अंता उपचुनाव में भाजपा की सियासी परीक्षा, वसुंधरा की दबदबे की चर्चा
राजस्थान के बारां जिले की अंता विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में भाजपा ने मोरपाल सुमन को उम्मीदवार बनाया है, जो कांग्रेस प्रत्याशी प्रमोद जैन भाया और बागी नरेश मीणा के सामने मैदान में हैं। यह...

-उपचुनाव प्रत्याशी चयन में भारी पड़ी वसुंधरा
-सियासी गुगली में उलझे भजन-मदन
राजस्थान के बारां जिले में अंता विधानसभा के अगले महीने होने वाले विधानसभा उपचुनाव के लिए भाजपा ने लम्बे इंतजार के बाद शुक्रवार 17 अक्टूबर 2025 को आखिर अपने प्रत्याशी के नाम का ऐलान कर ही दिया। कांग्रेस प्रत्याशी व पूर्व मंत्री प्रमोद जैन भाया के सामने भाजपा ने बारां के प्रधान और स्थानीय कार्यकर्ता मोरपाल सुमन को अपना उम्मीदवार बनाया है। अब वहां कांग्रेस के बागी नरेश मीणा के भी मैदान में होने से त्रिकोणीय मुकाबला तय माना जा रहा है। नतीजा चाहे जो भी रहे, लेकिन इस उपचुनाव से राजस्थान और खासकर भाजपा की राजनीति से जुड़े कई बड़े संकेत सामने आएंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।
प्रदेश में भाजपा पिछले दो साल से सत्ता में है, लेकिन कहा जाता है कि सरकार के काम से आम जनता तो क्या भाजपा के कार्यकर्ता भी संतुष्ट नहीं है। विपक्ष आरोप लगाता है कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सरकार पर अफसरशाही हावी है। सत्ताधारी भाजपा के कई विधायक भी असंतोष जाहिर कर चुके हैं। ऐसे में यह चुनाव यूं देखा जाए तो भजनलाल शर्मा सरकार का लिटमस टैस्ट भी होगा, लेकिन यहां चुनाव में भाजपा की हार या जीत से ज्यादा मुख्यमंत्री शर्मा समेत कई नेताओं का सियासी कद अहम हो गया है। यह बात अंता विधानसभा उप चुनाव की घोषणा के बाद हुई पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा की प्रदेश की सियासत में हुई एक्टिव एंट्री के बाद से चर्चा में है।
उपचुनाव के बहाने वसुंधरा ने अपना जलवा ऐसा दिखाया कि भाजपा के कई नेता झटका खा गए। दरअसल, वसुंधरा ने उपचुनाव की घोषणा होते ही सरकार के प्रति अपनी नाराजगी के संकेत दे दिए थे। दरअसल, वे चाहती थी कि अंता के निवर्तमान विधायक कंवरलाल मीणा को राज्यपाल के समक्ष पेश दया याचिका में अभयदान मिल जाए और उनकी सजा कम होने से उपचुनाव की नौबत ही नहीं आए, लेकिन सरकार ने उनकी दया याचिका का प्रकरण राजभवन भेजने में देरी कर दी और चुनाव आयोग ने बिहार विधनसभा चुनाव के साथ अंता में भी उपचुनाव के कार्यक्रम की घोषणा कर दी। इसके बाद से वसुंधरा पूरी तरह प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ और मुख्यमंत्री शर्मा पर ऐसी हावी रही कि प्रत्याशी का चयन करना भी मुश्किल हो गया। वसुंधरा ने पहले कंवरलाल की पत्नी का नाम आगे किया और फिर स्थानीय प्रत्याशी का मुद्दा खड़ा कर दिया। मुख्यमंत्री व प्रदेशाध्यक्ष के साथ भाजपा के कुछ बड़े नेता चाहते थे कि पूर्व मंत्री प्रभुलाल सैनी को मैदान में उतारा जाए, क्योंकि अंता में माली-सैनी समाज के वोट बहुतायत में हैं। प्रभुलाल हालांकि एक बार अंता से विधायक रहे हैं, लेकिन वे पिछला चुनाव बूंदी जिले की हिंडौली विधानसभी सीट से हार गए थे। वसुंधरा ने प्रभुलाल के नाम पर सहमति नहीं दी और जब हाड़ौती के बड़े नेता ओम बिरला भी प्रभुलाल के नाम की पैरवी करते दिखे तो वसुंधरा ने एक बयान देकर स्थिति उलझा दी। उन्होंने कहा कि प्रत्याशी मुख्यमंत्री व प्रदेशाध्यक्ष तय करेंगे और वह सभी को मंजूर होगा। इससे एक संकेत यह गया कि वसुंधरा की बात नहीं रखी गई तो उनकी नाराजगी चुनाव में भारी पड़ेगी। ऐसे में प्रभुलाल सैनी भी वसुंधरा के दरबार में हाजिर हुए, लेकिन उन्हें सियासी आशीर्वाद नहीं मिला। आखिर भाजपा ने एक साधारण कार्यकर्ता मोरपाल सैनी को प्रत्याशी बनाने की घोषणा कर दी। बारां के प्रधान और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मोरपाल को लॉ प्रोफाइल और शांत स्वभाव का नेता माना जाता है। अब वे भाया और नरेश मीणा के साथ त्रिकोणीय मुकाबले में हैं।
कुल मिलाकर इस सारे घटनाक्रम में वसुंधरा राजे भारी पड़ी है। चुनाव जीते तो रुतबा और बढ़ेगा और नहीं जीत सके तो हार का ठीकरा सरकार के कामकाज पर फूटना ही है। इसी चाल से मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ उलझन में फंस गए हैं।






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