अनारगाथा बाड़मेर-जालोर की: जहां मिट्टी ने मिठास उगाई
रेगिस्तान की रेतीली मिट्टी में बाड़मेर और जालोर ने अनार की मिठास उगाकर खेती की नई क्रांति रच दी है। यह क्षेत्र अब देश-विदेश में अपने उत्कृष्ट अनार उत्पादन और निर्यात के लिए जाना जा रहा...

राजस्थान की तपती रेत, तेज धूप और शुष्क हवाएं—सुनने में लगता है जैसे यहां सिर्फ बबूल और कांटे ही पनप सकते हैं। लेकिन बाड़मेर और जालोर जैसे पश्चिमी जिलों ने इस धारणा को तोड़ते हुए अपनी रेतीली मिट्टी में अनार जैसी मिठास उगा दी है।
आज बाड़मेर-जालोर न सिर्फ राजस्थान में, बल्कि देश के नक्शे पर अनार की खेती के लिए एक नई पहचान बना चुके हैं। बाड़मेर में लगभग 3,500 हेक्टेयर और जालोर में 4,000 हेक्टेयर से ज़्यादा क्षेत्रफल में अनार की खेती हो रही है। यहाँ की जलवायु—गर्म और शुष्क—अनार के लिए एकदम मुफ़ीद है। रेतीली मिट्टी में जल निकासी की क्षमता अच्छी होती है, जो अनार के पौधों के लिए वरदान साबित होती है।
सरकार की सब्सिडी, वैज्ञानिक सलाह और ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीकों ने किसानों की मेहनत को सोने में बदल दिया है। अब वही ज़मीन जो कभी पानी की कमी से जूझती थी, आज लाल रत्न जैसे फलों से लहलहा रही है।यहां उगाई जा रही ‘भगवा’ और ‘मृदुला’ जैसी अनार की किस्में न केवल स्वाद में लाजवाब हैं, बल्कि अपने रंग और चमक के कारण सऊदी अरब, यूएई, कतर, ओमान, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों में भी खूब पसंद की जा रही हैं। ये फल अब न केवल थालियों की शान हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ‘रेगिस्तान की मिठास’ बनकर उभर रहे हैं।
इस खेती क्रांति की पृष्ठभूमि में कहीं न कहीं जोधपुर का वो पुराना गौरव भी दर्ज है—कंधारी अनार। कहते हैं, जब जोधपुर के कंधारी अनार सिकंदर लोदी के दरबार पहुंचे थे, तो वे सिर्फ फल नहीं थे, बल्कि दोस्ती की मिठास से लिपटा हुआ एक लाल ताज थे।आज भले ही कंधारी अनार इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए हों, लेकिन बाड़मेर-जालोर की अनारगाथा उस विरासत को एक नए रंग में जीवित कर रही है।
ये सिर्फ फल नहीं, मेहनत, विज्ञान और उम्मीद की कहानी है—एक लाल चमकती हुई क्रांति, जो रेगिस्तान की कोख से निकली है और दुनिया तक अपनी मिठास पहुंचा रही है।






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