वोट हम दोनों मिलकर बटोरेंगे- सचिन
गहलोत और पायलट की यह नजदीकी कई परतों में देखी जा सकती है। पहली— सार्वजनिक संवाद का नियंत्रण। पिछले वर्षों में जो आरोप-प्रत्यारोप मीडिया की सुर्खियां बनते थे, वे अब संवाद और सौहार्द में बदल गए हैं।...

गहलोत पायलट समीकरण : टकराव से तालमेल तक
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ पत्रकार
राजस्थान की राजनीति एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। वर्षों तक चले सत्ता संघर्ष और सार्वजनिक खींचतान के बाद राज्य के दो दिग्गज नेता— पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट अब एक मंच पर साथ दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य न सिर्फ कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए राहत भरा है, बल्कि प्रदेश की राजनीति में संभावनाओं और संतुलन की नई बयार भी लाता है।
11 जून को स्व. राजेश पायलट की पुण्यतिथि के अवसर पर दौसा जिले के जीरोता गांव में आयोजित सर्वधर्म प्रार्थना सभा में जिस आत्मीयता और सौहार्द्र के साथ गहलोत और पायलट ने एक-दूसरे की उपस्थिति को स्वीकार किया, वह किसी राजनीतिक गठबंधन से कहीं अधिक, एक नैतिक और सैद्धांतिक संगम जैसा प्रतीत हुआ। अशोक गहलोत ने अपनी परिचित मुस्कान के साथ स्पष्ट किया, “हम कभी अलग थे ही नहीं, हमारे बीच प्यार- मोहब्बत बनी रहेगी।” वहीं सचिन पायलट ने भी कहा, “अब रात गई बात गई, हमें आगे बढ़ना है।” ऐसे बयान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि कांग्रेस की वर्तमान रणनीति का प्रतिबिंब हैं, एकजुटता और जनविश्वास की पुनर्प्राप्ति। राजनीति में ‘बर्फ पिघलने’ का मुहावरा अक्सर संबंध सुधारने के लिए प्रयुक्त होता है, लेकिन पायलट ने इसे भी हल्के-फुल्के अंदाज़ में दरकिनार करते हुए कहा, “बर्फ थी ही नहीं हमारे रिश्तों में।” यह वाक्य एक ओर जहां मतभेदों को कमतर आंकता है, वहीं यह भी संकेत देता है कि अब टकराव की राजनीति नहीं, समन्वय का समय है।
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राजस्थान टुडे, जुलाई 2025
युवा चेहरों को मिलेगी पहचान!
पायलट ने राहुल गांधी के उस वादे को भी याद दिलाया जिसमें पार्टी में 50 प्रतिशत पद युवाओं को देने की बात कही गई थी। उनका सवाल सीधा था— “अब वह कब तक होगा?” यह एक ओर युवाओं की भागीदारी की मांग है तो दूसरी ओर कांग्रेस नेतृत्व को यह संकेत भी कि संगठनात्मक पुनर्रचना में युवा चेहरों को अवसर देना अब टालने योग्य नहीं।
गहलोत और पायलट की यह नजदीकी कई परतों में देखी जा सकती है। पहली— सार्वजनिक संवाद का नियंत्रण। पिछले वर्षों में जो आरोप-प्रत्यारोप मीडिया की सुर्खियां बनते थे, वे अब संवाद और सौहार्द में बदल गए हैं। दूसरी— चुनावी तैयारी। 2028 के विधानसभा चुनावों और उसके बाद 2029 के आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस नेतृत्व समझ चुका है कि आंतरिक दरारों को पाटे बिना जनता का भरोसा पाना असंभव होगा।
सचिन पायलट का यह वक्तव्य
“अगर हम मिलकर नहीं रहेंगे तो जनता हम पर भरोसा क्यों करेगी?” दरअसल पूरे संगठन के लिए चेतावनी है कि जनता अब आंतरिक कलहों से ऊब चुकी है। वह परिणाम चाहती है, और इसके लिए नेतृत्व को संगठित होना ही होगा।
पूर्व मंत्री हेमाराम चौधरी ने भी खुले शब्दों में कहा, “यह बहुत अच्छी बात है कि सचिन पायलट और अशोक गहलोत साथ आ गए हैं। इन दोनों नेताओं के हाथ मिलाने के बाद हम अब अगला चुनाव जीत सकते हैं।” यह भरोसा सिर्फ कांग्रेस के भीतर ही नहीं, प्रदेश की सियासत में भी गूंज रहा है।
दोहरे लाभ की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस की यह रणनीति दोहरे लाभ की ओर इशारा करती है— अनुभवी गहलोत की प्रशासनिक समझ और जमीनी पकड़ के साथ-साथ पायलट की युवा अपील और रणनीतिक चुस्ती। दोनों को साथ लाना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां इस मेल को मजबूरी नहीं, समझदार बना रही हैं।
राजेश पायलट की पुण्यतिथि का यह आयोजन प्रतीकात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण रहा। गहलोत की उपस्थिति, पायलट परिवार के लिए निजी स्नेह के साथ-साथ सार्वजनिक समर्थन का संदेश भी देती है। वहीं यह एक संकेत भी था कि राजनीति अब परिपक्व हो रही है, जहां व्यक्ति से बड़ा संगठन है, और संगठन से बड़ा जनमत।
भरोसे की लड़ाई लड़ना चाहती है कांग्रेस
यह भी स्पष्ट हुआ कि अब कांग्रेस केवल चेहरों की लड़ाई नहीं, बल्कि विचारधारा और भरोसे की लड़ाई लड़ना चाहती है। सचिन पायलट ने कहा, “कोई एक आदमी हवा बना देगा, ऐसा नहीं होगा। वोट हम दोनों मिलकर बटोरेंगे।” इस बयान से स्पष्ट है कि व्यक्तिगत लोकप्रियता की जगह अब सामूहिक नेतृत्व की रणनीति अपनाई जा रही है।
गहलोत और पायलट दोनों के राजनीतिक सफर में गहरे मतभेद रहे हैं— खासकर 2020 में जब पायलट गुट ने सरकार से खुले तौर पर असहमति जताई थी। लेकिन वह दौर अब इतिहास बनने की ओर है। दौसा की तस्वीरों में दिखाई दी राजनीतिक एकता अब यह तय करेगी कि कांग्रेस राजस्थान में फिर से वापसी का रास्ता तलाश सकेगी या नहीं।
निर्णायक भूमिका निभाने की उम्मीद
राजनीति में संबंधों का उतार-चढ़ाव सामान्य है, लेकिन इस बार यह मेलजोल केवल ‘फोटो-ऑप’ नहीं, बल्कि पार्टी की दिशा-दृष्टि का हिस्सा प्रतीत होता है। और यदि यह मेल ईमानदारी से बरकरार रहा, तो राजस्थान की राजनीति में कांग्रेस एक बार फिर निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
कुल मिलाकर, गहलोत और पायलट की यह नजदीकी केवल दो नेताओं की आपसी समझदारी नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति में स्थिरता, भरोसे और सकारात्मक भविष्य का संकेत है— जिसमें दल से ऊपर जनहित और संगठन से ऊपर एकजुटता का मूल्य सबसे महत्वपूर्ण होगा।






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