नए तरह के राष्ट्रवाद से साबका
ट्रंप अपने कदमों से भले ही दुनिया को हैरान कर रहे हैं, पर उनके फैसलों में व्यापक नीतिगत रूपरेखा मौजूद है, जिस पर नीति-निर्माता चलेंगे। ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे में समाहित नए तरह के राष्ट्रवाद के नायक...

डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल
ट्रंप अपने कदमों से भले ही दुनिया को हैरान कर रहे हैं, पर उनके फैसलों में व्यापक नीतिगत रूपरेखा मौजूद है, जिस पर नीति-निर्माता चलेंगे। ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे में समाहित नए तरह के राष्ट्रवाद के नायक के रूप में वे खुद को प्रतिष्ठित करने को व्याकुल हैं।
दीपक कुमार
वरिष्ठ पत्रकार
डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल शुरू हो गया है और हर कोई यह समझने की कोशिश में मसरूफ है कि उन्होंने अपने तरकश से जो तीर छोड़े हैं, उनके मायने क्या हैं। चाहे ट्रंप प्रशासन में नियुक्त किए गए लोग हों, उनके खुद के बयान हों और सोशल मीडिया पर किए जा रहे एलान हों या फिर उनके कार्यकारी निर्देश। अगर इसके पीछे कोई सोची समझी रणनीति है, तो किसी को पक्के तौर पर इसका अंदाजा नहीं है। फिर भी, यह तय है कि उनके फैसलों में व्यापक नीतिगत रूपरेखा मौजूद है, जिस पर उनके नीति-निर्माता चलेंगे और विश्व के तमाम देशों की नीतियों को बुरी तरह प्रभावित करेंगे। ट्रंप ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ का जो नारा दिया है, उसका आधारभूत उद्देश्य नए तरह के एक राष्ट्रवाद की स्थापना है, जिसके नायक के रूप में खुद को प्रतिष्ठित करने को व्याकुल हैं।
इसमें अमेरिका किस दिशा में जाएगा, यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन, विश्व के तमाम नीति निर्माता जो पहले से ही वैश्विक राजनीति में मची उथल-पुथल से जूझ रहे हैं, ट्रंप के उठा-पटक भरे फैसलों से जूझने की चुनौती से दो-चार हो रहे हैं। ट्रंप की अहम सार्वजनिक घोषणाओं में है विदेश नीति के एजंडे का ऐलान। उन्होंने दूसरे देशों पर कब्जा करने और प्रभाव क्षेत्र कायम करने के युग में वापसी की बात की है और साथ ही साथ साझीदारों के साथ भागीदारी और आर्थिक रूप से एक दूसरे के पूरक बनने की पाबंदियों को भी खारिज कर दिया है। ट्रंप ने सैन्य ताकत के दम पर पनामा नहर और ग्रीनलैड पर कब्जा करने की ओर कदम बढ़ाया है। अमेरिका की दक्षिणी सीमा पर जिस तरह से आपातकाल लगाया गया, सेना भेजी गई और आप्रवासियों को लेकर ताबड़तोड़ निर्देश जारी किए गए, उसे कूटनीति के गलियारे में हैरान करने वाला माना जा रहा है। क्योंकि अगर कोई और देश इसी तरह की घोषणाएं करता, तो अब तक खुद अमेरिका ही उसे ‘अराजक’ और दुनिया के लिए खतरा घोषित कर चुका होता।
अमेरिका से भारत के संबंध दो दशक में तेजी से मजबूत हुए हैं, लेकिन ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति से परेशानी बढ़ सकती है। ट्रंप अपनी इस नीति नीति को लेकर आक्रामक हैं। एच1बी वीजा के मुद्दे पर ट्रंप को अपने साथी उद्योगपति इलन मस्क का साथ नहीं मिला है। भारत को आप्रवासन और व्यापार के मसले पर ट्रंप प्रशासन से चुनौती मिलेगी। अमेरिकी थिंक टैंक ‘रैंड कारपोरेशन’ में हिंद-प्रशांत क्षेत्र के विश्लेषक डेरेक ग्रासमैन ने लिखा है कि ट्रंप की हिंद-प्रशांत नीति बाइडेन से बिलकुल अलग होगी। ट्रंप ने जेडी वांस को उपराष्ट्रपति बनाया है और वांस चीन को लेकर काफी आक्रामक रहते हैं। हालांकि, ट्रंप कुछ भी ऐसा करने से बचेंगे, जो अमेरिका के फायदे में नहीं होगा। ट्रंप ने कहा है कि वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के संबंध गहरा करना चाहते हैं। नवंबर में चुनाव जीतने के बाद ट्रंप ने शी जिनपिंग से बात की थी और कहा था कि दोनों देश साथ मिलकर कई समस्याओं का समाधान खोज सकते हैं। ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में शी जिनपिंग को आमंत्रित किया था। माना जा रहा है कि चीन के तानाशाह के प्रति ट्रंप की बढ़ती उदारता का असर अमेरिका से भारत और जापान के संबंधों पर पड़ेगा।
ट्रंप अतीत में भारत की कई बार आलोचना कर चुके हैं। खास कर अमेरिका में बेरोजगारी को लेकर। पूर्व कूटनीतिज्ञ जयंत प्रसाद के मुताबिक, ‘ट्रंप की यह प्रवृत्ति रही है कि दुश्मनों की खुशामद करो और दोस्तों को बेचैन।’ यूनिवर्सिटी आफ अल्बनी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर क्रिस्टोफर क्लैरी ने एक टीवी चैनल पर कहा, ‘दूसरे कार्यकाल में ट्रंप भारत के लिए दो तरह से खतरा हैं। ट्रंप और उनकी टीम भारत को लेकर ज्यादा आक्रामक रहेंगे- खास कर कारोबार और निवेश के मसले पर।’ वर्ष 2022 में भारत और अमेरिका का द्विपक्षीय व्यापार 191.8 अरब डालर का था। भारत ने 118 अरब डालर का निर्यात किया था और आयात 73 अरब डालर का था।
लेकिन ट्रंप ने अपनी नीति के तहत भारत के खिलाफ शुल्क लगाया तो चीजें बदलेंगी। ट्रंप चाहते हैं कि व्यापार लाभ का आंकड़ा अमेरिका के पक्ष में रहे न कि भारत के पक्ष में। सवाल उठता है कि भारत इस स्थिति को कूटनीतिक तरीके से कैसे संभालेगा। पिछली बार भी ट्रंप ने भारत के स्टील और एल्युमिनियम पर शुल्क लगाए थे। देखना होगा कि भारत सरकार अमेरिका के साथ समझौते को लेकर क्या रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाती है, जो न केवल भारत के लिए बल्कि अमेरिका के लिए भी लाभकारी हो।
दरअसल, भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच संतुलन बनाना अमेरिकी रणनीति के लिए अहम है। इन तीनों देशों का अपने-अपने संदर्भ में अमेरिका के साथ गहरा संबंध है और दक्षिण एशिया की अमेरिकी रणनीति में इन देशों की भूमिका बहुत अहम रहेगी। दक्षिण एशिया में भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव आते हैं। विश्व बैंक का अनुमान है कि इस इलाके में 1.94 अरब लोग रहते हैं। दक्षिण एशिया में भारत तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है। इन देशों में भारत ने कुछ सालों में अपनी स्थिति मजबूत बनाई है। सवाल उठता है कि क्या ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत की स्थिति वैसे ही रहेगी?
ट्रंप पहले भी भारत समेत कई ऐसे देशों की आलोचना कर चुके हैं जो अमेरिकी सामान पर भारी शुल्क लगा रहे हैं। ट्रंप चेतावनी दे चुके हैं कि अगर भारत जैसे देश अमेरिकी सामान पर भारी शुल्क लगाएंगे तो अमेरिका भी उनके साथ बिल्कुल ऐसी ही नीति अपनाएगा। अक्सर भारत को कारोबार में अपना बड़ा सहयोगी बताने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था, अगर भारत हमारे सामान पर 100 फीसद शुल्क लगाएगा तो क्या हमें इसके बदले कुछ नहीं करना चाहिए? ट्रंप का भारत समेत अन्य देशों के लिए यह नजरिया उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ ट्रेड नीति से जुड़ा है। अगर ऐसा होता है तो इसका भारी असर भारत के निर्यात क्षेत्र पर देखने को मिल सकता है। खासतौर पर इसका असर उन चीजों पर देखने को ज्यादा मिलेगा जो मुख्य रूप से अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं।
हालांकि, ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी में विशेष रूप से रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र में निरंतर वृद्धि की संभावना है। चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर साझा चिंता दोनों देशों के लिए मजबूत एकीकृत कारक बनी हुई है। ट्रंप का क्वाड को मजबूत करने पर जोर भारत के हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण के साथ मेल खाता है। भारत को संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और खुफिया जानकारी साझा करने में अमेरिका से और अधिक समर्थन मिलने की उम्मीद है, जो भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा क्षमताओं को बढ़ाएगा। ट्रंप की ‘शक्ति के माध्यम से शांति’ की नीति हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक अधिक मुखर अमेरिकी रुख में परिवर्तित हो सकती है, जो भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं के साथ मेल खाती है। राष्ट्रीय सुरक्षा संकटों के दौरान दोनों देशों के बीच विश्वास और तालमेल मजबूत रहेगा, जो रक्षा और खुफिया साझेदारी को और मजबूती देगा।
ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ आर्थिक नीतियां, भारत के साथ व्यापार संबंधों को प्रभावित कर सकती हैं। आयात पर शुल्क बढ़ाने जैसी उनकी संरक्षणवादी नीतियां आइटी, फार्मास्युटिकल्स और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौतियां प्रस्तुत करती हैं। अमेरिका में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के प्रयास भारत पर अपने व्यापार अवरोधों को कम करने का दबाव डाल सकते हैं, जो घरेलू उद्योगों को प्रभावित कर सकता है। भारतीय आइटी और सेवा क्षेत्र अमेरिकी ग्राहकों पर ज्यादा निर्भर हैं। ये क्षेत्र ट्रंप की व्यापार युद्ध नीतियों के कारण अमेरिकी उपभोक्ता खर्च में कमी आने पर प्रभावित हो सकते हैं। ट्रंप की वापसी पारंपरिक ऊर्जा नीतियों में बदलाव का संकेत देती है, जिसमें तेल, गैस और कोयले के नियमन को कम करने पर जोर दिया जाएगा। यह दृष्टिकोण जो बाइडेन प्रशासन द्वारा अपनाई गई अक्षय ऊर्जा साझेदारी के विपरीत है, जो भारत के जलवायु लक्ष्यों के साथ मेल खाती थी।
दक्षिण एशिया में ट्रंप की विदेश नीति क्षेत्रीय गतिशीलता को प्रभावित कर सकती है। आतंकवाद-रोधी प्रयासों पर पाकिस्तान के साथ जुड़ाव रखने की उनकी इच्छा, साथ ही अधिक जवाबदेही की मांग, क्षेत्रीय स्थिरता में भारत की रुचि के अनुरूप है। चीन के खिलाफ उनकी मजबूत नीति-शुल्क, प्रतिबंध और कूटनीतिक दबाव के माध्यम से- भारत के प्रयासों का समर्थन करती है, जो क्षेत्र में चीनी प्रभाव का मुकाबला करना चाहता है। व्यापक भू-राजनीतिक क्षेत्र में, बाइडेन की तुलना में रूस के प्रति ट्रंप का कम टकराव वाला दृष्टिकोण भारत के लिए जटिलताओं को कम कर सकता है।
ट्रंप के अब तक के एलानों के पीछे बहुत सोचे समझे भू-राजनीतिक समीकरण नजर आते हैं। अब ट्रंप और उनकी टीम इनको कैसे लागू करती है, उसी से उनकी विदेश नीति की विरासत निर्धारित होगी। लेकिन, दुनिया को चौंकाने का ट्रंप का अंदाज उनके काम करने का असली तरीका है। ट्रंप की विश्व दृष्टि की सबसे अच्छी परिभाषा शायद, 2020 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए उनके भाषण में दिखी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि, ‘राष्ट्रपति के तौर पर मैंने पुराने और नाकाम हो चुके तौर-तरीकों को खारिज कर दिया है और मैं गर्व से अमेरिका को पहली पायदान पर रख रहा हूं। ये बिल्कुल ठीक है।’ जाहिर है, अब भारत और दुनिया के तमाम देशों को अमेरिकी प्रशासन के बारे में नए दृष्टिकोण से सोचना होगा।






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