जीत-हार ने बदली सियासी फिजां
अंता उप चुनाव की हार ने राजस्थान की सियासत को नई दिशा दे दी है। परिणाम ने भाजपा सरकार और संगठन दोनों को यह अहसास करा दिया कि आंतरिक समन्वय और जमीनी पकड़ कमजोर पड़ने पर 2028 की राह मुश्किल हो सकती है।...

सियासत : अंता में हार के बाद राजस्थान में बदले सत्ता और संगठन के समीकरण
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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प्रदेश में अंता उप चुनाव के नतीजों ने भले ही प्रत्यक्ष रूप से भजनलाल शर्मा सरकार पर कोई असर नहीं डाला। लेकिन भाजपा को ये अनुभव जरूर करा दिया कि राजस्थान में सरकार और संगठन को एकजुट करके नहीं रखा गया तो विकसित भारत-2047 के विजन को पूरा करने में अड़चनें आ सकती हैं। यही कारण है कि उप चुनाव में हार के बाद बड़ी प्रशासनिक सर्जरी होना शुरू हो गई तो प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ की नई टीम का गठन भी हो गया। जल्द कई और बड़े बदलाव भी प्रदेश की सियासत में देखने को मिलेंगे। ये सब पंचायती राज और स्थानीय निकाय के चुनावों को देखकर भी किए जाएंगे। भजनलाल सरकार के दो साल पूरा होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती यही होगी। इसके अलावा कैबिनेट के विस्तार या फेरबदल की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं। ऐसा इसलिए बड़े पैमाने पर हो रहा है कि विपक्ष अंता उप चुनाव के दौरान ये बात पहुंचाने में सफल रहा कि सरकार की जनता के बीच पकड़ कमजोर हो रही है। मुख्यमंत्री से लेकर कैबिनेट मंत्रियों पर प्रशासनिक अमला भारी पड़ रहा है और जनता के काम सरकारी फाइलों में ज्यादा घूम रहे हैं। विपक्ष ये संदेश भी आमजन के बीच में लगातार फैलाता जा रहा है कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को हर काम की मंजूरी के लिए दिल्ली का रूख करना पड़ता है। ऐसे में सत्ता और संगठन दोनों ही साल 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले मजबूत पाल को बांधने में जुटना चाहते हैं, ताकि हर सियासी तूफानों को झेलकर वे प्रदेश की राजनीति में नया इतिहास रच सकें।
मंत्रिमंडल में फेरबदल जल्द, नए चेहरों को लाने की तैयारी
राजस्थान सरकार में वर्तमान में 24 मंत्री हैं, जबकि अधिकतम 30 मंत्रियों की अनुमति है। ऐसे में छह पद खाली हैं, जिन्हें भरने की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। यह फेरबदल क्षेत्रीय, जातीय और संगठनात्मक संतुलन साधने के उद्देश्य से होगा। शेखावाटी, मेवाड़, पूर्वी राजस्थान और आदिवासी क्षेत्रों से नए चेहरों को मौका देने की बात प्रमुखता से उठ रही है। गुर्जर और मेघवाल समुदाय के नेताओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग बढ़ रही है। कालीचरण सराफ, अनिता भदेल, श्रीचंद कृपलानी और पुष्पेंद्र सिंह राणावत जैसे पुराने चेहरे वापसी की कतार में हैं। इसके अलावा जयदीप बिहाणी, हंसराज मीणा, आदूराम मेघवाल और रामविलास मीणा जैसे नए नाम भी तेजी से चर्चाओं में हैं। नए बदलाव में वसुंधरा राजे गुट को साधना भी भाजपा नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है। राजे गुट के नेताओं को मंत्रिमंडल में स्थान देने की रणनीति पर भी मंथन चल रहा है। क्योंकि प्रदेश कार्यकारिणी में भी वसुंधरा खेमे के नेताओं को संगठन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं मिली हैं। अगला फेरबदल केवल खाली पद भरने तक सीमित नहीं होगा। कई सुस्त और नॉन परफॉर्मिंग मंत्रियों की छुट्टी तय है। मुख्यमंत्री खुद मंत्रियों के कार्यों का मूल्यांकन कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों से समझें तो राजस्थान में गुजरात मॉडल लागू हो सकता है। वहां सभी मंत्रियों से इस्तीफा लेकर नई और चुस्त टीम बनाई गई। मुख्यमंत्री की हालिया बैठकें और ब्यूरोक्रेसी में हुए व्यापक बदलाव से इस मॉडल के लागू होने के संकेत मिले।
उप चुनाव की हार, कड़ा सबक
उप चुनाव में मिली हार के बाद भाजपा प्रदेश प्रभारी राधामोहन दास अग्रवाल ने कहा कि हार और जीत राजनीतिक जीवन का अहम हिस्सा है। हम बहुत चुनाव जीतते हैं, एक-आध चुनाव कभी-कभी उनको जिताते रहेंगे तो जिंदा तो रहेंगे वो लोग। उनके इस बयान से साफ दिखा कि भाजपा अंता के नतीजे को बड़े राजनीतिक बदलाव के रूप में नहीं देख रही, बल्कि इसे कांग्रेस को जिंदा रखने के एक प्रयास के रूप में पेश कर रही है। लेकिन सच इससे इतर है। राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रदेश संगठन ने हार के कारणों का गहराई से विश्लेषण करने की बातें कहीं। पार्टी के जिम्मेदार समझ रहे हैं कि सरकार और संगठन के भीतर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा। आंतरिक गुटबाजी और सरकार के 22 महीने के काम के आकलन के रूप में भाजपा ने अंता सीट को गंवा दिया। जबकि जीत के लिए वसुंधरा राजे ने करीब एक सप्ताह तक अंता में डेरा डाला। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने दो रोड शो किए। प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने तीन बार दौरा कर संगठन की बैठकें तक लीं। हालांकि कुछ बड़ी राजनीतिक चूक का खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ा। पूरे चुनाव प्रचार में प्रदेश प्रभारी राधामोहन अग्रवाल का न आना भी बड़े नेताओं में खींचतान होना दिखाता है। हाड़ौती के इस क्षेत्र में कोटा के सांसद और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का भी प्रभाव है, लेकिन उनकी कोई भूमिका देखने को नहीं मिली। जबकि बिरला के खिलाफ गत लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले कांग्रेस के प्रहलाद गुंजल अंता में सक्रिय रहे।
बड़े सियासी चेहरों का जमीनी सच आया सामने
अंता उप चुनाव के नतीजे ने तीन बड़े चेहरों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। इसमें मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत शामिल हैं। भाजपा उम्मीदवार मोरपाल सुमन को वसुंधरा राजे की पसंद से उतारा गया था, इसलिए उम्मीदवार की हार का पहला असर उनकी सियासी छवि पर पड़ा। लगातार तीसरी बार इस क्षेत्र से सांसद उनके पुत्र दुष्यंत सिंह को चुनाव का प्रभारी भी बनाया गया था। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सरकार के मुखियां हैं, ऐसे में चुनाव से उनकी प्रतिष्ठा सीधे तौर पर प्रभावित हुई। तीसरी जिम्मेदारी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ की रही। जबकि कांग्रेस के लिहाज से देखें तो उनका उम्मीदवार अशोक गहलोत की पसंद का था। ऐसे में परिणाम गहलोत को सीधे तौर पर राजनीतिक लाभ देने वाले हैं। चुनाव में भूमिका निभाने वाले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, सचिन पायलट के साथ चुनाव प्रबंध देख रहे विधायक अशोक चांदना का भी कद इससे बढ़ा। जहां तक निर्दलीय नरेश मीणा की बात करें तो उन्हें अपेक्षा से ज्यादा वोट मिले। उनका यह तीसरा चुनाव था, जिसे वे हार गए। इससे उनकी व्यक्तिगत क्षति तो हुई ही साथ में पहले दिन चुनाव प्रचार में लगे पूर्व मंत्री राजेंद्र गुढ़ा, आरएलपी सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल पर भी इस हार का असर पड़ेगा।
नई ऊर्जा के साथ जनता के बीच उतरने की तैयारी
अंता उप चुनाव से सबक सीखकर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की रणनीति स्पष्ट है कि सरकार, संगठन और प्रशासन तीनों स्तरों पर एक साथ परिवर्तन लाकर जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश दिया जाए कि भाजपा सरकार नई ऊर्जा, नई सोच और नए चेहरों के साथ आगे बढ़ने के लिए तैयार है। नए साल से पहले होने वाले ये बदलाव न केवल राजस्थान की राजनीतिक दिशा तय करेंगे, बल्कि राज्य की प्रशासनिक कार्यप्रणाली और संगठनात्मक ढांचे को भी नई पहचान देने का ऐलान होंगे। आगामी स्थानीय चुनावों के दृष्टिकोण से यह महा-फेरबदल भाजपा के लिए अहम साबित हो सकता है, क्योंकि इससे जनता के बीच नया नेतृत्व और नई उम्मीदों का संदेश जाएगा, जो 2026 के चुनावी माहौल में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। इस कारण से बड़े फैसले तक किए गए। राज्य सरकार ने ब्यूरोक्रेसी में बड़ा फेरबदल करते हुए मुख्य सचिव सुधांशु पंत को केंद्र में भेजने के साथ हुआ। मुख्यमंत्री के बेहद करीबी माने जाने वाले अतिरिक्त मुख्य सचिव (एसीएस) शिखर अग्रवाल को भी सीएमओ से हटाकर उद्योग विभाग में भेज दिया गया। उनकी जगह अखिल अरोड़ा को नया एसीएस (मुख्यमंत्री) नियुक्त किया गया। जानकारों की मानें तो राजस्थान की राजनीति में यह पहला अवसर रहा कि मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव दोनों को बदल दिया गया।
प्रदेश भाजपा कार्यालय में मंत्रियों की जनसुनवाई
अंता में हार के बाद जनता को अपने प्रति आकर्षित करने के लिए राजस्थान की भजनलाल सरकार जनसुनवाई के जरिए कार्यकर्ताओं और आम जनता की समस्याओं और शिकायतों को सुनकर उनका निराकरण करने की कोशिश में जुट गई है। इसके लिए सरकार की तरफ से एक दिसंबर से जनसुनवाई का कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसके चलते सोमवार से बुधवार तक रोज दो-दो मंत्री जयपुर में भाजपा के प्रदेश कार्यालय पर पार्टी के बड़े पदाधिकारियों के साथ जनता के दर्द और परेशानियों को जानने, समझने और हल करने का काम कर रहे हैं। इससे पीछे सत्ता और संगठन को एकजुट करना मकसद है। साथ ही सत्ता में बैठे मंत्रियों का भी पार्टी के पदाधिकारियों और जमीनी कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क व जुड़ाव हो सके। साथ ही जिन लोगों की समस्याओं का निस्तारण हुआ तो वे सरकार के ब्रांड एम्बेसडर के रूप में सकारात्मक प्रभाव अन्य के बीच छोड़ सके। वैसे जनसुनवाई के माध्यम से शिकायतों को दूर करने का काम पहले भी किया गया था, लेकिन चार दिन में ही ये प्रयास रोकना पड़ा था।
सरकार बदलने की परंपरा को रोकना बड़ी चुनौती
सियासत में हर जीत और हार के गहरे मायने होते हैं, जिनके दूरगामी परिणाम भी सामने आते हैं। इस जीत से विपक्षी खेमों को दौड़-भाग करने के लिए ऑक्सीजन मिल गई। वे अगले विधानसभा चुनाव तक भाजपा को मिली हार के जख्मों को कुरेदते रहेंगे। जनता के बीच यह शोर मचाते रहेंगे कि भजनलाल शर्मा सरकार का भरोसा डगमगा रहा है और लिटमस टेस्ट में विफल होने के बाद प्रदेश में नई पर्ची खुल सकती है। हालांकि बीते 11 वर्षों में भाजपा की जिस तरह से संगठन और सरकार के काम करने की शैली रही है उससे स्पष्ट है कि वे हर विफलता से कड़ी सीख लेते हैं। दिसंबर में भजनलाल शर्मा सरकार के दो साल पूरे होने से पहले भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जनता के बीच नई ऊर्जा, नए चेहरों और मजबूत टीम के साथ ये सन्देश देना चाहता है कि वे प्रदेश के विकास के लिए कटिबद्ध है। डबल इंजन की सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के सपने को साकार करने के लिए द्रुत गति से आगे बढ़ना चाहती है। साथ ही सत्ता के साथ संगठन को भी मजबूती के साथ धरातल पर उतारना चाहती है जिससे कि राजस्थान में हर पांच साल में सरकार को बदलने की परम्परा टूटे।






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