प्राकृत भाषा के अध्ययन-शिक्षण को बढ़ावा देने पर जोर: प्रो. नलिनी बलबीर का प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर में आगमन
प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर में फ्रांस की सुप्रसिद्ध भारतीयविद प्रो. नलिनी बलबीर का आगमन विद्वत समुदाय के लिए एक विशेष अवसर...

प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर में फ्रांस की सुप्रसिद्ध भारतीयविद प्रो. नलिनी बलबीर का आगमन विद्वत समुदाय के लिए एक विशेष अवसर बना। वे संस्कृत, प्राकृत, पाली, अपभ्रंश, जैन और बौद्ध साहित्य की प्रतिष्ठित विदुषी हैं। पेरिस स्थित विश्वविद्यालय में वर्षों तक अध्यापन और शोध के बाद वे अब सेवानिवृत्त हैं, लेकिन भारतीय भाषाओं, विशेषकर प्राकृत और जैन साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा आज भी उतनी ही सशक्त है।
कार्यक्रम में भाषाविदों, संस्कृत-मर्मज्ञों, देश के प्रतिष्ठित चित्रकारों और अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने उनसे सार्थक संवाद किया। प्रो. बलबीर ने कहा कि कहने को वे फ्रांसीसी हैं, पर स्वयं को आधी भारतीय मानती हैं। उन्होंने बताया कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा लैटिन और ग्रीक में हुई, जिसके बाद उनका रुझान संस्कृत की ओर बढ़ा। संस्कृत का लैटिन और ग्रीक भाषाओं से गहरा संबंध होने के कारण यह यात्रा उनके लिए सहज और प्रेरणादायक रही।
उन्होंने अपने गुरू, प्रसिद्ध इंडोलॉजिस्ट कोलेट कैयात के मार्गदर्शन में जैन आगम, प्राकृत साहित्य और प्राचीन जैन व्याख्या-परंपरा पर शोध किया। उन्होंने उल्लेख किया कि फ्रांस और यूरोप में जैन साहित्य की प्राचीन पांडुलिपियों का महत्वपूर्ण संग्रह मौजूद है, जिन पर वे लंबे समय से कार्य कर रही हैं। ब्रिटिश लाइब्रेरी में जैन पांडुलिपियों के अभिलेखीय कार्य में उनका योगदान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत प्रशंसित है।
संवाद के दौरान पद्मविभूषण डी. आर. मेहता ने उत्सुकता व्यक्त की कि क्या प्राचीन जैन चित्रों में पर्यावरण-संबंधी चित्र भी मिलते हैं? इस पर डॉ. बलबीर ने सहमति जताते हुए कहा कि इस दिशा में अनेक महत्वपूर्ण प्रमाण उपलब्ध हैं, जो यह दर्शाते हैं कि जैन कलाकारों ने प्राकृतिक परिवेश, पेड़-पौधों और पर्यावरणीय संतुलन को चित्रों में सूक्ष्मता से अभिव्यक्त किया है।
डॉ. बलबीर ने बताया कि उन्होंने प्राकृत भारती अकादमी के प्रकाशनों का फ्रेंच भाषा में विस्तृत रिव्यू लिखा है, जिसमें विशेष रूप से अर्धकथानक को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि फ्रांस में अपभ्रंश के महाकवि पुष्पदंत द्वारा रचित प्रसिद्ध जैन काव्य-जसहर चरिउ की प्राचीन, सचित्र हस्तलिखित पांडुलिपियाँ उपलब्ध हैं। इन पांडुलिपियों में संस्कृत और अपभ्रंश दोनों के अंश मिलते हैं और इन पर यूरोपीय शोध संस्थानों में व्यापक शोध कार्य भी किया जा चुका है।
प्रो. बलबीर ने प्राचीन जैन चित्रकला की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें शांति, संयम और वैराग्य की अनूठी अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि जैन साहित्य और कला में शोध की अपार संभावनाएँ हैं, परंतु वर्तमान पीढ़ी तकनीकी और व्यावसायिक विषयों की ओर अधिक आकर्षित है। ऐसे में प्राकृत भाषा के अध्ययन और शिक्षण को प्रोत्साहित करने हेतु सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा आर्थिक सहयोग बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने पद्मविभूषण डी. आर. मेहता के योगदान की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने प्राकृत भाषा, जैन संस्कृति और मानवीय सेवा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में असाधारण भूमिका निभाई है। प्राकृत भारती अकादमी के प्रकाशनों और गतिविधियों को देखकर वे अत्यंत प्रभावित हुईं और इसे प्राकृत भाषा के संरक्षण और संवर्धन का प्रमुख केंद्र बताया।
प्रो. कुसुम जैन ने उनका सस्नेह स्वागत किया और कहा कि प्रो. नलिनी बलबीर का आगमन जैन अध्ययन और प्राकृत भाषा के शोधार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके गहन ज्ञान और अनुभव ने इस आयोजन को अत्यंत सारगर्भित और स्मरणीय बना दिया।






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