सत्ता-संगठन की खींचतान में नए समीकरणों की आहट
राजस्थान की राजनीति इन दिनों गहन हलचल से गुजर रही है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के दिल्ली दौरों और वसुंधरा राजे की सक्रियता ने भाजपा के भीतर बदलाव की अटकलों को हवा दी...

राजस्थान की सियासत: बदलते समीकरणों के पीछे की हलचल
सुरेश व्यास,
वरिष्ठ पत्रकार
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कहते हैं, राजनीति में कुछ भी निश्चित नहीं होता। जो दिखाई देता है, वह होता नहीं, और जो होता है, वह अक्सर दिखाई नहीं देता। यही हाल इन दिनों राजस्थान की राजनीति में नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का दिल्ली जाना कई अटकलों को जन्म देता है, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात इन अटकलों को और हवा दे देती है। भले ही हकीकत में ऐसा कुछ न हो रहा हो, लेकिन कयासों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। इसमें दो राय नहीं कि राजस्थान की राजनीति, खासकर भाजपा के अन्दरखाने, भारी हलचल से गुजर रही है।
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बात राजस्थान की राजनीति की ही नहीं है, दिल्ली में भी पिछले करीब एक सवा माह से यही हाल हैं। राजस्थान के जाए जन्में ख्यातनाम वकील जगदीप धनखड़ संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन उप राष्ट्रपति पद से अचानक इस्तीफा देकर राजनीतिक भूचाल ला देते हैं। इस्तीफे के एक माह बाद भी उनका पता नहीं चलता कि वे हैं कहां? क्यों मौन हैं? क्यों सामने नहीं आ रहे? क्या प्रधानमंत्री मोदी से उनकी अदावत इतनी बढ़ गई है कि नया उप राष्ट्रपति चुने जाने तक धनखड़ उप राष्ट्रपति निवास से बाहर ही नहीं आ सकेंगे और न किसी से मिल सकेंगे व न किसी से बात कर सकेंगे? सूत्रों के अनुसार सिर्फ घर में योगा करके स्टाफ के साथ टेनिस खेलते रहेंगे।
इधर, मानसून सत्र में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग की ओर से करवाए जा रहे मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) के मुद्दे पर चर्चा की मांग को लेकर चल रहे हंगामे के बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के पीएम मोदी पर वोट चोरी के आरोप से सरकार एक और दुविधा में घिरी नजर आती है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को लेकर चल रही राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) से तनातनी के कारण मोदी-शाह की जोड़ी पहले से ही तनाव में है। पहले तो मोदी आरएसएस की प्रशंसा लाल किले की प्राचीर से करके विवाद में घिरने से भी नहीं चूके और बाद में उप राष्ट्रपति पद के लिए उन्हें एनडीए प्रत्याशी के रूप में आरएसएस से जुड़े रहे महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को चुनना पड़ा। भाजपा अध्यक्ष के चुनाव की बात तो लगातार ठंडे बस्ते में डालनी ही पड़ रही है।
मोदी-शाह संतुष्ट नहीं
आलाकमान की ऐसी स्थितियों के बीच मुख्यमंत्री के दौरों और वसुंधरा की मोदी से मुलाकातों को राजस्थान में किसी बदलाव से जोड़ना समझ से परे नजर आता है। राजनीतिक विश्लेषक हालांकि मानते हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में भजनलाल के कामकाज से मोदी-शाह संतुष्ट नहीं हैं। दिल्ली पहुंच रहा उनका फीडबैक भी कोई अच्छा नहीं है। न भजनलाल सरकार को कोई ऐसा काम दिख रहा है, जो उपलब्धि के रूप में गिनाया जा सके। फिर भी मुख्यमंत्री बदलने की बात फिलहाल तो नजर आ नहीं रही।
दिल्ली में राजस्थान से जुड़े एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि राजस्थान में मुख्यमंत्री बने भजनलाल को डेढ़ साल से ज्यादा का वक्त हो गया है। यह वह समय है, जब पार्टियां अगले चुनाव की तैयारी में जुटने की कोशिश करती है। जाहिर है फिर मुख्यमंत्री और सरकार के कामकाज की समीक्षा भी होती है, लेकिन भजनलाल के मामले में तो यही कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री के पद के लिए उनके नाम की पर्ची किस्मत से खुली थी और ये किस्मत ही उन्हें अभी तक पद पर बनाए हुए हैं। दिल्ली में परिस्थितियां बदली हुई नहीं होती तो अभी राजस्थान समेत दो या तीन राज्यों के भाजपा मुख्यमंत्री बदल गए होते। अभी उपराष्ट्रपति चुनाव से पहले या यूं कहें कि बिहार चुनाव के नतीजे आने तक इस सम्बन्ध में कोई कयास लगाना समीचीन प्रतीत नहीं होता।
वसुंधरा की सक्रियता के मायने
वसुंधरा की सक्रियता पर भाजपा के सूत्रों का कहना है कि ये कोई नई बात नहीं है। संसद सत्र के दौरान प्रधानमंत्री भले ही सदन में नहीं जाएं, लेकिन संसद भवन स्थित अपने दफ्तर में मौजूद रहते हैं। यह ऐसा वक्त होता है, जब किसी से भी मुलाकात आसानी से हो सकती है। वसुंधरा भी लम्बे समय से पीएम से मिलना चाह रही थी, तो उन्हें मौका मिल गया। फिर मौजूदा सियासी हालात में इस मुलाकात के कोई न कोई राजनीतिक निहितार्थ हो सकते हैं, लेकिन वसुंधरा को राजस्थान की गद्दी सौंपना मोदी के लिए भी इतना आसान नहीं होगा। हां, संघ-भाजपा की तनातनी में बीच के रास्ते में उन्हें भाजपा अध्यक्ष पद लाने का बीच वाला रास्ता जरूर निकल सकता है। सम्भवतः इस मुद्दे पर ही वसुंधरा से कोई बात हुई होगी। लेकिन मोदी के मन में क्या है, वह उनके अलावा कोई जान नहीं सकता।
बिना सिर- पैर की अटकलें
इन सूत्रों का कहना है कि भजनलाल के दिल्ली दौरों में भी सरकार के कामकाज, मंत्रिमंडल के विस्तार या पुनर्गठन व चुनाव से पहले माहौल बनाने के लिए राजनीतिक नियुक्तियों के मुद्दे पर जरूर बात हुई है। इसके अलावा कोई बात अटकलें ही हो सकती हैं और अटकलों के सिर पैर नहीं होते। सूत्रों के अनुसार गुजरात में विजय रूपानी को हटाकर भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाने जैसा फैसला गुजरात में दोहराए जाने के साथ राजस्थान में भी लागू किया जा सकता है, लेकिन अभी हालात ऐसे फैसलों की अनुमति नहीं देते।
नेताओं की धड़कनें बढ़ी
फिलवक्त, इन अटकलों के बीच भाजपा के स्थानीय नेताओं की धड़कनें जरूर बढ़ी हुई है। कारण है मंत्रिमंडल का विस्तार य़ा पुनर्गठन और राजनीतिक नियुक्तियां। धड़कनें उन मंत्रियों की भी बढ़ी हुई है, जिन्हें हटाने या जिनके विभाग बदलने की चर्चाएं हो रही हैं। इसके पीछे भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ का वह बयान भी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि सत्ता संगठन से है। संगठन सत्ता बनाता है। भाजपा में कोई कुर्सी के लिए काम नहीं करता। उन्होंने साफ शब्दों में यह भी कह दिया था कि कुछ मंत्रियों को संगठन में भी लिया जा सकता है। कारण कि अभी तक राठौड़ प्रदेश कार्यकारिणी भी नहीं बना पाए हैं और ऐसे में मंत्रियों को संगठन में लेने का उनका बयान काफी कुछ इशारा करता है। यह अलग बात है कि ऐसा कब होता है।
जहां तक राजनीतिक नियुक्तियों और मंत्रिमंडल का सवाल है, दिल्ली के बदले हुए हालात ने कई लोगों के लिए आपदा में अवसर का मौका दे दिया है। माना जा रहा है कि जिस तरह अरुण चतुर्वेदी को राज्य वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है, उसी तरह कई उन पुराने नेताओं की लॉटरी भी खुल सकती है, जिन्हें अब तक भजनलाल सरकार में पूरी तवज्जो नहीं मिली है। इसी तरह वसुंधरा राजे समर्थक कई विधायक भी इस अवसर पर मंत्री पद हासिल करने का मंसूबा पाले हुए घूम रहे हैं। फिर दोहराना पड़ रहा है कि होगा क्या, यह निश्चित नहीं है, लेकिन जो होगा, वो चौंकाने वाला जरूर होगा।






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