राजस्थान विधानसभा: गरिमा और जवाबदेही पर उठते सवाल
लोकतंत्र के इस मंदिर में जिस गरिमा और गंभीरता की अपेक्षा की जाती है, वह बार-बार तार-तार होती नजर...

विवेक श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार
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राजस्थान विधानसभा का हालिया बजट सत्र कई ऐतिहासिक और अप्रत्याशित घटनाओं का गवाह बना। आमतौर पर नीति-निर्धारण और प्रदेश की समस्याओं पर चर्चा के लिए आरक्षित यह पवित्र सदन इस बार व्यक्तिगत कटाक्ष, अमर्यादित टिप्पणियों और राजनीतिक नाटकों का अखाड़ा बनता दिखा। लोकतंत्र के इस मंदिर में जिस गरिमा और गंभीरता की अपेक्षा की जाती है, वह बार-बार तार-तार होती नजर आई।
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राजनीतिक बयानबाजी का हंगामा
सत्र के दौरान सबसे अधिक चर्चा मंत्री अविनाश गहलोत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर की गई टिप्पणी ने बटोरी। कांग्रेस ने इसे गंभीर मुद्दा बनाते हुए सड़क से सदन तक विरोध किया, जिससे पार्टी में लंबे समय बाद एकजुटता दिखाई दी। इस दौरान राजनीतिक विश्लेषकों की एक दिलचस्प टिप्पणी यह रही कि “गांधी नाम वो फेविकोल है जो बिखरी कांग्रेस को जोड़ देता है।” हालांकि, यह विवाद जल्द ही एक और अप्रिय घटना से दब गया।
डोटासरा विवाद और सदन की गरिमा पर प्रश्न
धरना प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी पर की गई अमर्यादित टिप्पणी ने सदन की गरिमा को और आहत किया। यह टिप्पणी सदन की कार्यवाही का हिस्सा नहीं थी, लेकिन इसके मीडिया में आने के बाद हंगामा मच गया। अध्यक्ष देवनानी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए यहां तक कह दिया कि “ऐसे सदस्य को सदन में रहने का अधिकार नहीं है।” इससे आहत डोटासरा ने सदन से दूरी बना ली और स्पष्ट कर दिया कि जब आसन से ही उनकी योग्यता पर प्रश्न उठाया गया तो वे किस मुंह से वापस जाएं।
नेताओं की जुबानी फिसलन
जब यह विवाद कुछ शांत हुआ ही था कि विधायक गणेश घोघरा ने सदन में अमर्यादित शब्दों का प्रयोग कर दिया। मामला यहीं नहीं थमा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने सरकार को आइफा अवॉर्ड समारोह पर घेरने के चक्कर में अभिनेत्री माधुरी दीक्षित को “सेकेंड ग्रेड” बता दिया। यह टिप्पणी भी विवादों में घिरी, हालांकि उन्होंने अगले दिन इस पर सफाई दे दी।
मंत्री और विधायकों की गैर- जिम्मेदारी
मंत्रियों की भूमिका भी इस सत्र में सवालों के घेरे में रही। किरोड़ीलाल मीणा ने सदन में स्वास्थ्य कारणों से अनुपस्थित रहने की अनुमति ली, लेकिन वे प्रदेशभर में सक्रिय नजर आए। उनकी भूमिका सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच झूलती दिखी, जिससे सरकार की अंदरूनी रणनीति पर भी सवाल खड़े हुए। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे ने सदन में उपस्थित न होकर अपनी पुरानी परंपरा को बनाए रखा। दोनों नेता तभी विधानसभा आते हैं जब वे सदन के नेता होते हैं। इसी कड़ी में अशोक चांदना भी नजर आए, जो इस सत्र से पूरी तरह नदारद रहे। यह दावा किया जा रहा है कि वे अपनी माइंस से जुड़े प्रकरणों में व्यस्त हैं, लेकिन हिंडौली की जनता ने उन्हें जिस जिम्मेदारी के लिए चुना, वह सदन में दिखी ही नहीं।
सवाल पूछने से कतराते माननीय
विधानसभा का मूल उद्देश्य है कि जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हो, लेकिन यह उद्देश्य कितना पूरा हुआ, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट समेत सात विधायकों ने एक भी सवाल नहीं पूछा। हालांकि, 167 विधायकों ने सवाल उठाए और कुल 9800 प्रश्न विधानसभा में दर्ज हुए, लेकिन सवाल यह है कि जो बड़े नेता खुद को जनता का प्रतिनिधि कहते हैं, वे सदन में अपनी भूमिका से क्यों बचते रहे?
ब्यूरोक्रेसी की सुस्ती और सत्ता पक्ष की नाराजगी
इस बार का सत्र न केवल राजनीतिक हंगामे से भरा रहा, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी गंभीरता की कमी देखी गई। मंत्रियों और विधायकों की रुचि कम दिखी तो अफसरशाही ने भी इसे हल्के में लिया। मंत्रियों के जवाबों में कई बार स्पष्टता और तैयारी की कमी नजर आई, जिससे खुद विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी नाराज हुए। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भी विधायक दल की बैठक में सख्त लहजे में नाराजगी जताई, लेकिन ब्यूरोक्रेसी पर इसका असर सीमित रहा।
सत्र का निष्कर्ष: क्या सीख मिली?
राजस्थान विधानसभा का यह सत्र उन मुद्दों से ज्यादा सुर्खियों में रहा, जो सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले थे। जिस सदन से जनता को उम्मीदें हैं, वहां व्यक्तिगत कटाक्ष, गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी और सत्तापक्ष-विपक्ष के बीच निजी टकराव अधिक देखने को मिला। सत्तारूढ़ विधायकों की मंत्रियों से नाराजगी, नौकरशाही की निष्क्रियता और विपक्ष की राजनीति ने यह साबित किया कि लोकतंत्र की सबसे अहम संस्था की मर्यादा को बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना होगा। जनता अपने प्रतिनिधियों को सदन में इसलिए नहीं भेजती कि वे एक-दूसरे पर कटाक्ष करें या गैर-जिम्मेदार बयान दें, बल्कि इसलिए कि वे उनकी समस्याओं को हल करने के लिए गंभीरता से चर्चा करें। यह अपेक्षा की जाती है कि भविष्य में जनप्रतिनिधि सदन की गरिमा को सर्वोपरि रखेंगे और इस सत्र में जो हुआ, उसे दोहराने से बचेंगे।






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