डंक मधुमक्खियों ने मारे, पर ज़ख्म प्रशासन ने दिए।
डंक तो मधुमक्खियों के थे, मगर सबसे गहरा ज़ख्म उस व्यवस्था ने दिया जो हर बार देरी से जागती...

बूंदी।जहां उम्मीदों की उजास होनी चाहिए थी, वहां चीखों की गूंज थी। जिस धरती पर युवा अपने भविष्य की नींव डालने आए थे, वहां मधुमक्खियों ने आघात किया — जैसे आसमान से पत्थर बरस गए हों। परीक्षा का डर तो था, पर मौत जैसी मार की कल्पना किसे थी?
सोनिया के चेहरे पर सूजन नहीं, व्यवस्था की लापरवाही की स्याही थी। आंखें बंद थीं, पर सवाल खुला था — क्या परीक्षा केंद्रों की तैयारी केवल कुर्सियों और निगरानी तक सीमित रह गई है?
एक बेटी, जो कल तक किताबों में प्रश्न हल कर रही थी, आज ICU में जीवन की उत्तरमाला ढूंढ रही है। और व्यवस्था? वो आंकड़ों में उलझी है — “सिर्फ 28 घायल, कोई मरा नहीं।”
क्या इंसान की पीड़ा भी अब कटे-फटे नंबरों में तौली जाएगी?
ये सिर्फ मधुमक्खियों का हमला नहीं था — ये एक तीखा तमाचा था उस व्यवस्था के गाल पर, जो हर बार घटना के बाद ही जागती है, और हर बार कुछ अनुत्तरित सवाल पीछे छोड़ जाती है।






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