संयम की ताकत—जैन समाज ने दिखाई एकता और विवेक की मिसाल
मुंबई के विले पार्ले में 90 वर्ष पुराने पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर को बीएमसी द्वारा अचानक ढहाए जाने की घटना न केवल आस्था पर आघात थी, बल्कि यह प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती...

मुंबई के विले पार्ले में 90 वर्ष पुराने पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर को बीएमसी द्वारा अचानक ढहाए जाने की घटना न केवल आस्था पर आघात थी, बल्कि यह प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। परंतु इस पूरे विवाद में जिस प्रकार जैन समाज ने प्रतिक्रिया दी, वह न सिर्फ अनुकरणीय है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध की एक नई मिसाल भी है।
यह सत्य है कि किसी भी धार्मिक स्थल के अस्तित्व को लेकर यदि कोई कानूनी असमंजस या विवाद हो, तो उसका समाधान न्यायालय और संवाद के माध्यम से होना चाहिए, न कि बुलडोजर और जल्दबाजी के माध्यम से। बीएमसी द्वारा हाईकोर्ट के स्टे समाप्त होते ही जिस तत्परता से कार्यवाही की गई, वह स्पष्ट रूप से ‘सुनवाई से पहले सजा’ जैसी प्रतीत हुई। खासकर तब, जब समाज ने पुनः स्टे के लिए अपील की तैयारी कर ली थी।
परंतु इस घटनाक्रम में सबसे उल्लेखनीय पहलू रहा जैन समाज की प्रतिक्रिया। अल्पसंख्यक होने के बावजूद, हजारों की संख्या में अनुशासित, शांतिपूर्ण और संयमित प्रदर्शन कर जैन समाज ने यह दिखाया कि विरोध भी गरिमा के साथ किया जा सकता है। जैन मुनियों का सड़कों पर उतरना, सरकार को चुनौती देना—यह दिखाता है कि आस्था को हल्के में लेने की चूक अब कोई भी शासन नहीं कर सकता।
संतों ने साफ कहा: “हम अहिंसक हैं, पर कायर नहीं।” यह वाक्य नारा नहीं, बल्कि एक चेतावनी थी उस सोच के लिए जो अल्पसंख्यक समुदायों की संवेदनाओं को नजरअंदाज करने की गलती करती है। यह चेतावनी थी उस प्रशासनिक मशीनरी के लिए, जो तथाकथित ‘अवैध’ के नाम पर श्रद्धा को रौंद देती है।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही—जैन समाज की एकजुटता। दिगंबर और श्वेतांबर, दोनों संप्रदायों के साधु-संतों और श्रद्धालुओं ने कंधे से कंधा मिलाकर एक स्वर में अपना पक्ष रखा। राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सभी दलों के नेताओं ने समर्थन दिया, जिससे यह साबित हुआ कि धर्म की रक्षा राजनीति से कहीं बड़ा मुद्दा है।
सवाल उठता है कि जिस मंदिर के सामने शराब की बिक्री हो रही थी, उस पर प्रशासन की चुप्पी क्यों थी? क्या उसे कानूनी मान्यता प्राप्त थी? क्या यह जनभावनाओं के प्रति असंवेदनशीलता नहीं है?
अंततः, समाज के संयम और एकता का ही परिणाम रहा कि बीएमसी को पीछे हटना पड़ा, मूर्तियों की पुनर्स्थापना की अनुमति मिली और जिम्मेदार अधिकारियों का स्थानांतरण भी हुआ। यह विजय भले ही प्रतीकात्मक हो, लेकिन इसका संदेश दूर तक गया है—धर्म पर आघात होगा तो समाज उठ खड़ा होगा, पर मर्यादा की लक्ष्मण रेखा नहीं लांघेगा।
आज आवश्यकता है कि इस घटना को सभी अल्पसंख्यक समुदाय और प्रशासन एक सीख के रूप में लें—जहाँ असहमति हो, वहाँ संवाद हो; जहाँ आस्था हो, वहाँ सम्मान हो; और जहाँ न्याय की प्रतीक्षा हो, वहाँ धैर्य हो। जैन समाज ने दिखाया कि संयम भी शक्ति है, और जब यह शक्ति संगठित होती है, तो वह बिना शोर मचाए भी व्यवस्था को झुकने पर विवश कर देती है।






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