बिहार से मिलेगा बल
कांग्रेस इस समय जिन राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है, उसमें ऐसा नेतृत्व विशेष रूप से आवश्यक हो जाता है जो न केवल संगठन को संभाले, बल्कि गठबंधन राजनीति की जटिलताओं से भी सधे हुए तरीके से निपटे।...

राष्ट्रीय राजनीति में फिर कदम बढ़ा सकते हैं गहलोत
सुरेश व्यास,
राजनीतिक विश्लेषक
Table Of Content
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत न सिर्फ इन दिनों राजस्थान में अत्यधिक सक्रिय नजर आ रहे हैं, बल्कि अब धीरे- धीरे राष्ट्रीय राजनीति में उनकी अहमियत को स्थान मिलने लगा है। हाल ही बिहार विधानसभा चुनाव के बीच विपक्षी दलों के महागठबंधन के बीच बढ़ी खींचतान और महागठबंधन के बिखरने के खतरे के बीच गहलोत ने अपनी सियासी जादूगरी दिखाते हुए एकदम ही स्थिति को बदल दिया। बिहार विधानसभा चुनावों की घोषणा होने के बाद से जिस तरह महागठबंधन में असंतोष के सुर उठे और आखिरी समय तक टिकट बंटवारा तक नहीं हो पाने से लगने लगा कि महागठबंधन जीती हुई बाजी हारने जा रहा है, उस दौर में गहलोत ने बिहार चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ पर्यवेक्षक के रूप में पटना पहुंच कर हालात को ऐसे सम्भाला कि महागठबंधन को लेकर चल रही सारी अवधारणाएं निर्मूल साबित हुई।
इतना ही नहीं गहलोत ने संयुक्त प्रेस क़ॉन्फ्रेंस के दौरान बिहार में महागठबंधन के सबसे बड़े घटक राष्ट्रीय जनता दल के युवा नेता तेजस्वी यादव को बिहार के मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में प्रस्तुत कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सामने सियासी परेशानी की स्थिति पैदा कर दी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जिनकी अगुवाई में एऩडीए बिहार में चुनाव लड़ रहा है, उनकी दुखती रग पर हाथ रख दिया। और तो और उन्होंने विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के मुखिया और बिहार के अतिपिछड़ा वर्ग पर पकड़ रखने वाले मुकेश सहनी को उप मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करके भी एनडीए के लिए उलझन पैदा कर दी। यानी एक ही तीर से कई शिकार।
मनोवैज्ञानिक रूप से मजबूती के संकेत
पहला महागठबंधन में टिकट वितरण को लेकर चल रहा असंतोष खत्म सा हो गया। दूसरा तेजस्वी की महत्वाकांक्षा को पूरा किया गया। तीसरा उन्हें सीएम फेस घोषित कर एनडीए के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी की गई, क्योंकि एनडीए के नेता और केंद्रीय गृह मंत्री ने नीतीश कुमार को सीएम पद का चेहरा घोषित करने से साफ इनकार कर रखा है। गहलोत के इस कदम से महागठबंधन को न सिर्फ मनोवैज्ञानिक रूप से बढ़त मिलती है, बल्कि नीतीश कुमार की दुखती रग को भी उन्होंने छेड़ दिया है। चौथा तीर ये कि एक ही घोषणा से बिहार में युवा बनाम 74 साल के नीतीश कुमार के बीच मुकाबले की स्थिति पैदा कर दी गई। हालांकि गहलोत ने पर्यवेक्षक बनने के बाद नीतीश कुमार के बीस साल के शासन को लेकर पिछले दिनों चार्जशीट जारी कर बिहार में शिक्षा व रोजगार की स्थिति को मुद्दा बनाया था। उस वक्त वे नीतीश के प्रति ज्यादा आक्रामक दिखे थे, लेकिन जब महागठबंधन की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई तो उनके शब्दों में नरमी दिखी। गहलोत ने कहा, “हमारी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष से नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था से है जो बिहार को पिछड़ेपन की ओर ढकेल रही है।” इन शब्दों का राजनीतिक रूप से बड़ा निहितार्थ है। गहलोत ने नीतीश के लिए विकल्प खुला रखने के साथ संकेत दिया है कि जरूरत पड़ी तो महागठबंधन नीतीश से हाथ मिलाने से भी नहीं हिचकेगा।
कुल मिलाकर गहलोत के एक दौरे ने जिस तरह से स्थिति को सम्भालते हुए महागठबंधन में डैमेज कंट्रोल किया है, उससे एक बार फिर साफ साबित हो गया कि वे एक कुशल और अनुभवी राजनेता ही नहीं, वक्त की नजाकत के अनुरूप फैसले लेकर बड़ा संकट भी चुटकियों में निपटा सकते हैं।
पहले भी संकटमोचक बन चुके हैं गहलोत
उन्होंने सिर्फ बिहार में ही अपना सियासी कौशल नहीं दिखाया है। इससे पहले भी वे कई बार कांग्रेस के लिए संकटमोचक बन चुके हैं। चाहे वर्ष 2017 में गुजरात से कांग्रेस के प्रमुख नेता अहमद पटेल के राज्यसभा चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग के मामले को गम्भीर प्रयासों से हैंडल कर मोदी-शाह की कोशिशों पर पानी फेरने का मामला हो या फिर साल 2022 के गुजरात चुनाव में “सॉफ्ट हिंदुत्व” के जरिए भाजपा को कड़ी चुनौती देने का मामला हो। उन्होंने कांग्रेस के भीतर भी कई संकट मिटाए हैं। चाहे हरियाणा के नेता भूपेंद्र हुड्डा और शैलजा के बीच तकरार हो या फिर कर्नाटक में सियासी संकट के दौरान कांग्रेस की सरकार को बचाने का मामला हो।
एक वक्त में जब देश में मोदी-शाह की जोड़ी के ऑपरेशन लॉटस का खौफ फैला हुआ था और कई राज्यों में सरकारों को बदलते देखा गया। उसी दौर में राजस्थान में हुई ऐसी ही कोशिश को गहलोत ने न सिर्फ अपने राजनीतिक कौशल से विफल किया, बल्कि सरकार बनाए रखी। हालांकि इस दौर में उन्होंने कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट से अदावत पाल ली और इसका असर उनकी राजनीति पर भी पड़ा। गहलोत-पायलट विवाद की वजह से ही वे कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से चूक गए और इतनी बड़ी जिम्मेदारी ठुकरा कर सचिन के लिए राजस्थान की कुर्सी खाली करने के लिए तैयार नहीं हुए।
इसके बाद गहलोत सरकार की बेहतर छवि के बावजूद अपनी सरकार नहीं बचा पाए और राजस्थान में पांच साल बाद बदलाव की परम्परा कायम रह गई। तभी से गहलोत के सम्बन्ध आलाकमान से ठीक नहीं रहे और वे धीरे- धीरे साइड लाइन नजर होते आए। चुनाव में हार और पायलट से लम्बे समय तक चली खींचतान के कारण आलाकमान से सम्बन्धों में आई खटास के चलते उनकी राष्ट्रीय स्तर पर उभरने की संभावनाएं लगभग खत्म होती नजर आई, जबकि गहलोत इंदिरा गांधी के जमाने से आलाकमान के चहेते नेता रहे थे। बदली हुई सियासी परिस्थितियां गहलोत के लिए भी किसी सैटबैक से कम नहीं रही। पिछले पच्चीस साल में पहली बार वे कुछ महीनों पहले पटना में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में नहीं दिखे। इसके विपरीत उनके प्रतिद्वन्द्वी पायलट कांग्रेस महासचिव के रूप में अगली पांत में बैठे थे। यह स्थापित तथ्य है कि गहलोत कभी कांग्रेस की सरकार राजस्थान में रिपीट नहीं करवा पाए, फिर भी उन्हें केंद्रीय राजनीति में जगह मिलती रही है।
गहलोत के लिए भी उम्मीद की किरण
अब बिहार में महागठबंधन की राजनीतिक उलझनों को सुलझाने और सहयोगी दलों के बीच तालमेल बनाने में उनके हस्तक्षेप ने गहलोत के लिए एक उम्मीद की किरण दिखाई है। गहलोत को कांग्रेस में हमेशा राजनीतिक दांव-पेंच को शांति से साधने की कला में महारत रखने वाले नेता के रूप में देखा गया। उनके विरोधी भी मानते हैं कि गहलोत मुश्किल हालात में भी पार्टी के लिए लाभकारी समाधान निकालने में माहिर हैं और उनकी इसी कला की वजह से कई लोग उन्हें राजनीति का जादूगर भी कहते हैं।
प्रेक्षकों का मानना है कि गहलोत ने बिहार में फिलहाल डैमेज कंट्रोल प्रभावी ढंग से कर लिया है और इसके चलते यदि महागठबंधन को चुनावी सफलता मिलती है तो वे एक बार फिर कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख नेता के रूप में उभर सकते हैं। कांग्रेस की मौजूदा स्थितियां भी उनके लिए मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। अब पायलट के साथ उनका विवाद भी थमता नजर आ रहा है। वे कई मौकों पर एक साथ नजर आने लगे हैं। दोनों के बीच अब यह समझ भी बनने लगी है कि कांग्रेस की वर्तमान परिस्थितियों में आपसी संघर्ष पार्टी की कमजोरी को ही बढ़ाएगा।
कांग्रेस को जरूरत भी है
गहलोत की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उनका संगठनात्मक अनुभव और पक्ष-विपक्ष दोनों के बीच संवाद स्थापित करने की कुशलता है। राजस्थान में सरकार गिराने की कई कोशिशों के बावजूद पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा कराना, गहलोत की रणनीतिक क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा सकता है। कांग्रेस इस समय जिन राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है, उसमें ऐसा नेतृत्व विशेष रूप से आवश्यक हो जाता है जो न केवल संगठन को संभाले, बल्कि गठबंधन राजनीति की जटिलताओं से भी सधे हुए तरीके से निपटे।
खरगे का स्वास्थ भी चिंता
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अपनी राजनीतिक क्षमता और अनुभव के बावजूद बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से व्यापक संगठनात्मक गतिविधियों में शायद इतना काम नहीं कर पा रहे हैं। हाल ही उन्हें अचानक अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और हृदय रोग का उपचार करवाना पड़ा। हालांकि खरगे मौके-बमौके सक्रियता दिखाने से नहीं चूकते, लेकिन खरगे की अस्सी साल से ज्यादा की उम्र और बीमारी को देखते हुए कांग्रेस के लिए भी भविष्य की रणनीति पर सोचने की मजबूरी खड़ी की है। हालांकि खरगे अपना कार्यकाल पूरा करेंगे, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व कार्यकारी अध्यक्ष जैसी व्यवस्था करने पर विचार कर सकता है। कारण कि लगातार बढ़ते चुनावी दबाव में कांग्रेस के लिए ऐसा करना अपरिहार्य हो जाएगा। इन हालात में गहलोत का नाम स्वाभाविक रूप से उन नेताओं के रूप में गिनाया जा सकता है, जो इस चुनौतीपूर्ण दौर में पार्टी को दिशा देने की क्षमता रखते हों।
चुनौतियों से निपटने में माहिर
कांग्रेस कई चुनौतियों से गुजर रही है, जैसे उत्तर भारत में कमजोर होती पकड़, गठबंधन राजनीति में घटती हिस्सेदारी और 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी। इन सभी में गहलोत की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। कांग्रेस को इस समय ऐसे अनुभवी और व्यावहारिक नेतृत्व की जरूरत है जो विभिन्न राज्यों में कमजोर पड़ते संगठन को मजबूत करे और विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस की स्थिति को केंद्र में बनाए रखे। क्षेत्रीय दलों के नेता गहलोत को बातचीत करने योग्य और समझौते की जमीन तलाशने वाले नेता के रूप में देखते हैं, जो विपक्षी गठबंधन की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकते हैं। कारण कि गहलोत का सरल और मृदुभाषी स्वभाव उनके भीतर छिपे गहरे कूटनीतिक राजनेता को ढक देता है। वे हर शब्द को नापतोल कर बोलते हैं, जिसका गहरा अर्थ होता है। अपनी इसी विशेषता के चलते उन्हें जब भी सियासी उलझने सुलझाने की जिम्मेदारी मिली, उन्होंने उसे बखूबी पूरा किया। बिहार में उन्होंने एक बार फिर साबित किया है कि वे सियासी संघर्ष सुलझाने में माहिर हैं।
क्या बिहार खोलेगा रास्ता
अब देखना यह है कि बिहार की राजनीति गहलोत के लिए कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति में निर्णायक वापसी का कोई रास्ता खोलेगी या केवल एक अस्थायी जिम्मेदारी तक सीमित रहेगी। हालांकि जानकार मानते हैं कि बिहार में उनकी भूमिका महज क्षेत्रीय हस्तक्षेप नहीं, बल्कि यह गहलोत को राष्ट्रीय स्तर पर फिर से आगे बढ़ाने की प्रक्रिया का संकेत भी है। कारण कि बिहार में उनके सियासी कौशल ने कांग्रेस नेतृत्व को यह सोचने पर विवश जरूर किया है कि गहलोत अभी भी पार्टी की रणनीतिक जरूरत हैं और उनके अनुभव का उपयोग राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक रूप से किया जाना चाहिए।






No Comment! Be the first one.