भाजपा में वर्चस्व की लड़ाई, कांग्रेस में सुलह की मजबूरी
राजस्थान की मौजूदा सियासत में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के भीतर गहरे अंतर्विरोध उभर रहे हैं। भाजपा में वसुंधरा राजे ने सांवरलाल जाट की मूर्ति अनावरण सभा में अपनी सक्रियता और बयानों के ज़रिये...

राजस्थान की राजनीति में सियासी मोर्चेबंदी
अनुराग,
पत्रकार और राजनीति विश्लेषक
Table Of Content
- राजस्थान की राजनीति में सियासी मोर्चेबंदी
- भाजपा के सत्ता में होने के बाद भी बेचैनी
- वसुंधरा का सियासी संदेश : भैरोंसिंह शेखावत का हवाला
- क्या फिर खड़ी होगी वसुंधरा की चुनौती?
- भजनलाल सरकार : अब तक की उपलब्धि और असंतोष
- हताश हैं आम कार्यकर्ता
- छवि बेहतर, पर करीबियों का वर्चस्व खटक रहा
- कांग्रेस : अंदरूनी सुलह या दिखावटी मेल?
- संतुलन बना रहा तो भाजपा के लिए चुनौती
- गहलोत की रणनीति : दिल भी रखना, दूरी भी बनाए रखना
- सचिन पायलट की मजबूरी और महत्वाकांक्षा
- प्रदेश कांग्रेस की दूसरी पंक्ति : निष्क्रिय या अवसरवादी?
- कौन किस पर भारी?
- वसुंधरा व भजन के दिल्ली दौरे से हुई हलचल
राजस्थान की राजनीति हमेशा से ही जमीनी पकड़, जातीय समीकरण और नेतृत्व की जिद पर टिकी रही है। चाहे भैरोंसिंह शेखावत का दौर रहा हो या अशोक गहलोत की सधी हुई रणनीति, या फिर वसुंधरा राजे का करिश्मा— यहां राजनीति कभी लयबद्ध नहीं रही। इस बार भी वही हाल है। भाजपा की सरकार ने अपने साठ माह के कार्यकाल में बीस माह पूरे कर लिए हैं। यानी एक चौथाई समय। इसी बीच न सिर्फ सत्तारूढ़ भाजपा में बल्कि कांग्रेस में भी सियासी हलचल ने नई करवट लेना शुरू कर दिया है। चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन सियासत का चरित्र यही है कि ये कभी ठहरती नहीं। राजनीति चुनाव के वक्त नहीं होती, चुनाव तो उस अंतिम परीक्षा की तरह है, जिसमें पूरे सत्र की राजनीति का आकलन होता है। इसके पहले कई छोटे-मोटे टेस्ट, हाफ इयरली एग्जाम और मिड टर्म असाइनमेंट चलते रहते हैं। अभी वही दौर चल रहा है।
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भाजपा के सत्ता में होने के बाद भी बेचैनी
सत्तारूढ़ भाजपा में वसुंधरा राजे के इर्द-गिर्द सियासत फिर से गोलबंदी कर रही है। हाल ही में सांवरलाल जाट की मूर्ति अनावरण सभा में वसुंधरा राजे ने जिस अंदाज़ में अपनी बात रखी, उसने भाजपा के भीतर चल रहे असंतोष की तस्वीर को और साफ कर दिया। इस असंतोष को अगर समय रहते शांत नहीं किया गया तो तीन साल बाद विधानसभा चुनाव में सरकार बदलने का सिलसिला रोका न जा सकेगा। ऐसे में फिर से मुख्यमंत्री बनने की वसुंधरा राजे की इच्छा पूरी नहीं होगी। वसुंधरा अगर सक्रिय रहेगी, तभी पार्टी में उनका नाम संभावित मुख्यमंत्री में लिया जाता रहेगा। वसुंधरा राजे को इसी कारण हर कदम बहुत संभलकर उठाना पड़ रहा है। दरअसल, वो ये भी चाहती है कि पार्टी में सत्ता में आए और उनका नाम भी मुख्यमंत्री की दौड़ में बना रहे। अगर तीन साल बाद वाला मौका हाथ से निकल गया तो अगले पांच साल इंतजार करना होगा।
वसुंधरा का सियासी संदेश : भैरोंसिंह शेखावत का हवाला
वसुंधरा राजे ने सभा में भैरोंसिंह शेखावत का नाम लेकर कहा कि अगर आज शेखावत होते तो राजस्थान की राजनीति कुछ और होती। यह बयान केवल श्रद्धांजलि नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक संदेश था। दरअसल, वसुंधरा भाजपा की मौजूदा सरकार की कार्यशैली से असंतुष्ट हैं। उनका संकेत साफ था कि भजनलाल शर्मा की अगुवाई वाली सरकार महज मुख्यमंत्री और कुछ खास मंत्रियों तक सिमट कर रह गई है। पार्टी का आम कार्यकर्ता, छोटे नेता और ज़मीनी नेता हाशिए पर हैं। इन्हीं नेताओं को आगे बढ़ाने के लिए वसुंधरा ने अगर बीड़ा उठाया है तो पार्टी हित की सोच रखने वाले नेताओं को उनका साथ देना पड़ेगा।
सरकारी कामकाज से असंतोष, ट्रांसफर-पोस्टिंग में गुटबाजी और राजनीतिक नियुक्तियों में देरी से कार्यकर्ताओं में बेचैनी बढ़ रही है। वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करने की नीति भाजपा में कई छोटे-छोटे विरोध पैदा कर रही है। वसुंधरा का बयान इस नाराज़गी को आवाज देने जैसा था। अब तो काफी बड़ी संख्या में कार्यकर्ता ही कह रहे हैं कि दो साल बाद भी नहीं लग रहा कि राजस्थान में राज बदल गया है। पश्चिमी राजस्थान में तो कई कार्यकर्ता, पार्टी पदाधिकारी सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि उनकी पार्टी का राज आ गया है, इसका अहसास नहीं है। अभी भी कांग्रेस राज के लोग ही फायदा उठा रहे हैं।
क्या फिर खड़ी होगी वसुंधरा की चुनौती?
सवाल उठता है कि क्या वसुंधरा फिर से पार्टी के भीतर नेतृत्व की चुनौती देने वाली हैं? मौजूदा स्थिति को देखें तो वसुंधरा अब पार्टी के लिए खुली चुनौती बनने की स्थिति में नहीं हैं। न पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें समर्थन देगा, न परिस्थितियां इसकी इजाजत देती हैं। मगर वसुंधरा को इस बात का पूरा अहसास है कि यदि शेष बचे 40 महीनों में उनके समर्थकों को राजनीतिक नियुक्तियों और सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली तो उनके जनाधार पर असर पड़ सकता है। ऐसे में वो अपने नेताओं को आगे करने में जुटी है। सरकार के लिए कोई समस्या बनने के बजाय वसुंधरा अपना जनाधार मजबूत कर रही है। उन्हें पता है कि पार्टी सिर्फ टिकट देती है, जीत कार्यकर्ता और जनता पर निर्भर है। वो जानती है कि वसुंधरा के लिए इस वक्त मुख्यमंत्री पद से ज्यादा ज़रूरी अपने समर्थकों को राजनीतिक संरक्षण दिलाना है। ताकि अगले चुनाव तक उनके खेमे की ताकत बची रहे। अगर वे अभी चुप रहीं तो अगले विधानसभा चुनाव तक उनकी हैसियत पार्टी के भीतर और भी सीमित हो जाएगी।
वसुंधरा राजे ने सभा में कहा, “मौसम की तरह लोग भी बदल जाते हैं”। यह एक बहुत ही नपे-तुले शब्दों में दिया गया कटाक्ष था उन नेताओं पर जो कभी उनके साथ थे, अब सत्ता के साथ चल पड़े हैं। वसुंधरा की इस बात का सीधा मतलब था कि पार्टी में ऊपर तक संदेश जाए कि पुराने खेमे की अनदेखी पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।
भजनलाल सरकार : अब तक की उपलब्धि और असंतोष
भजनलाल शर्मा सरकार ने बीस महीनों में कई घोषणाएं कीं। जल जीवन मिशन के तहत पेयजल योजनाओं को तेज़ी से लागू करने, ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देने, बजट में युवाओं के लिए भर्तियां लाने, और महिलाओं के लिए कुछ योजनाओं की शुरुआत हुई। मगर ज़मीनी कार्यकर्ताओं और भाजपा के परम्परागत वोट बैंक तक इसका असर नहीं दिखा। आरपीएससी का स्वरूप बदलने, एसआई भर्ती परीक्षा रद्द नहीं करने जैसे कई निर्णय किए हैं। शिक्षा विभाग से बड़ी भर्ती की उम्मीद अभी बनी हुई है। डॉक्टर्स की बड़ी नियुक्ति करके बेरोजगारों को सहयोग करने के साथ ही ग्रामीण चिकित्सा प्रबंध बेहतर कर सकती है।
हताश हैं आम कार्यकर्ता
अभी तक राजनीतिक नियुक्तियों में देरी, मंत्रियों के असंतोष और ब्यूरोक्रेसी के वर्चस्व से आम कार्यकर्ता हताश है। भाजपा में एक बड़ा वर्ग मानता है कि सत्ता का अहसास कार्यकर्ताओं तक नहीं पहुंच पाया। नतीजा, भाजपा के जिलास्तरीय नेताओं में भी असंतोष है। यहां तक कि स्थानीय निकाय के चुनाव भी लंबित हैं। इससे स्वयं भाजपा के कार्यकर्ताओं में ही असंतोष साफ नजर आ रहा है। एक चुनाव कराने की सोच के बहाने चुनाव से बचने की कोशिश बताई जा रही है। कांग्रेस इसका प्रचार इसी तरीके से कर रही है।
छवि बेहतर, पर करीबियों का वर्चस्व खटक रहा
भजनलाल शर्मा अपनी सादगी, संगठन से जुड़ाव और साफ-सुथरी छवि के लिए जाने जाते हैं। मगर राजनीतिक संतुलन साधने में वो अपेक्षित तेजी नहीं दिखा पाए। वहीं मुख्यमंत्री और उनके करीबियों का वर्चस्व पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं को खटक रहा है। कभी मोदी और कभी अमित शाह के राजस्थान में कार्यक्रम कर भजनलाल दिल्ली में अपनी छवि चमका सकते हैं, लेकिन अगले विधानसभा चुनाव में ये खर्च काम नहीं आने वाला है। वहां तो पार्टी कार्यकर्ता को ही मजबूत और संतुष्ट करना पड़ेगा।
कांग्रेस : अंदरूनी सुलह या दिखावटी मेल?
दूसरी तरफ कांग्रेस में हाल ही में जो सियासी नजदीकियां दिखी हैं, वे आने वाले समय के संकेत हैं। सचिन पायलट का अशोक गहलोत के घर जाना और गहलोत का उनके कार्यक्रम में मंच साझा करना— इन दोनों घटनाओं को यूं ही सामान्य मुलाकात नहीं माना जा सकता।
दरअसल, कांग्रेस को अब यह समझ आ चुका है कि अगर 2028 के चुनाव में सत्ता में वापसी करनी है तो आपसी गुटबाज़ी का त्याग करना ही पड़ेगा। सचिन पायलट और अशोक गहलोत दोनों को इस हकीकत का एहसास है कि अलग-अलग चलकर कांग्रेस कभी सत्ता में नहीं लौट सकती। दोनों को एक साथ मिलकर राजस्थान के हर हिस्से में आयोजन करने होंगे। पार्टी के अंदरखाने चल रही राजनीति से बचना होगा। अगर कांग्रेस को फिर से सत्ता में आना है तो इन दोनों नेताओं की भूमिका को स्पष्ट करना होगा। पार्टी आलाकमान को अब ये तय करना होगा कि वो अगला चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ेंगे। कांग्रेस अब अगर टालमटोल करती रही तो यहां भी कार्यकर्ताओं में असंतोष मुखर हो जाएगा।
संतुलन बना रहा तो भाजपा के लिए चुनौती
पिछले चुनावों में कांग्रेस को जितनी सीटें मिली थीं, उनमें गहलोत के गढ़ जोधपुर, बीकानेर, चूरू, श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में मजबूत पकड़ थी। वहीं दौसा, अलवर, भरतपुर, करौली, सवाई माधोपुर में पायलट खेमे का प्रभाव था। यही संतुलन ही कांग्रेस की ताकत है। दोनों तरफ साफ संदेश देना होगा कि दोनों मिलकर सत्ता को वापस लेकर आएंगे। अगर ये दोनों नेता साथ आते हैं तो भाजपा के लिए बड़ा संकट खड़ा कर सकते हैं। क्योंकि गहलोत की संगठन पर मजबूत पकड़ और पायलट की युवा नेतृत्व वाली छवि— मिलकर भाजपा के परम्परागत वोट बैंक में सेंध लगा सकती है।
गहलोत की रणनीति : दिल भी रखना, दूरी भी बनाए रखना
अशोक गहलोत अपने पूरे राजनीतिक जीवन में संयमित भाषा, सधे हुए कदम और बारीक राजनीतिक चाल के लिए जाने जाते हैं। वे जानते हैं कि फिलहाल पायलट के साथ नजदीकी का संदेश देना ज़रूरी है। ताकि कार्यकर्ता और जनता को एकजुटता का अहसास हो। गहलोत ये भी भली-भांति समझते हैं कि पार्टी का पूरा नियंत्रण उनके हाथ में रहे। इसलिए वो पायलट को साइडलाइन करने की नीति भी नहीं छोड़ रहे। कांग्रेस में संगठन से जुड़े फैसलों में गहलोत अभी भी पूरी तरह हावी हैं।
सचिन पायलट की मजबूरी और महत्वाकांक्षा
सचिन पायलट अब तक कांग्रेस नेतृत्व से बार-बार संघर्ष कर चुके हैं। बगावत कर चुके हैं, हाईकमान से मनमाफिक पद और सत्ता की मांग कर चुके हैं। लेकिन अब सचिन को भी यह स्पष्ट हो गया है कि बिना गहलोत की छाया में, प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व हासिल कर पाना संभव नहीं। इसीलिए पिछले दिनों अपने पिता से जुड़े कार्यक्रम में वो गहलोत के साथ आए। उन्हें न्यौता देने भी गए और कार्यक्रम में उनके साथ भी रहे। सचिन पायलट अपनी राजनीतिक हैसियत बनाए रखने के लिए अब समझौते की नीति अपना रहे हैं। अगर वे अब भी बगावत करते हैं तो कांग्रेस नेतृत्व उन्हें पार्टी से बाहर कर सकता है और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है।
प्रदेश कांग्रेस की दूसरी पंक्ति : निष्क्रिय या अवसरवादी?
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा लगातार बयानबाज़ी कर चर्चा में बने रहते हैं। वहीं टीकाराम जूली भी अपने बयानों और यात्राओं के जरिये खुद को अगली पंक्ति में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले दिनों इन दोनों नेताओं के बीच भी तालमेल कम नजर आया। दोनों ने एक दूसरे की खिलाफत भी की। डोटासरा का विधानसभा में नहीं आना भी मुद्दा बना। ऐसे में गहलोत-पायलट की तरह डोटासरा-जुली में भी समन्वय होना जरूरी है, जिसकी फिलकाल कमी नजर आ रही है। बाकी कांग्रेस नेतृत्व लगभग निष्क्रिय है। वरिष्ठ नेता शांति धारीवाल, बीडी कल्ला जैसे पुराने नेता अपने क्षेत्र तक सीमित हो गए हैं। विधानसभा में भी धारीवाल की सक्रियता बेहद कम है। कांग्रेस की पूरी रणनीति गहलोत-पायलट समीकरण के इर्द-गिर्द ही सिमट गई है।
कौन किस पर भारी?
अभी तस्वीर अधूरी है। भाजपा में वसुंधरा राजे और मुख्यमंत्री के बीच सत्ता की रस्साकशी जारी है। भाजपा के लिए चुनौती है कि कार्यकर्ता को सक्रिय और संतुष्ट कैसे रखा जाए। अगर वसुंधरा के समर्थकों को उपेक्षित रखा गया तो इसका असर भाजपा के वोट बैंक पर दिखेगा।
वहीं कांग्रेस में गहलोत-पायलट का मेल सियासी मजबूरी है। यह सच्चा मेल है या दिखावटी, ये अगले साल तक साफ हो जाएगा। लेकिन एक बात तय है कि अगर कांग्रेस में गुटबाज़ी जारी रही तो फिर सत्ता वापसी मुश्किल होगी। राजस्थान की राजनीति अभी शतरंज की उस बिसात पर है, जहां हर मोहरा अपनी चाल चलने की फिराक में है। कौन वज़ीर बनेगा और कौन प्यादा— इसका फैसला आने वाले महीनों की राजनीतिक हलचलों से होगा।
वसुंधरा व भजन के दिल्ली दौरे से हुई हलचल
दिल्ली में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के हाल के दौरे को लेकर सियासी गलियारों में जमकर हलचल मची हुई हैं। वसुंधरा ने एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से करीब 20 मिनट तक मुलाकात की थी। उधर, मुख्यमंत्री भजनलाल ने भी उसी दिन प्रधानमंत्री से मुलाकात की। इस मुलाकात को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं। इसे प्रदेश की सियासत को लेकर काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि सीएम ने प्रदेश के विकास कार्यों और संरचनात्मक फीडबैक समेत विभिन्न विषयों के बारे में प्रधानमंत्री को अवगत करवाया हैं। इसको लेकर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पीएम मोदी से मुलाकात की एक तस्वीर भी अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर की हैं।






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