माउंट आबू से इंग्लैंड तक : कर्नल टाॅड की राजस्थान प्रेम कहानी
कर्नल जेम्स टाड, यह नाम राजस्थान के इतिहास और संस्कृति में किसी किंवदंती की तरह गूंजता है। 1782 में जन्मे और 1835 में इस संसार से विदा हुए टाड केवल पचपन वर्षों तक जिए, लेकिन इस छोटे से जीवन में...

बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार
कर्नल जेम्स टाॅड, यह नाम राजस्थान के इतिहास और संस्कृति में किसी किंवदंती की तरह गूंजता है। 1782 में जन्मे और 1835 में इस संसार से विदा हुए टाॅड केवल पचपन वर्षों तक जिए, लेकिन इस छोटे से जीवन में उन्होंने राजस्थान को जिस रोमांटिक और गौरवशाली रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत किया, वह आज भी अमिट है। अंग्रेज होते हुए भी उनका दिल बार-बार राजस्थान की धड़कनों के साथ धड़कता था। वे सैनिक थे, राजनयिक थे, लेकिन सबसे बढ़कर राजस्थान के पहले “प्रेमी” थे, जिन्होंने यहां की वीरगाथाओं, लोककथाओं और संस्कृति को वैश्विक मंच तक पहुंचाया।
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1799 में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में आए टाॅड 1818 में मेवाड़ के राजनीतिक एजेंट बने। यही से उनका राजस्थान-प्रेम आकार लेने लगा। वे केवल राजनीतिक समझौतों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि गांव-गांव घूमकर, पुरानी वंशावलियों को सुनकर और लोकगीतों को संकलित कर, राजस्थान की आत्मा तक पहुंचे। वे न सिर्फ देख रहे थे, बल्कि महसूस कर रहे थे। यही संवेदना उनकी लेखनी में उतरकर बाद में Annals and Antiquities of Rajasthan और Travels in Western India जैसी कालजयी कृतियों में बदल गई।
टाॅड को सबसे पहले मोह लिया माउंट आबू ने। राजस्थान का यह पर्वतीय तीर्थ उनके लिए सिर्फ एक भूगोल नहीं था, बल्कि अपने देश इंग्लैंड की याद का सजीव रूप था। वहां की हरियाली, झरनों की मधुर ध्वनि, बादलों का आलिंगन और शांति। सब कुछ उन्हें अपने ब्रिटेन की पहाड़ियों की याद दिलाता। वे लिखते हैं कि आबू की वादियों में उतरते ही “मनुष्य को घर की याद नहीं सताती, क्योंकि यह तो स्वयं घर जैसा है।” यह कथन केवल तुलना नहीं थी, बल्कि उनके हृदय का वह गहरा भाव था जिसने राजस्थान को हमेशा के लिए उनकी स्मृतियों में बसाया।
टाॅड का लेखन महज यात्रा-वृत्तांत नहीं, बल्कि आत्मीय अनुभवों का साहित्य है। Travels in Western India इसी संवेदनशील दृष्टि का नतीजा है। इस पुस्तक में उन्होंने अपनी यात्राओं का वर्णन किया, जिनमें माउंट आबू विशेष रूप से केंद्र में रहा। रोचक बात यह है कि इस कृति को उन्होंने मिसेज कर्नल विलियम ब्लेअर को समर्पित किया। ब्लेअर स्कॉटलैंड की एक नामी चित्रकार थीं, जिन्होंने माउंट आबू और अन्य स्थलों के सुंदर चित्र बनाए। टाॅड इन चित्रों से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने लिखा, “मिसेज ब्लेअर ने आबू को इंग्लैंड ले आई।” इसका अर्थ यह था कि ब्लेअर के चित्रों ने आबू की प्राकृतिक और सांस्कृतिक सुंदरता को इंग्लैंड तक पहुंचाया। यह समर्पण न केवल व्यक्तिगत सम्मान का प्रतीक था, बल्कि यह भी दर्शाता है कि टाॅड के लिए राजस्थान केवल भूमि नहीं, बल्कि कला, सौंदर्य और संवेदनाओं का स्रोत था।
राजस्थान में टाॅड का योगदान अमूल्य है। उन्होंने मेवाड़ और मारवाड़ की राजवंशीय वंशावलियों को एकत्रित किया, लोककथाओं और गीतों को लिखित रूप दिया और वीरता की उन गाथाओं को संरक्षित किया जो केवल मौखिक परंपरा में जीवित थीं। यदि टाॅड न होते तो संभव है कि कई किंवदंतियां और ऐतिहासिक तथ्य आने वाली पीढ़ियों तक न पहुंच पाते। उनकी Annals and Antiquities of Rajasthan ने पूरे यूरोप को यह विश्वास दिलाया कि राजस्थान सिर्फ रेगिस्तान नहीं, बल्कि साहस, संस्कृति और कला का जीवित भंडार है। माउंट आबू की खूबसूरती को देखकर टाॅड ने इंग्लैंड को याद किया, लेकिन राजस्थान की वीरता को देखकर वे भारत की आत्मा से जुड़ गए। उनके लिए चित्तौड़ का किला केवल एक पत्थरों का ढेर नहीं था, बल्कि वह एक जीवित प्रतीक था स्त्रियों के जौहर, पुरुषों की शौर्यगाथाओं और राष्ट्र की अस्मिता का। वे मानते थे कि भारत का गौरव राजस्थान के शौर्य में सजीव है। इसीलिए उनके लेखन में बार-बार मेवाड़ की स्वतंत्रता, राणा की प्रतिष्ठा और वीरों की कथाएं प्रमुखता से आती हैं।
बेशक, उनके लेखन में औपनिवेशिक दृष्टि और कहीं-कहीं अतिशयोक्ति भी झलकती है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि टाॅड ने स्थानीय गाथाओं को रोमांटिक रंग दे दिया, जिससे इतिहास और कल्पना का मिश्रण हो गया। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यदि टाॅड न होते, तो राजस्थान का सांस्कृतिक परिचय विश्व मंच तक इतनी जीवंतता से न पहुंच पाता। यही कारण है कि पद्मश्री आचार्य मुनि जिनविजय जैसे गंभीर विद्वान भी स्वीकार करते हैं कि टाॅड का लेखन राजस्थान इतिहास के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण आधार है। टाॅड ने राजस्थान की संस्कृति को न केवल शब्दों में उकेरा, बल्कि उसे अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। उनके दिल में यह भूमि इतनी गहरी उतर चुकी थी कि उन्होंने अपने साहित्यिक योगदान के जरिए भारत और इंग्लैंड के बीच एक पुल खड़ा कर दिया। वह पुल, जो दो देशों के बीच केवल राजनीति या व्यापार का नहीं था, बल्कि संवेदनाओं और संस्कृति का था। आज जब हम राजस्थान पर्यटन की बात करते हैं, या उसकी संस्कृति और इतिहास को वैश्विक पहचान दिलाने की कोशिश करते हैं, तो यह मानना ही होगा कि इस यात्रा की शुरुआत टाॅड जैसे लोगों ने ही की थी। वे भले ही औपनिवेशिक सत्ता का हिस्सा थे, लेकिन उनकी कलम ने राजस्थान को विजेता और विजित के समीकरण से अलग करके, गौरव और वैभव के रूप में चित्रित किया।
कर्नल जेम्स टाॅड का जीवन और उनका लेखन एक सेतु है पश्चिम और पूर्व के बीच, औपनिवेशिक नजरिए और सांस्कृतिक सहानुभूति के बीच। माउंट आबू में बैठा वह अंग्रेज अफसर जब इंग्लैंड की यादों में खोकर राजस्थान की महिमा लिख रहा था, तब शायद उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी कलम एक दिन राजस्थान के गौरव की अमर धरोहर बन जाएगी। यह धरोहर आज भी हमें याद दिलाती है कि इतिहास केवल तलवारों से नहीं लिखा जाता। कभी-कभी एक संवेदनशील कलम भी उसे अमर बना देती है।






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