गफूर से गोदारा तक: कांग्रेस की नई रणनीति और पुराने सवाल
धर्मसिंह भाटी,
वरिष्ठ पत्रकार
थार के विशाल रेतीले विस्तार में राजनीतिक गतिविधियां अक्सर दिल्ली या जयपुर की हलचल से अलग दुनिया रचती हैं। यहां की राजनीति उतनी ही जटिल है, जितनी इसकी भूमि; और उतनी ही संवेदनशील, जितने इसके समुदाय। बाड़मेर में कांग्रेस की हालिया जिला अध्यक्ष नियुक्ति इसी संवेदनशीलता की परीक्षा बनकर उभरी है। बाहर से देखने वाले के लिए यह केवल एक संगठनात्मक फेरबदल प्रतीत हो सकता है, लेकिन स्थानीय समाज के भीतर इसे कहीं गहरे तक असर करने वाली घटना के रूप में महसूस किया जा रहा है। राजनीतिक दलों के लिए अक्सर ऐसे फैसले एक दिन की सुर्खियां और दो दिन का विवाद होते हैं, मगर जमीन पर इसके प्रभाव लंबे समय तक टिकते हैं। यही कारण है कि बाड़मेर का यह विवाद राजस्थान की राजनीति, कांग्रेस की रणनीति और प्रतिनिधित्व के बदलते समीकरणों को नए सिरे से समझने की मांग करता है।
जिला अध्यक्षों की सूची जारी होते ही बाड़मेर में जो प्रतिक्रिया सामने आई, वह राजनीतिक टिप्पणी से परे जाकर सामाजिक असंतोष में बदलती दिखी। गफूर अहमद को पुनः जिला अध्यक्ष न बनाए जाने को मुस्लिम समुदाय ने केवल एक पद परिवर्तन नहीं, बल्कि ‘हमारी जगह कौन तय करेगा’ वाला बड़ा सवाल माना। यह सवाल यहीं तक सीमित नहीं रहता। यह उन समुदायों में भी गूंज उठता है, जो खुद को संगठनों में पर्याप्त रूप से दिखता तो देखते हैं, सुना जाता नहीं। राजनीतिक दल इन बारीक लेकिन निर्णायक आवाज़ों को जितनी देर में सुनते हैं, उतनी ही मुश्किलें बढ़ती जाती हैं।
कांग्रेस की ओर से लक्ष्मण सिंह गोदारा की नियुक्ति को स्थानीय समीकरणों का पुनर्संतुलन बताया गया है। नेतृत्व की दृष्टि से यह निर्णय हरीश चौधरी के प्रभाव क्षेत्र, राजनीतिक नेटवर्क और अपनी रणनीतिक सोच से प्रेरित रहा है। किसी भी वरिष्ठ नेता के लिए यह स्वाभाविक है कि वह संगठनात्मक ढांचे में ऐसे व्यक्ति को आगे बढ़ाए, जिस पर उसे भरोसा हो, जिसे वह दिशा दे सके और जिसके माध्यम से वह अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाकर रख सके। यह तर्क नेतृत्व की राजनीति में उतना ही पुराना है, जितनी पार्टी संरचनाएं स्वयं। लेकिन संगठन कोई निर्वात में संचालित होने वाली संरचना नहीं है; वह समाज के भीतर ही खड़ा होता है। और समाज उसे केवल एक निर्णय के आधार पर नहीं, बल्कि उस निर्णय के पीछे के संदेश के आधार पर आंकता है।
मुस्लिम समुदाय की प्रतिक्रिया इस बार केवल भावनात्मक नहीं थी; वह राजनीतिक रूप से विश्लेषणात्मक भी थी। यह समुदाय लंबे समय से कांग्रेस का स्थायी आधार रहा है। विशेषकर पश्चिम राजस्थान में, जहां धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता राजनीतिक निर्णयों में अलग जगह रखती है, वहां मुस्लिम नेतृत्व का कमजोर होना कांग्रेस के लिए चिंताजनक है। गफूर अहमद को अध्यक्ष पद से हटाने के निर्णय ने इस भाव को और तीखा किया है कि कांग्रेस उनके सहयोग को स्वाभाविक मानकर चलती है, लेकिन प्रतिनिधित्व के समय उन्हें दरकिनार कर देती है। राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि प्रतिनिधित्व केवल चुनावी गणित का हिस्सा नहीं होता; वह सम्मान और साझेदारी का संकेत भी होता है। सोशल मीडिया पर दर्ज हुई सामुदायिक प्रतिक्रियाएं इस बात की पुष्टि हैं कि एक समुदाय स्वयं को केवल संख्या नहीं, बल्कि राजनीतिक साझेदार मानना चाहता है। जब साझेदारी की भावना कमजोर होती है, तो चुनावी निष्ठा भी कमजोर होते देर नहीं लगती।
हरीश चौधरी की राजनीतिक यात्रा और संगठन में उनकी पकड़ किसी से छिपी नहीं है। वे पश्चिम राजस्थान की राजनीति में एक प्रमुख शक्ति केंद्र बन चुके हैं। उनका प्रभाव केवल चुनावी स्थितियों तक सीमित नहीं, बल्कि संगठनात्मक ढांचे को आकार देने तक फैला हुआ है। इसी प्रभाव का उपयोग कर उन्होंने अपने नजदीकी युवा नेता लक्ष्मण गोदारा को जिला अध्यक्ष पद तक पहुंचाया। चौधरी के समर्थकों की दलील है कि बदलते राजनीतिक समय में युवा नेतृत्व को स्थान मिलना चाहिए और यह नियुक्ति उसी दिशा में एक कदम है। इसके अलावा एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि जैसलमेर जिले में जिला अध्यक्ष का दायित्व मुस्लिम समुदाय को दिया गया है, ऐसे में बाड़मेर में गैर मुस्लिम जिला अध्यक्ष का निर्णय सही है।
बाड़मेर में यह नियुक्ति उस समय की गई, जब समुदाय विशेष पहले ही प्रतिनिधित्व को लेकर बेचैनी महसूस कर रहा था। ऐसे समय में किसी अन्य बिरादरी के नेता को आगे लाने से वह बेचैनी असंतोष में बदल गई। लक्ष्मण गोदारा की क्षमता और योग्यता पर चर्चा नहीं है; लेकिन उन्हें लेकर जो प्रतिक्रिया आई, वह दर्शाती है कि नेतृत्व परिवर्तन समाज की भावनाओं से जोड़कर देखना आवश्यक होता है।
संगठनात्मक स्तर पर देखें तो यह निर्णय भविष्य में कांग्रेस के लिए कई जटिलताएं पैदा कर सकता है। राजस्थान में कांग्रेस पहले ही अनेक आंतरिक संघर्षों से गुजर चुकी है। सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच का विवाद अभी भी पार्टी की स्मृति में ताज़ा है। ऐसे समय में जिला स्तर पर भी असंतोष पैदा होना पार्टी की ऊर्जा को और कमजोर करता है। संगठन की मजबूती का आधार तभी बनता है जब स्थानीय नेता, समुदाय और नेतृत्व एक साझा धारा में बहते दिखाई दें। लेकिन जब इनमें से कोई एक धारा अलग दिशा पकड़ लेती है तो संगठनात्मक ढांचे का तालमेल बिगड़ जाता है।
रही बात गफूर अहमद की, तो उनकी अनदेखी का संदेश केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक भी है। राजनीति में मेहनत और योगदान का महत्व तभी रहता है, जब उसे मान्यता मिलती रहे। बाड़मेर के लोग इस बात को खुलकर कह रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में अहमद की भूमिका महत्वपूर्ण थी। उनकी अनुपस्थिति का राजनीतिक नुकसान न केवल पार्टी को होगा, बल्कि उस समुदाय को भी लगेगा कि उनके योगदान को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। समुदाय की राजनीति में यह भावना सबसे खतरनाक होती है, क्योंकि यह धीरे-धीरे विश्वास को क्षीण कर देती है।
राजनीतिक दलों को समय रहते ऐसे संकेतों को समझना चाहिए। विशेषकर कांग्रेस, जो प्रतिनिधित्व और विविधता की राजनीति को अपने वैचारिक आधार के रूप में पेश करती है, उसे यह संदेह भी नहीं बनने देना चाहिए कि वह किसी समुदाय की अनदेखी कर रही है। प्रतिनिधित्व की राजनीति में देरी, कमजोर संदेश और गलत समय पर किए गए निर्णय पार्टी के लिए लंबी दूरी के परिणाम पैदा करते हैं। राजस्थान जैसे राज्य में, जहां जातीय संतुलन चुनावी परिणाम को गहराई से प्रभावित करता है, यह संवेदनशीलता और महत्व रखती है। जब बात मुस्लिम समुदाय की आती है तो यह महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि यह समुदाय कांग्रेस के साथ वर्षों से वैचारिक और भावनात्मक निष्ठा रखता आया है।
बाड़मेर की राजनीति केवल क्षेत्रीय समीकरणों का मामला नहीं है; यह राजस्थान के बड़े राजनीतिक मानचित्र का हिस्सा है। यहां की छोटी घटनाएं अक्सर बड़े संकेत देती हैं।
इस विवाद को केवल पद-व्यवस्था या संगठनात्मक फेरबदल के चश्मे से देखने की भूल नहीं करनी चाहिए। यह प्रतिनिधित्व, पहचान, सामुदायिक सम्मान और आंतरिक संरचना में संतुलन का सवाल है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि किसी समुदाय की नाराज़गी केवल वोटों तक सीमित नहीं होती; वह पार्टी के प्रति उस समुदाय की धारणाओं को बदल देती है, और धारणाओं में बदलाव कहीं अधिक स्थायी होता है।
राजनीति में विश्वास टूटने की आवाज़ बहुत धीमी होती है, पर उसके प्रभाव तेज़ होते हैं। बाड़मेर में इस समय जो नाराज़गी है, वह उसी विश्वास के टूटने का संकेत है। कांग्रेस यदि इसे गंभीरता से लेती है तो स्थिति सुधर सकती है; लेकिन यदि इसे केवल “संगठनात्मक निर्णय” कहकर टाल दिया गया, तो इसके दुष्परिणाम आने वाले वर्षों तक पार्टी को भुगतने पड़ सकते हैं।
और अंत में यह याद रखना आवश्यक है कि राजनीति में सही या गलत का निर्णय केवल नेतृत्व नहीं करता; समाज करता है। नेतृत्व निर्णय लेता है, पर समाज उसकी व्याख्या करता है। बाड़मेर के समाज ने इस निर्णय की जो व्याख्या की है, वह कांग्रेस के लिए चेतावनी है। राजनीति में चेतावनियां तभी उपयोगी होती हैं जब उन्हें सुना जाए। देर हो जाने पर वे इतिहास बन जाती हैं और राजनीति में जो इतिहास बन जाता है, उसे बदलने में पीढ़ियां लग जाती हैं।
गहरी राजनीतिक चूक के संकेत
बाड़मेर जिला कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति ने जिस तरह सामाजिक असंतोष को जन्म दिया है, वह महज़ संगठनात्मक निर्णय नहीं, एक गहरी राजनीतिक चूक का संकेत है। कांग्रेस यदि प्रतिनिधित्व को अपनी वैचारिक पहचान बताती है, तो उसे यह भी समझना होगा कि समुदाय सम्मान और साझेदारी की प्रतीकात्मकता को बेहद गंभीरता से लेते हैं। गफूर अहमद की अनदेखी ने मुस्लिम समुदाय में भरोसे की दरार पैदा की है, जिसे हल्का समझना पार्टी के लिए भारी गलती होगी। राजनीति में समय पर किया गया संवाद और संवेदनशील निर्णय ही विश्वास को बचाते हैं—और बाड़मेर की यह घटना कांग्रेस के लिए उसी खोते हुए विश्वास की साफ चेतावनी है।







No Comment! Be the first one.