्रमुख दावेदार परसराम मदेरणा और अशोक गहलोत थे, 2003 में सिर्फ अशोक गहलोत ही थे। इसके बाद 2008 में सीपी जोशी और अशोक गहलोत थे, तो 2013 में फिर सिर्फ अशोक गहलोत थे। इसके बाद 2018 व 2023 में सचिन पायलट और अशोक गहलोत दावेदारी में थे, लेकिन 2028 में बड़ी कुर्सी का मुकाबला चतुष्कोणीय या बहुकोणीय होता दिख रहा है। यानी बड़ी कुर्सी के दावेदारों की जो रेस हमने पिछले चुनाव में भाजपा में होती देखी थी, वह इस बार कांग्रेस में नजर आ सकती है। इसके लक्षण अभी से नजर आने लगे हैं और यह तय मानिए कि कोई नाटकीय घटनाक्रम नहीं हुआ तो जैसे-जैसे समय गुजरेगा, यह लक्षण और गहरे होते जाएंगे।
जानिए कौन दिख रहे हैं दावेदार
प्रदेश की इस सबसे बड़ी कुर्सी के लिए यह आंकलन अभी थोड़ा जल्दबाजी लग सकता है, लेकिन राजनीति करने वाले और इन्हें देखने वाले जानते हैं कि पांच साल का समय बहुत ज्यादा नहीं होता। बड़े लक्ष्य के लिए तैयारी भी बड़ी करनी पड़ती है। यही कारण है कि कांग्रेस में इस बार पूर्व सीएम अशोक गहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट जैसे चेहरे तो हैं ही, लेकिन इनके साथ मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा और मौजूदा नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली भी नए दावेदारों के रूप में तेजी से आगे बढ़ते दिख रहे हैं।
जारी है गहलोत-पायलट का कोल्ड-वार
पूर्व सीएम अशोक गहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट के बीच खिंची तलवारें अभी म्यानों में नहीं लौटी हैं। दोनों के बीच कोल्ड-वार जारी है और इसका एक प्रमुख संकेत यह है कि पार्टी भले ही सत्ता से बाहर है, लेकिन दोनों नेताओं के बीच सामान्य मुलाकातें आज भी नहीं होती। पार्टी के कार्यक्रमों में मुलाकातें भले ही हो जाएं, लेकिन वे भी औपचारिक ही रहती हैं। दोनों के समर्थकों के बीच सोशल मीडिया पर बहस का दौर अभी कुछ थमा हुआ नजर आ रहा है, लेकिन यह तय है कि समय बीतने के साथ यह फिर तेज होगा।
डोटासरा-जूली के बीच दिख रही खींचतान
हाल में सम्पन्न हुए विधानसभा के बजट सत्र के दौरान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के बीच सदन में वर्चस्व की लड़ाई साफ तौर पर नजर आई। एक आसानी से खत्म किए जाने वाले मुद्दे को लेकर डोटासरा ने ऐसा हंगामा कराया कि पहली बार राज्यपाल के अभिभाषण पर नेता प्रतिपक्ष का भाषण नहीं हो पाया और बाद में जब स्पीकर से टकराव के मामले में डोटासरा फंसे तो उनकी नाराजगी के बावजूद जूली गतिरोध खत्म करने को राजी हो गए। इस पर डोटासरा ऐसे नाराज हुए कि फिर सदन में ही नहीं आए।
यह सिर्फ कुछ दिखती हुई स्थितियां हैं, अंदरखाने तो और भी बहुत कुछ चल रहा है, लेकिन ये दिखती हुई स्थितियां संकेत दे रही हैं कि जैसे- जैसे चुनाव का समय नजदीक आएगा, बड़े नेताओं की यह दरारें और गहरा सकती हैं। कांग्रेस के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि यहां कार्यकर्ता पार्टी से ज्यादा नेता के वफादार होते हैं। यह हम पहले कई बार देख चुके हैं और गहलोत-पायलट संघर्ष में तो साफ तौर पर देख चुके हैं। यह समस्या इस बार भी खत्म होती नजर आ नहीं रही और यही कारण है कि अभी भले ही बड़ी कुर्सी की लड़ाई का आंकलन थोड़ा समय से पूर्व लग रहा होगा, लेकिन राजनीतिक संकेतों का नियमित अध्ययन करते रहना चाहिए।
दावेदारों का दम
आइए अब जानने की कोशिश करते हैं कि ये दावेदार हैं कितने दमदार, यानी किस दम पर इनकी दावेदारी नजर आ रही है-
अशोक गहलोत – अभी भी पूरा दम
जैसा हमने पहले बताया कि 1998 से लेकर पिछले चुनाव तक दावेदारों में अशोक गहलोत स्थाई रहे, बाकी बदलते रहे। वैसा ही इस बार भी है। उम्र के कारण कुछ लोग उनकी दावेदारी कमजोर मान रहे हैं, लेकिन प्रदेश के मुद्दों को लेकर आज भी वे जितने सक्रिय हैं, उतना कांग्रेस का कोई दूसरा नेता नजर नहीं आता। पिछले दिनों एक बार फिर वे यह बात दोहरा चुके हैं, ‘मैं जब तक जिंदा हूं प्रदेश की लोगों की सेवा करते रहना चाहता हूं।’ उनका यह बयान जाहिर करता है कि उम्र को वे आज भी कोई बाधा नहीं मानते और राजनीति में उनके जितना माहिर खिलाड़ी कोई है नहीं। ये बात वे अनगिनत बार साबित कर चुके हैं। आलाकमान का भरोसा उन पर आज भी कायम है। यही कारण है कि आपरेशन सिंदूर की प्रेस कांफ्रेंस के लिए उन्हें दिल्ली बुलाया जाता है। चर्चा यह भी है कि आने वाले दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी जिम्मेदारी उन्हें मिल सकती है। बाकी उन्हें नजदीक से जानने वाले यह मानते हैं कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनकी दावेदारी तभी खत्म होगी, जब वे खुद चाहेंगे और खुद वे कई बार कह चुके हैं कि ‘मैं तो छोड़ना चाहता हूं, लेकिन यह कुर्सी मुझे नहीं छोड़ती।‘
सचिन पायलट – लोकप्रियता में कोई कमी नहीं
प्रदेश में जो लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं या यू-ट्यूब प़त्रकारिता करते हैं वे सचिन पायलट की लोकप्रियता को जम कर भुनाते हैं। पायलट के बारे में सोशल मीडिया पर आप कुछ भी लिखिए, वह मिनिटों में वायरल होता है और यह बताता है कि युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता किस हद तक है। उन्होंने 2014 में पार्टी की कमान तब सम्भाली जब पार्टी का ग्राफ गर्त में था और वहां से वे पार्टी को सरकार बनाने की स्थिति में ले आए। इसके आगे की कहानी सब जानते हैं, लेकिन आज तक उन्होंने जिस तरह का धैर्य रखा है, उसकी तारीफ एक बार स्वयं राहुल गांधी कर चुके हैं। पायलट आज भी राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं और प्रदेश में भी पूरी तरह सक्रिय हैं और पार्टी में अपने कद के चलते इस बार सबसे बड़े दावेदार वही माने जा रहे हैं।
गोविंदसिंह डोटासरा – टशन में कोई कमी नहीं
गहलोत सरकार की राजनीतिक आपदा ने गोविंदसिंह डोटासरा को जो अवसर दिया, उसे उन्होंने बेकार नहीं जाने दिया। वे पिछले पांच साल से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं और इस दौरान उन्होंने खुद को दमदार नेता के रूप में पार्टी और प्रदेश में स्थापित कर लिया है। पार्टी में सक्रिय नहीं रहने वालों को वे पूरे दम से चेतावनियां देते हैं और विपक्ष पर बेहद तीखे हमले करते हैं। इस दौरान पार्टी हालांकि विधानसभा चुनाव हारी, लेकिन हार बहुत बुरी नहीं थी और पार्टी ने 70 का आंकडा छू लिया। वहीं भाजपा के अबकी बार चार सौ पार के नारे के बीच वे लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को 8 सीटें दिलाने में कामयाब रहे। उनका गमछा डांस सोशल मीडिया पर छाया हुआ है और प्रदेश के सबसे बड़े जाट वोट बैंक वे बड़े स्थापित नेता बन चुके हैं। हालांकि यह उनके लिए एक बाधा भी है, लेकिेन इसमें कोई शक नहीं है कि डोटासरा इस कुर्सी पर कायम रहते हैं तो आने वाले समय में बड़ी कुर्सी के प्रबल दावेदार होंगे।
टीकाराम जूली – धीरे-धीरे पकड़ बनाता चेहरा
नेता प्रतिपक्ष के पद पर टीकाराम जूली की नियुक्ति एक राजनीतिक समीकरण के चलते हुई थी और उनके नाम पर आश्चर्य भी व्यक्त किया गया था, क्योंकि जूली गहलोत सरकार में एक मंत्री से ज्यादा बड़ी पहचान नहीं रखते थे, लेकिन पिछले डेढ़ साल में विधानसभा और विधानसभा के बाहर उन्होंने अपने प्रदर्शन से खुद को प्रदेशव्यापी पहचान रखने वाले नेता के रूप में स्थापित कर लिया है। विधानसभा में सहज और सरल अंदाज में सरकार को प्रभावी ढंग से घेरते हैं और नेता प्रतिपक्ष के पद की गरिमा को बखूबी बनाए रखते नजर आते हैं। वहीं सदन के बाहर भी पूरी तरह सक्रिय हैं और हाल में भाजपा नेता ज्ञानदेव आहूजा के मंदिर विवाद ने उन्हें पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला दी। अनुसूचित जाति से होने के कारण पार्टी के जातिगत समीकरण में पूरी तरह फिट बैठते हैं, वहीं उम्र भी ज्यादा नहीं है। यानी युवा नेतृत्व की मांग भी पूरी करते नजर आते हैं। पार्टी के जानकार उन्हें लम्बी रेस का ऐसा खिलाड़ी मानते हैं जो धीरे-धीरे ही सही, लेकिन गहरी जड़ें जमा रहा है।






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