विकास की डगर या राजनीतिक बिसात?
बाड़मेर और बालोतरा जिलों की सीमाओं में बदलाव ने राजस्थान की राजनीति में भारी हलचल पैदा कर दी है। रिफाइनरी के आर्थिक लाभ, भविष्य के विधानसभा परिसीमन और राजनीतिक वर्चस्व को लेकर भाजपा और कांग्रेस के...

बाड़मेर-बालोतरा सीमा विवाद
लोकतंत्र में सत्ता का स्वरूप अक्सर ‘सही’ और ‘गलत’ की परिभाषाओं के इर्द-गिर्द घूमता है। जब कोई दल सत्ता में होता है, तो उसके निर्णय ‘जनहित’ और ‘प्रशासनिक सुगमता’ के नाम पर लिए जाते हैं, लेकिन वही निर्णय विपक्ष की नजर में ‘तानाशाही’ और ‘जनता के साथ धोखा’ बन जाते हैं। बाड़मेर और बालोतरा जिलों की सीमाओं में किया गया हालिया बदलाव इसी सत्ता संघर्ष की एक नई बानगी है। राजस्थान की भजनलाल सरकार द्वारा वर्ष 2025 के अंतिम दिन जारी किया गया आदेश आज मारवाड़ की राजनीति का केंद्र बिंदु बन चुका है।
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भौगोलिक फेरबदल और राजनीतिक उबाल
सरकार के नए आदेश के तहत बायतु विधानसभा क्षेत्र के बड़े हिस्से को बालोतरा से हटाकर पुनः बाड़मेर में शामिल किया गया है, जबकि गुड़ामालानी और धोरीमना जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को बाड़मेर से अलग कर बालोतरा जिले की झोली में डाल दिया गया है। इस प्रशासनिक आदेश ने धरातल पर एक राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। पूर्व राजस्व मंत्री हेमाराम चौधरी का धोरीमना में धरने पर बैठना और बायतु विधायक हरीश चौधरी का आक्रामक रुख यह स्पष्ट करता है कि यह मामला केवल नक्शे पर लकीरें खींचने तक सीमित नहीं है।
कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन और ‘2028’ का संकल्प
धोरीमना में आयोजित आक्रोश रैली ने न केवल स्थानीय मुद्दों को हवा दी, बल्कि प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व (गोविंद सिंह डोटासरा, सचिन पायलट, टीकाराम जूली) के जमावड़े ने इसे राज्य स्तरीय मुद्दा बना दिया।
रणनीतिक स्थगन : हेमाराम चौधरी द्वारा अप्रैल 2027 (जनगणना पूर्ण होने तक) के लिए धरना स्थगित करना एक सोची-समझी रणनीति है, क्योंकि जनगणना के दौरान सीमाओं में बदलाव तकनीकी रूप से कठिन होता है।
चुनावी वादा : कांग्रेस ने अभी से 2028 के विधानसभा चुनावों के लिए इसे एक चुनावी मुद्दा बना दिया है, यह घोषणा करते हुए कि सत्ता में वापसी पर सीमाओं को पूर्ववत किया जाएगा।
भाजपा का तर्क: संगठन और सुशासन
दूसरी ओर, सत्ताधारी भाजपा इस बदलाव को अपने संगठनात्मक ढांचे के अनुरूप मानती है। मंत्री के.के. बिश्नोई का यह तर्क कि “भाजपा के संगठनात्मक जिलों के अनुसार ही प्रशासनिक जिलों का गठन हुआ है,” यह संकेत देता है कि सरकार प्रशासनिक इकाइयों को अपनी पार्टी के प्रभाव क्षेत्रों के साथ एकीकृत करना चाहती है। भाजपा के लिए यह निर्णय केवल सीमांकन नहीं, बल्कि भविष्य की चुनावी बिसात बिछाने जैसा है।
रिफाइनरी: आर्थिक लाभ की होड़
इस पूरे विवाद के केंद्र में पचपदरा रिफाइनरी एक बड़ी भूमिका निभा रही है।
आर्थिक आकर्षण: रिफाइनरी के कारण बालोतरा अब केवल एक जिला मुख्यालय नहीं, बल्कि एक ‘इकोनॉमिक हब’ बन चुका है। नेताओं और जनता, दोनों को लगता है कि बालोतरा के साथ जुड़े रहने से रिफाइनरी से होने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ (रोजगार, ठेकेदारी, बुनियादी ढांचा) तक पहुंच आसान होगी।
हितों का टकराव: बायतु और गुड़ामालानी के नेताओं के बीच रिफाइनरी पर अपने प्रभाव को लेकर एक अघोषित युद्ध चल रहा है। हर कोई चाहता है कि औद्योगिक कॉरिडोर का सबसे बड़ा हिस्सा उनके जिले या प्रभाव क्षेत्र में आए।
भविष्य की राजनीति और परिसीमन का डर
आगामी विधानसभा परिसीमन इस विवाद की सबसे गहरी जड़ है। जिलों की सीमाओं में बदलाव सीधे तौर पर भविष्य के मतदाता समीकरणों को प्रभावित करेगा। कांग्रेस को डर है कि इस फेरबदल से उनके वोट बैंक में सेंध लग सकती है और उन्हें ‘हाशिए’ पर धकेला जा सकता है, जबकि भाजपा इसे अपने गढ़ को और मजबूत करने के अवसर के रूप में देख रही है।
बाड़मेर और बालोतरा के बीच चल रही यह ‘राजनीतिक नूरा कुश्ती’ स्पष्ट करती है कि सीमांकन केवल प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि दूरगामी राजनीतिक हितों की पूर्ति का साधन है। जहाँ जनता सुविधाओं और विकास की उम्मीद में है, वहीं राजनेता इसे अपनी ‘शाख’ और भविष्य की ‘सल्तनत’ को बचाने की लड़ाई मान रहे हैं। आने वाले वर्षों में, विशेषकर 2027 की जनगणना के बाद, यह मुद्दा एक बार फिर राजस्थान की राजनीति में उबाल लाएगा।






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