मानसून सत्र में ‘इस्तीफा बम’
इसमें कोई दो राय नहीं है कि धनखड़ का उपराष्ट्रपति पद से कार्यकाल पूरा होने से लगभग दो साल पहले इस्तीफा देना देश को लोकतांत्रिक इतिहास की बड़ी और अहम घटना है। यह घटना तेजी से बदल रहे राजनीतिक...

उपराष्ट्रपति धनखड़ के त्याग पत्र पर सिर्फ अटकलें ही बनी खबर
सुरेश व्यास,
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में यह पहली बार हुआ है जब किसी उपराष्ट्रपति ने कार्यकाल पूरा होने से पहले स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से इस्तीफा दिया। हालांकि पूर्व में भी कई उपराष्ट्रपति इस्तीफा दे चुके हैं, लेकिन तब उन्हें राष्ट्रपति का पदभार सम्भालना था। ऐसे उपराष्ट्रपति वीवी गिरी से लेकर शंकरदयाल शर्मा तक रहे हैं, लेकिन किसी ने बीच में ऐसे पद नहीं छोड़ा, जैसे निवर्तमान उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने त्याग-पत्र दिया है।
धनखड़ ने संसद के 21 जुलाई को शुरू हुए मानसून सत्र के पहले दिन ही इस्तीफा बम फोड़ दिया, लेकिन अभी तक यह खुलासा नहीं हो पाया कि इस्तीफे के पीछे असली कारण क्या है। मैनस्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर जो कुछ भी सामने आया है, वह सिर्फ अटकलों पर आधारित है। कयास लगाए जा रहे हैं और सिर्फ सम्भावनाएं जताई जा रही है। इस बारे में न तो सरकार ने कुछ कहा है और न ही धनखड़ अभी तक सामने आए हैं। उनका आखिरी ट्वीट भी उनका इस्तीफा ही था, जो उन्होंने 21 जुलाई की रात 9 बजकर 35 मिनट पर सोशल मीडिया साइट एक्स (पूर्व में ट्वीटर) पर पोस्ट किया था।
इसके बाद कई तरह की खबरें फैली कि धनखड़ को तुरंत उपराष्ट्रपति आवास खाली करने को कहा गया है और उनके सोशल मीडिया से जुड़े स्टाफ को हटा दिया गया है। हालांकि सरकार ने इसका पीआईबी फैक्ट चैक के सहारे खण्डन भी करवा दिया, लेकिन अटकलें हैं कि रूक ही नहीं रही। यहां तक बात होने लगी कि धनखड़ और उनकी पत्नी के मोबाइल फोन स्विच-ऑफ करवा दिए गए। खाना भी बाहर से आ रहा है, यानि एक तरह से धनखड़ के हाउस अरेस्ट जैसी स्थिति बताई जा रही है। हालांकि सभी बातें बिना सिर पैर के हो रही है और दोनों ओर से चुप्पी इन्हें अलग ही हवा दे रही है। दस दिन बाद भी स्थिति स्पष्ट न हो तो ऐसी बातों को और अधिक बल मिलने लगता है और अभी ऐसा ही हो रहा है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि धनखड़ का उपराष्ट्रपति पद से कार्यकाल पूरा होने से लगभग दो साल पहले इस्तीफा देना देश के लोकतांत्रिक इतिहास की बड़ी घटना है। यह घटना तेजी से बदल रहे राजनीतिक दृष्टिकोण और सियासी जमातों के बीच आपसी विश्वास में लगातार आ रही कमी से उत्पन्न होने वाली खतरनाक स्थितियों की ओर इशारा करती है। कारण कि जिस तरह से इस्तीफा देश और दुनिया के सामने आया, उसने कई सवालों को जन्म दे दिया, क्योंकि धनखड़ ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के यहां बिना औपचारिक अपोइन्टमेंट रात नौ बजे अचानक पहुंच कर इस्तीफा सौंपा और इसमें कारण बताया अपने स्वास्थ्य को। माना कि धनखड़ का स्वास्थ्य पिछले दिनों नासाज हुआ था। वे एम्स में भर्ती भी रहे। इसके बाद उत्तराखण्ड यात्रा के दौरान भी वे कुछ देर के लिए अस्वस्थ हो गए, लेकिन जिस दिन उन्होंने इस्तीफा दिया, उस पूरे दिन कभी भी धनखड़ के अस्वस्थ होने का अहसास भी नहीं हुआ।
मानसून सत्र के पहले दिन उन्होंने राज्यसभा की कार्रवाई शुरू होते ही न सिर्फ सदन के सदस्य रहे दिवंगतों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जरूरी दस्तावेज सदन पटल पर रखवाए और चार नए सदस्यों को शपथ दिलाई, बल्कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर जैसे मुद्दे पर विपक्ष की ओर से रखे गए काम रोको प्रस्तावों को नामंजूर भी किया। इसी दौरान नामंजूरी पर आपत्ति दर्ज करवा रहे विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को उन्होंने बोलने का मौका दिया और जवाब के लिए नेता सदन व स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को भी जवाब देने को कहा। इस दौरान हंगामे के बीच एक ऐसी घटना हुई, जिसमें नड्डा विपक्ष की ओर मुखातिब होकर यह कहते हुए सुने-देखे गए कि ‘नथिंग विल गो ऑन रिकॉर्ड, ओनली गो इन रिकॉर्ड वाट आई एम सेइंग…’ यानी सदन की कार्रवाई में कुछ नहीं जाएगा, जो वे बोल रहे हैं वो ही रिकॉर्ड होगा।
यूं देखा जाए तो नड्डा का ये बयान बड़ी घटना थी, जिसने एक बार तो सदन के आसन पर बैठे धनखड़ को भी असहज किया होगा, लेकिन उन्होंने इसे जाहिर नहीं होने दिया। यदि धनखड़ का इस्तीफा नहीं आता तो ये बयान निश्चित रूप से बड़ा मुद्दा बनता। कई लोग इसी बयान को धनखड़ के इस्तीफे के पीछे का एक कारण भी मानते हैं, लेकिन इसके बाद हुए घटनाक्रम की कड़ियां जुड़ने से अटकलों को इतना बल मिला कि सच्चाई अभी तक सामने नहीं आई कि आखिर हुआ क्या, जिसकी वजह से धनखड़ ने मैदान छोड़ दिया। सरकार के तुरंत इस्तीफे का नोटिफिकेशन जारी करते ही चुनाव आयोग ने भी नए उपराष्ट्रपति के चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। यानी किसी ने धनखड़ को मनाने की कोशिश भी नहीं की। इससे इन अटकलों को बल मिला कि धनखड़ ने इस्तीफा दिया नहीं, उनसे इस्तीफा लिया गया है। अब सवाल यही है कि इस्तीफा मांगने की नौबत क्यों आई?
कई बार असहज हुई सरकार
जानकार बताते हैं कि धनखड़ के बयानों ने कई बार सरकार के लिए असहज स्थिति उत्पन्न की थी। खासतौर पर विपक्षी नेताओं को निशाने पर लिए गए उनके राजनीतिक बयान और न्यायपालिका को ‘सुपर संसद’ कह देने जैसे वक्तव्य जैसे ये संकेत दे रहे थे कि धनखड़ ऐसा सरकार के इशारे पर बोल रहे हैं। इस्तीफे से कुछ घंटे पहले भी न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर उन्होंने तल्खी दिखाई।
सदन में सकपका गए मंत्री
दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहते जस्टिस यशवंत वर्मा के घर जली हुई हालत में मिली लाखों की नगदी के मुद्दे पर पहले से हमलावर रहे धनखड़ ने राज्यसभा में विपक्ष की ओर से उन्हें हटाने के लिए दिए गए महाभियोग प्रस्ताव को राज्यसभा के सभापति के तौर पर उन्होंने मंजूरी दे दी। ऐसे में अपनी ओर से पक्ष-विपक्ष का प्रस्ताव लोकसभा में पेश करने की तैयारी कर रही सरकार को जोर का झटका लगा। धनखड़ जब राज्यसभा में विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव मंजूर कर रहे थे, उस वक्त सदन में मौजूद विधि मंत्री अर्जुनराम मेघवाल असहज नजर आए। जब धनखड़ ने उनकी ओर मुखातिब होकर पूछा कि क्या लोकसभा में भी ऐसा प्रस्ताव आया है, तो उन्होंने सकपकाते हुए ही जवाब दिया कि हां, ऐसा नोटिस लोकसभा स्पीकर को सौंपा गया है।
तो यूं लिखी गई पटकथा
वरिष्ठ पत्रकार के.पी. मलिक कहते हैं कि इसी घटना ने शायद धनखड़ के इस्तीफे की पटकथा लिख दी औरसदन स्थगित होने के बाद जब राज्यसभा के चेयरमैन बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (बीएसी) की दोपहर में स्थगित हुई बैठक की अध्यक्षता करने पहुंचे तो सदन के नेता नड्डा, संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू और संसदीय कार्यमंत्री अर्जुन मेघवाल को नदारद पाकर चौंक गए। जब उन्हें भाजपा के ही एक बीएसी सदस्य ने बताया कि मंत्री किसी और बैठक में व्यस्त हैं तो धनखड़ उखड़ गए और बैठक फिर अगले दिन के लिए टाल दी।
यह भी खूब रही चर्चा
यहां तक तो सब ठीक था, लेकिन संसद के एक दूसरे गलियारे में अचानक हुई हलचल ने आग में घी का काम किया। कहा जाता है कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ राज्यसभा में विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव मंजूर होने की सूचना ने सरकार को सहमा दिया। प्रधानमंत्री ने वरिष्ठ मंत्रियों के साथ बैठक की। इसमें जवाबी कार्रवाई का कोई प्लान बना। इसके तहत राज्यसभा के भाजपा व एनडीए सदस्यों को दस- दस के समूह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के चैम्बर में बुला कर कथित रूप से खाली कागजों पर हस्ताक्षर करवाए गए और इस मुद्दे पर कठोर गोपनीयता बरतने की सलाह दी गई। इसे धनखड़ को हटाने की कोशिशों के रूप में देखा गया। इसके बाद यह भी अटकल सामने आई कि शाम करीब सात बजे प्रधानमंत्री के दूत के रूप में किसी वरिष्ठ नेता ने धनखड़ को फोन करके कथित रूप से कहा कि ‘अब बहुत हो गया है…।’ इस दौरान हुई बातचीत के बाद धनखड़ ने इस्तीफा देने का मन बनाया और अचानक राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद सोशल मीडिया पर इस्तीफा बम फोड़ दिया।
इस्तीफा दिया या लिया
इस्तीफे के पंद्रह घंटे बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस ढंग से सोशल मीडिया साइट पर प्रतिक्रिया दी, उससे यह तो साफ संकेत मिल गया कि सरकार उनसे बेहद खफा थी। मोदी की यह प्रतिक्रिया भी उनका इस्तीफा नोटिफाई होने यानी आम भाषा में त्यागपत्र मंजूर होने के बाद आई। जिस तेजी से इस्तीफा मंजूर हुआ, उससे भी यह बात सही होती दिखी कि इस्तीफा लिया गया है धनखड़ से।
विपक्ष से बढ़ता मेलजोल
संसद के मानसून सत्र से पहले विपक्ष की आंख की किरकिरी बने धनखड़ के इस्तीफे का एक कारण उनकी इस्तीफे से पहले विपक्षी नेताओं के साथ बढ़ती नजदीकियों को भी माना जा रहा है। ऐसा कांग्रेस की ओर से धनखड़ के इस्तीफे के पीछे ‘दाल में कुछ काला’ वाला बयान या कांग्रेसाध्यक्ष खरगे व आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से उनकी मुलाकात अथवा उनका खरगे को नामंजूर काम रोको प्रस्ताव पर बोलने का मौका देने की वजह से ही नहीं सोचा जा रहा। देश के एक बड़े मीडिया हाउस के लिए राजनीतिक रिपोर्टिंग करने वाले एक पत्रकार ने तो दावा भी कर दिया कि धनखड़ मोदी सरकार को समर्थन दे रहे आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू से सम्पर्क में थे और उन्हें मोदी सरकार से समर्थन वापस लेने के लिए कथित रूप से उकसा भी रहे थे। यह बात सरकार तक पहुंच गई और इसके साथ ही मोदी सरकार ने धनखड़ से पीछा छुड़ाने पर विचार करना शुरू कर दिया था। फिर जस्टिस वर्मा के मामले में धनखड़ के फैसले ने सरकार को यह मौका दे दिया कि वे धनखड़ को रास्ते से हटा सकें।
सरकार के लिए सबक
धनखड़ के इस्तीफे ने न सिर्फ मोदी सरकार को एक सबक दिया है, बल्कि उसके सामने चुनौती भी खड़ी की है। मोदी को अब दो साल के लिए नया उपराष्ट्रपति चुनने के लिए सोच समझ कर ही कदम बढ़ाने पड़ेंगे। उनके लिए ऐसे किसी व्यक्ति को इस पद पर लाना बड़ी चुनौती है, जो भाजपा या दक्षिणपंथी विचारधारा से परिचित ही नहीं, उसके सिद्धांतों से भी बंधा हुआ हो। वैसे भी मोदी की चौंकाने वाली स्टाइल के चलते भी यह चुनौती कम नहीं है कि किसे इस संवैधानिक पद पर लाया जाए, जो जरूरत पड़ने पर सरकार का संकटमोचक भी बन सके। सियासी पंडितों की राय में इसलिए ही जो नाम सामने आए हैं, उनमें से सिवाय राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह के अलावा कोई ज्यादा विश्वसनीय नहीं लग रहा।
चुनाव की समय सीमा नहीं
धनखड़ के मानसून सत्र के पहले ही दिन इस्तीफे से हालांकि संवैधानिक संकट जैसी स्थिति नहीं बनी। कारण कि उपराष्ट्रपति का मुख्य काम राज्यसभा के सभापति के रूप में ही परिलक्षित होता है और राज्यसभा में उपसभापति मौजूद हैं। उपराष्ट्रपति के दो सचिवालयों में राज्यसभा सचिवालय ही काफी अहम होता है। ऐसे में संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार उपसभापति ने तुरंत काम सम्भाल लिया। हालांकि उपराष्ट्रपति का पद खाली घोषित हो चुका है, लेकिन चुनाव करवाने के लिए संविधान में कोई समय सीमा तय नहीं है। नियमावली में आकस्मिक ढंग से यह पद खाली हो जाने के बाद पद भरने के लिए चुनाव की समय सीमा के स्थान पर सिर्फ ‘जितना जल्दी सम्भव हो’ ही लिखा है। ऐसे में निर्वाचन आयोग पर ही निर्भर है कि वह कितना जल्दी चुनाव करवाता है। आयोग ने धनखड़ के इस्तीफे से खाली हुआ पद भरने की प्रक्रिया तो शुरू कर दी है, लेकिन अभी अधिसूचना जारी नहीं की है।






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