जोधपुर: पोलो का वैश्विक सफर
रेत के समंदर से उठी एक आवाज़ ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा—यह आवाज़ थी जोधपुर के पोलो...

रेत के समंदर से उठी एक आवाज़ ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा—यह आवाज़ थी जोधपुर के पोलो की। क्या आपने कभी सोचा है कि राजाओं का यह खेल, जो कभी सीमित रियासतों तक सिमटा था, अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर कैसे चमका? जवाब है—जोधपुर।
यहाँ पोलो केवल एक खेल नहीं था, यह शान थी, परंपरा थी, और पहचान भी। महाराजा उम्मेद सिंह और फिर हनुवंत सिंह ने जब बल्ला थामा और घोड़े पर सवार होकर मैदान में उतरे, तो ऐसा लगा मानो मरुस्थल की रेत पर इतिहास दौड़ रहा हो।1933 में जब जोधपुर पोलो क्लब की स्थापना हुई, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह मैदान एक दिन लंदन, न्यूयॉर्क और अर्जेंटीना के अखबारों में भी गूंजेगा। लेकिन यही हुआ।
विदेशी राजनयिक, अंग्रेज़ अफसर और यहां तक कि ब्रिटिश राजघराने भी जोधपुरी खिलाड़ियों के कौशल और स्टाइल के मुरीद हो गए। “द प्रिंस ऑफ पोलो” हनुवंत सिंह का नाम अंतरराष्ट्रीय प्रेस में छपा तो मानो पूरा जोधपुर गर्व से खड़ा हो गया और यहीं से शुरू हुई एक मरुशहर की वो यात्रा, जिसने पोलो को महलों से निकालकर दुनिया के स्टेडियमों तक पहुँचा दिया।






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