पटरी से उतरी सफाई: जोधपुर का गुमनाम रेलमार्ग
कभी सफाई के लिए भैंसे रेल खींचते थे, आज सोच तक जाम है।जोधपुर की वो अनोखी व्यवस्था, जो इतिहास में गुम हो गई—अब फिर से याद दिलाने का वक्त...

कभी जोधपुर में सफाई एक आदत नहीं, अभिमान हुआ करता था। सुबह की पहली किरण के साथ जब सड़कों पर पानी का छींटा पड़ता, तो लगता जैसे नगर ने स्नान किया हो। हवा तक साफ लगती थी, और गलियों में कदम रखते ही लगता – शहर भी सज-धजकर तैयार हुआ है।
पर आज की जोधपुर की गलियाँ उस पुराने वैभव की चुप गवाह बनी खड़ी हैं। एक ज़माना था जब पाल लिंक रोड और आसपास के इलाकों में सफाई ‘पटरी’ पर थी—जी हाँ, यहां बाकायदा कचरा ढोने के लिए रेलपटरियाँ थीं। कोई आधुनिक तकनीक नहीं, भैंसों से खिंचवाने वाली गाड़ियाँ थीं—पर व्यवस्था ऐसी थी कि यूरोप वाले भी देख लेते तो दांतों तले उंगलियाँ दबा लेते।
इन खास रेलों के पीछे कोई शाही तमाशा नहीं था, यह तो नगर व्यवस्था की समझदारी और दूरदर्शिता का नतीजा था। दरबार के खजाने से इन पटरियों की देखरेख होती थी। सफाई भी रियासत का विषय थी—जहाँ राजा का धर्म सिर्फ शासन नहीं, स्वच्छता भी था।
आज ये पटरी और ये व्यवस्था—दोनों ही इतिहास की कब्र में दफन हो चुके हैं। जिन गलियों में कभी कचरा समय पर उठता था, वहां अब खुद कचरा स्थायी निवासी बन चुका है। और जिन पटरियों पर भैंसों की धीमी पर नियमित चाल सफाई का संकेत देती थी, वहां अब स्वार्थ के डंपर धड़धड़ाते हैं।
अवैध निर्माण ऐसे उग आए हैं जैसे किसी ने ‘कुकरमुत्ते की खेती’ कर ली हो—ना योजना, ना अनुमति, ना कोई ज़मीन से पूछना कि क्या वह राज़ी भी है या नहीं! मिट्टी में सिर्फ स्वार्थ बोया गया, और ऊपर से मुनाफे की खाद डाल दी गई।
सरकारी योजनाएँ अब फाइलों में सांस लेती हैं और ज़मीन पर ‘सर्वे के बाद निर्णय’ नामक जीवन मंत्र जपती रहती हैं। आज सफाई को सिर्फ इवेंट बना दिया गया है—कभी अभियान, कभी जागरूकता रैली। लेकिन उस ठोस सोच की कोई चर्चा नहीं जो कभी जोधपुर की पहचान हुआ करती थी।
विडंबना देखिए—जिन पटरियों ने शहर को साफ-सुथरा रखा, वही आज खुद गंदगी की मार सह रही हैं। उन्हें सहेजने वाला कोई नहीं, न उनका इतिहास पढ़ने वाला, न उन्हें भविष्य से जोड़ने वाला।
अगर समय रहते इस अद्भुत प्रणाली को संभाल लिया जाता, तो आज यह जोधपुर की अपनी “मिनी मेट्रो” बन सकती थी—एक सतत, सुलभ और स्वदेशी परिवहन प्रणाली। पर हम तो अपने इतिहास को कचरे में डालते हैं, और फिर उस पर ‘हेरिटेज वॉक’ करवाकर फ़ोटो खिंचवाते हैं।
सवाल सिर्फ उन पटरियों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम खुद सोच और व्यवस्था की पटरी से उतर गए हैं?
शहर को आज सिर्फ सफाई की नहीं, स्मृति की झाड़ू चाहिए—ताकि हम साफ देख सकें कि कैसे हमने भैंसों से भी तेज़ चलने वाली व्यवस्था को अपनी अकर्मण्यता के नीचे कुचल दिया। काश, कोई फिर से इन पटरियों पर सोच की रेल दौड़ा दे। वरना आने वाली पीढ़ियाँ यही पूछेंगी—”कभी सफाई भी पटरी पर हुआ करती थी?”






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