आत्मजौहरी:शालीभद्रमुनिजी म.सा
जैन मुनि श्री शालीभद्रमुनिजी म.सा. का जीवन जौहरी से आत्मजौहरी बनने की उस दिव्य यात्रा का प्रतीक रहा, जहाँ तप और संयम ने आत्मा को शुद्ध स्वर्ण बना दिया। संथारे के परम शांति-मार्ग से उनका देवलोक गमन लौ...

आत्मजौहरी : पूज्य श्री शालीभद्रमुनिजी म.सा.
जैन मुनि श्री शालीभद्रमुनिजी म.सा. सांसारिक जीवन में वे प्रतिष्ठित जौहरी अवश्य रहे, पर वह केवल उनका व्यवसाय था। उनकी असली पहचान तो उस मनोभूमि की तरह थी, जिसे तप की तपस्वी भट्ठी ने आभूषण नहीं, बल्कि अंतर्यात्रा का उजाला बना दिया। उनके भीतर की चमक किसी हीरे की कटिंग से नहीं, बल्कि आत्मा की उस दीप्ति से जन्मी थी जो संयम, त्याग और निरंतर साधना से निखरकर शुद्ध प्रकाश बन जाती है।
जैसे स्वर्णकार सोने को बार-बार तपाकर उसकी अशुद्धियाँ अलग कर देता है, वैसे ही उन्होंने व्यावहारिक संसार को साधना की आँच में तपाकर आत्मा की शुद्धता को सर्वोपरि रखा। व्यापारी से मुनि बनने की उनकी यात्रा किसी रंगीन रत्न का महँगा रूपांतरण नहीं, बल्कि सोने के कुंदन से शुद्ध स्वर्ण तक पहुँचने जैसी पवित्र प्रक्रिया थी।
जब संथारे का शुभारंभ हुआ, तो वह किसी विदाई की नहीं, बल्कि पूर्ण जागृति की अनुभूति देता था। जैन दर्शन में संथारा मृत्यु नहीं आत्मा की अंतिम सजग यात्रा है, जहाँ प्राण का हर कण संयम की थाप पर रखकर त्याग का सर्वोच्च पर्व मनाया जाता है। यह वह बिंदु है जहाँ देह केवल एक पुराना आवरण बन जाती है और चेतना अपने हल्के, निर्मल स्वरूप में मोक्ष की दिशा में उड़ान भरती है।
उनका संथारा ऐसा लगा मानो कोई परिपक्व पत्ता शरद की हवा में सहजता से झर जाए। बिना शोर, बिना बोझ, केवल अपने मूल की ओर लौटने की कृपा में। ऐसा लगा जैसे कोई दीपक अपनी अंतिम लौ को आकाश में छोड़कर अनंत ज्योति में विलीन हो गया हो।
पूज्य श्री शालीभद्रमुनिजी म.सा. का देवलोक गमन हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की सर्वोत्तम साधना शरीर से नहीं, बल्कि संयमित मन से होती है। कोई जौहरी रत्नों को चमकाता है, पर महान आत्माएँ अपने भीतर के प्रकाश को। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि आभूषण पेशा है पर आत्मा का जौहरी बनना ही सच्ची उपलब्धि है।
💮संयमो खम्मं अहिंसा एव मुग्गाण वट्टमाणं।💮
अर्थात संयम और अहिंसा ही आत्मा का सच्चा आभूषण हैं; इन्हीं के बल पर जीव लोकों में उजाला फैलाता है।






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