पत्थरों का पोत : जोधपुर का शिप हाऊस
अगर किसी दिन आप जोधपुर की पुरानी गलियों में भटकते-भटकते नागौरी गेट के पास पहुँच जाएँ और एक जहाज़ को पहाड़ी पर खड़ा पाएँ, तो चौंकिए...

अगर किसी दिन आप जोधपुर की पुरानी गलियों में भटकते-भटकते नागौरी गेट के पास पहुँच जाएँ और एक जहाज़ को पहाड़ी पर खड़ा पाएँ, तो चौंकिए मत। यह कोई ग़लत मिज़ाज का समुद्री सपना नहीं, बल्कि शिप हाउस है—एक ऐसा पत्थरों का पोत, जो समंदर में नहीं, इतिहास की लहरों में बहा है।
1886 में सर प्रताप ने इस जहाज़ की नींव रखी—नक्शा अंग्रेज़ जी. जे. ओवरीन का और निगरानी में राज्य अभियंता होम। इसे देखकर लगता है जैसे पत्थर भी कभी नाव चलाना चाहते थे। तीन मंज़िलों का ये जलहीन जलयान अब भी चुपचाप खड़ा है, जैसे पुरानी यादों की बंदरगाह पर किसी खोए हुए संगीत का इंतज़ार कर रहा हो।
और फिर, 1949 में इसमें जान आई। नभवाणी नामक एक रेडियो स्टेशन ने इसमें साँस ली और मरुस्थल के मौन को पहली बार आवाज़ मिली। लगता था जैसे रेत में लहरें उठ रही हों, और हवाएँ उर्दू बोलने लगी हों। उस्ताद अली अकबर ख़ाँ का सरोद वहां ऐसा गूंजा जैसे पत्थर भी सुरों में भीग जाएँ, और रमज़ी इतावी की नज़्मों ने हवा को गुलाब बना दिया।
पर अब? अब वहां कोई साज़ नहीं, कोई आवाज़ नहीं।
नभवाणी की सरगम जिन पत्थरों में गूंजती थी, अब वही पत्थर ऐसे शांत हैं जैसे किसी ने उन्हें ‘म्यूट’ पर डाल दिया हो—और वो भी परमानेंटली।
वो इमारत अब किसी थके हुए बुज़ुर्ग की तरह बैठी है, जो सब कुछ देख चुका है और अब बस चुप है। जैसे कह रहा हो—“मैंने वो वक्त देखा है जब शब्दों में जान होती थी और कलाकारों के पास जज़्बात।”
आज की पीढ़ी के लिए ये नाम किसी प्राचीन तारे की तरह है—कभी था, पर अब सिर्फ किताबों में चमकता है।






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