सत्ता, संपत्ति और संदेह
आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं पर निगरानी की पहल स्वागतयोग्य है, लेकिन लोकतंत्र की असली कसौटी यह होगी कि जनता अपने प्रतिनिधियों से सिर्फ़ स्वच्छ छवि ही नहीं, बल्कि ईमानदार संपत्ति विवरण भी पाए। अपने...

लोकतंत्र की मजबूती के लिए नेताओं का आर्थिक रूप से पारदर्शी होना जरूरी
राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
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भारतीय लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल संविधान संशोधनों या न्यायालय के आदेशों से नहीं, बल्कि उस भरोसे से होता है जो जनता और उसके प्रतिनिधियों के बीच कायम रहता है। 130वें संविधान संशोधन की गहमागहमी के बीच एक बार फिर यह मुद्दा अधिक महत्वपूर्ण लगता है कि क्या केवल आपराधिक मामलों पर रोक ही पर्याप्त है? या फिर अब वह समय आ गया है जब नेताओं की संपत्ति और उनके हलफनामों की सच्चाई को भी लोकतांत्रिक विमर्श के केंद्र में लाया जाए।
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यह सुखद है कि न्यायपालिका और संसद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जनप्रतिनिधियों को लेकर सजग हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल अपराधमुक्त होना ही एक नेता की योग्यता का पैमाना होना चाहिए? लोकतंत्र की जड़ें तभी मज़बूत होंगी जब उसके प्रतिनिधि आर्थिक रूप से भी पारदर्शी हों। ऐसा अक्सर अब तक इसलिए नहीं हो पा रहा है, क्योंकि वे अपने प्रभाव का भरपूर उपयोग करते हैं। जनता चाहकर भी ऐसे सवाल नहीं उठा पाती। ऐसे में संसद व न्यायपालिका ही जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वो जनता की भावना के अनुरूप इस मामले में पहल करे। देश में कई उदाहरण हैं जहां नेताओं ने पहली बार चुनाव लड़ते समय अपनी संपत्ति लाखों में बताई और कुछ वर्षों में वही संपत्ति करोड़ों में पहुंच गई। सवाल यह नहीं कि संपत्ति बढ़ी क्यों, सवाल यह है कि यह वृद्धि किस आधार पर और किस वैध आय से हुई। ऐसा उनके लिए आसमान से क्या बरस गया?
चुनाव आयोग के समक्ष दायर किए जाने वाले हलफनामे नेता की ईमानदारी की पहली सीढ़ी माने जाते हैं। लेकिन अक्सर यही दस्तावेज़ सत्य और असत्य के बीच झूलते हुए दिखते हैं। कई मामलों में नेताओं ने संपत्ति का सही ब्यौरा छिपाया, कम करके बताया या फिर ऐसे स्रोत बताए जिनकी जांच तक कभी नहीं हुई। अगर कोई जनप्रतिनिधि अपने हलफनामे में 10 लाख की संपत्ति लिखता है और अगले ही कार्यकाल में यह कई करोड़ हो जाती है, तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लोकतंत्र की आत्मा यह कहती है कि ऐसे मामलों में केवल चुनाव आयोग को नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच एजेंसियों को भी अधिकार होना चाहिए कि वे इसकी तह तक जाएं।
नेताओं पर कठोरता क्यों नहीं..?
जब तक कानून में यह प्रावधान नहीं होगा कि झूठा संपत्ति विवरण देने वाले नेताओं की संपत्ति जब्त हो सकती है, तब तक इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगेगी। एक आम नागरिक से अगर टैक्स चोरी के नाम पर संपत्ति कुर्क की जा सकती है, तो फिर नेताओं पर यही कठोरता क्यों न दिखाई जाए?
कई देशों में राजनेताओं की आय-व्यय की सार्वजनिक जांच होती है और गलत विवरण देने पर तत्काल कार्रवाई की जाती है। भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में जहां राजनीति केवल शासन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक अवसर का भी बड़ा ज़रिया बन गई है, वहां यह और भी आवश्यक हो जाता है।
विडंबना यह है कि जिन नेताओं ने अपने कागज़ों में मामूली संपत्ति दिखाई होती है, वही ज़मीन पर राजाओं जैसे ठाट-बाट से जीवन जीते हैं। आलीशान बंगले, महंगी गाड़ियां, विदेश यात्राएं और चुनावी रैलियों पर बेहिसाब खर्च। ये सब उस असमानता को उजागर करते हैं जो कागज़ और हकीकत के बीच पसरी हुई है। जनता यह सवाल पूछने का हक रखती है कि आखिर वह पैसा आता कहां से है? अगर जवाब नहीं मिलता तो यह लोकतंत्र के प्रति अविश्वास को और गहरा करता है।
संपत्ति के वास्तविक स्रोत बताना जरूरी
लोकतंत्र की सफलता केवल बहुमत के आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। उसकी असली परीक्षा यह है कि जनता यह महसूस करे कि उसका प्रतिनिधि सचमुच उसकी आवाज़ है, न कि किसी छिपे कारोबारी या आपराधिक हितों का प्रवक्ता। 130वां संशोधन आपराधिक मामलों पर अंकुश लगाने का एक बड़ा कदम है, लेकिन यह अधूरा है। अब आवश्यक है कि इसमें यह भी जोड़ा जाए कि झूठे हलफनामे और बेहिसाब संपत्ति पर कानूनी शिकंजा कसा जाए। जब लोकतंत्र जनता के विश्वास पर टिका हो तो नेताओं के लिए यह कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता होनी चाहिए कि वे अपनी संपत्ति और स्रोत पूरी सच्चाई के साथ प्रस्तुत करें। अन्यथा, संविधान चाहे जितने संशोधन कर ले, लोकतंत्र की आत्मा अधूरी ही रहेगी।
आज जब जनता महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार से जूझ रही है, तब नेताओं का अव्याख्येय वैभव केवल आक्रोश ही पैदा करता है। इसलिए समय आ गया है कि हम कहें, आपराधिकता के साथ-साथ आर्थिक अपारदर्शिता भी लोकतंत्र के लिए उतनी ही घातक है।






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