विरासत तो मिली, वारिस नहीं
गुलाबचंद कटारिया के संवैधानिक पद पर जाकर राज्यपाल बनने, किरण माहेश्वरी और गिरिजा व्यास के निधन से इनकी कमी केवल व्यक्तित्वों की नहीं है— यह नेतृत्व, दृष्टिकोण और जनसंपर्क की कमी भी...

राजनीति : मेवाड़ का खाली सियासीपन, नेतृत्व का संकट आखिर क्यों?
मधुलिका सिंह,
लेखिका एवं पत्रकार
कहते हैं कि जब कोई वृक्ष बहुत विशाल हो जाता है, तो वह अपने नीचे उगने वाले नन्हे पौधों को बढ़ने की जगह नहीं देता। ऐसे में धूप और स्थान की कमी के कारण छोटे पौधे पनप नहीं पाते। कुछ ऐसा ही हुआ है मेवाड़ की राजनीति में। पार्टी चाहे कोई भी रही हो, जो चेहरा बनकर नेतृत्व कर रहे थे, उन्होंने नई खेफ को आगे नहीं आने दिया। बात भले ही हमेशा युवाओं को मौका देने की होती रही, लेकिन राजनीतिक गणित से युवा चेहरों को लीडरशिप से वंचित रखा गया।
Table Of Content
राजस्थान व केन्द्र की राजनीति में मेवाड़ क्षेत्र के कई दिग्गज नेताओं ने दशकों तक अहम भूमिका निभाई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस, दोनों ही दलों में ऐसे नेता रहे हैं, जिन्होंने संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर प्रभावी उपस्थिति दर्ज करवाई। गुलाबचंद कटारिया, स्व. किरण माहेश्वरी (भाजपा) और स्व. गिरिजा व्यास (कांग्रेस) जैसे नेताओं ने न केवल अपनी पार्टियों को मजबूत किया, बल्कि मेवाड़ जैसे सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समृद्ध क्षेत्र को नेतृत्व भी प्रदान किया। लेकिन इन वरिष्ठ नेताओं के सक्रिय राजनीति से निष्क्रिय होने या निधन के बाद, यह प्रश्न गहराता जा रहा है कि अब नेतृत्व कौन संभालेगा? क्या कोई ऐसा युवा चेहरा है जो इन नेताओं की तरह जनसंपर्क और नेतृत्व क्षमता रखता हो, जो न केवल पार्टी, बल्कि पूरे क्षेत्र की आवाज बन सकें?
मेवाड़ की राजनीतिक पृष्ठभूमि
मेवाड़ क्षेत्र राजस्थान की राजनीति में हमेशा से एक निर्णायक भूमिका में रहा है। यहां से चुने गए कुछ नेता मुख्यमंत्री व केंद्रीय मंत्री भी बने हैं। यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से सजग, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और सामाजिक रूप से संगठित रहा है।
भाजपा में गुलाबचंद कटारिया, जो उदयपुर से आते हैं, लंबे समय तक भाजपा के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे। उन्होंने गृहमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जैसे पदों पर रहते हुए प्रदेश की राजनीति पर गहरी छाप छोड़ी। उनकी छवि एक सख्त प्रशासक और सुलझे हुए जनसेवक की रही है।
किरण माहेश्वरी जो नगर परिषद में पार्षद से राजनीतिक की सीढ़ी पर चढ़ी और सीधी सभापति बन गई। किरण राजनीति में जिन तेज कदमों से आगे बढ़ी, उससे एकबारगी लगने लगा था कि उदयपुर की वो एक नई ‘किरण’ होगी। लेकिन उनकी गति को राजनीति के कुछ चेहरों ने रोक दी। इसके बाद वे उदयपुर से निकलकर सीधे राजसमंद गई और वहां से विधायक बनी। वह भाजपा की एक सशक्त महिला नेता के रूप में पहचानी गईं। उन्होंने शहरी विकास से लेकर महिला सशक्तिकरण जैसे विषयों पर उल्लेखनीय कार्य किया। उनकी लोकप्रियता पार्टी की सीमाओं से परे थी। वे वसुंधरा सरकार में मंत्री भी रही।
कांग्रेस की ओर से गिरिजा व्यास उदयपुर से एक बड़ा चेहरा था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष से लेकर केंद्र में मंत्री और महिला आयोग की राष्ट्रीय अध्यक्ष रहीं। उदयपुर से जीतने वाली गिरिजा भी बाद में चित्तौड़गढ़ से चुनाव लड़ी। एक कॉलेज शिक्षिका से सांसद बनीं। उन्होंने महिला मुद्दों को संसद और समाज, दोनों स्तरों पर गंभीरता से उठाया।
इन तीनों नेताओं का प्रभाव न केवल पार्टी तक सीमित था, बल्कि वे अपने क्षेत्रों में जननेता के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किए जाते रहे।
अब… एक शून्यता
आज जब हम मेवाड़ की राजनीति पर नज़र डालते हैं, तो यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि इन वरिष्ठ नेताओं के बाद ऐसा कोई युवा चेहरा नहीं उभरा है, जो पूरे क्षेत्र की आवाज बन सके।
भाजपा में अर्जुनलाल मीणा (उदयपुर सांसद) और कांग्रेस में रघुवीर मीणा जैसे नेता सक्रिय तो हैं, लेकिन इनका जनाधार सीमित है। वे अब तक भी उस स्तर की जनस्वीकृति या नेतृत्व क्षमता नहीं दिखा पाए हैं, जो पूर्व नेताओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। वहीं भाजपा में भी युवाओं को मौका देने की बजाए पुराने चेहरों पर ही भरोसा जताया गया। जब गुलाबचंद कटारिया को सबसे पहले असम का राज्यपाल (वर्तमान पंजाब के राज्यपाल) बनाया, तब लगा अब मेवाड़ का भाजपा नेता कौन होगा। तब एक नाम उभर कर आया चित्तौडगढ़ के सीपी जोशी। इसी बीच उनको प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया गया, लेकिन सीपी भी प्रदेश का जिम्मा मिलने के बाद मेवाड़ को पूरा समय नहीं दे पाए।
युवाओं का मोहभंग
राजनीति में युवाओं की भागीदारी अब केवल रैलियों और सोशल मीडिया अभियानों तक सीमित रह गई है। न तो पार्टियां उन्हें निर्णय करने की भूमिका देती हैं, न ही उन्हें ज़मीनी स्तर पर काम करने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं। इससे मेवाड़ जैसे क्षेत्र, जहां शिक्षा और समझ की कोई कमी नहीं है, वहां के युवा राजनीति से दूर होते जा रहे हैं। कॉलेज यूनियनों, पंचायत और निकाय चुनावों में सक्रिय युवाओं को प्रोत्साहित करने की बजाए, पार्टी नेतृत्व वंशवाद, गुटबाज़ी और पुराने चेहरों पर ही केंद्रित रहा है।
भाजपा (BJP) के प्रमुख नेता
1. गुलाबचंद कटारिया (उदयपुर):
1977 से 2023 तक विधायक (उदयपुर शहर से)
राजस्थान सरकार में गृहमंत्री, शिक्षा मंत्री, पंचायती राज मंत्री
नेता प्रतिपक्ष (विधानसभा)
वर्तमान में पंजाब के राज्यपाल
2. स्व. किरण माहेश्वरी (राजसमंद):
2004 में अजमेर से सांसद (लोकसभा)
2008 से राजसमंद से विधायक
राजस्थान सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री
महिला सशक्तिकरण की प्रबल समर्थक
2020 में निधन
3. दीप्ति माहेश्वरी (राजसमंद):
किरण माहेश्वरी की पुत्री
वर्तमान में विधायक (2021 उपचुनाव से)
अनुभव सीमित, लेकिन राजनीति में सक्रिय, किरण की परछाई अब इनमें दिखने लगी
4. अर्जुनलाल मीणा (उदयपुर):
दो बार सांसद (2014, 2019)
आदिवासी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व
संसदीय समितियों में सक्रिय भूमिका, सांसद का टिकट कटने के बाद सक्रियता कम
5. सीपी जोशी
चित्तौडगढ़ से सांसद
भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रहे
इनके कार्यकाल में हुए चुनाव में भाजपा की सरकार बनी
—
कांग्रेस के प्रमुख नेता
1. स्व. गिरिजा व्यास (चित्तौड़गढ़/उदयपुर):
1991, 1996, 1999, 2004 में लोकसभा सांसद
केंद्रीय मंत्री: आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष
राजस्थान महिला कांग्रेस की अध्यक्ष
2. सी. पी. जोशी (नाथद्वारा):
कई बार विधायक व सासंद
पूर्व प्रदेशाध्यक्ष, कांग्रेस
केंद्रीय मंत्री: ग्रामीण विकास, पंचायती राज, सड़क परिवहन
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष
3. रघुवीर सिंह मीणा (उदयपुर):
पूर्व सांसद (2009–2014)
वरिष्ठ कांग्रेस नेता
आदिवासी क्षेत्रों में प्रभाव
संगठनात्मक भूमिका में सक्रिय
4. उदयलाल आंजना
चित्तौड़गढ़ जिले से आने वाले उदयलाल आंजना चित्तौड़ सांसद रहे
वे निम्बाहेड़ा विधायक रहे
वे सरकार में सहकारिता मंत्री भी रहे
—
क्या है समाधान?
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि युवा नेतृत्व को तैयार करना समय की मांग है। विशेषकर मेवाड़ जैसे क्षेत्रों में, जहां जनता पढ़ी-लिखी और राजनीतिक रूप से सजग है।
1. युवाओं को पार्टी के निर्णयात्मक पदों पर लाना होगा, जिससे वे नीति-निर्धारण में भागीदारी कर सकें।
2. वरिष्ठ नेताओं को अपनी राजनीतिक विरासत युवाओं को सौंपने का साहस दिखाना होगा।
3. ब्लॉक, जिला और मंडल स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं को अवसर देने के लिए पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी होगी।
4. राजनीति को सेवा और करियर का संतुलन बनाना होगा, जिससे योग्य, ईमानदार और प्रतिबद्ध युवा इसमें आकर्षित हों।
—
गुलाबचंद कटारिया के संवैधानिक पद पर जाकर राज्यपाल बनने, किरण माहेश्वरी और गिरिजा व्यास के निधन से इनकी कमी केवल व्यक्तित्वों की नहीं है— यह नेतृत्व, दृष्टिकोण और जनसंपर्क की कमी भी है। जब तक भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियां मेवाड़ में युवा, पढ़े-लिखे और समाज से जुड़े नेताओं को आगे नहीं लातीं, तब तक यह राजनीतिक शून्यता बनी रहेगी।
राजस्थान की राजनीति को नई दिशा देने के लिए मेवाड़ को एक बार फिर नेतृत्व में अग्रणी भूमिका निभानी होगी और यह तभी संभव है जब युवाओं को न केवल प्रतिनिधित्व दिया जाए, बल्कि जिम्मेदारी भी सौंपी जाए।






No Comment! Be the first one.