हमले के ‘रिमोट’ पर सवाल
कई लोग भारत- पाकिस्तान के बीच पांचवे युद्ध की आशंका से सहमे हुए हैं तो कई लोग इसे लेकर कयास लगा रहे हैं कि मोदी सरकार का आर या पार इस बार किस किस्म का...

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में वीभत्स आतंकी हमला
सुरेश व्यास
वरिष्ठ पत्रकार
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धारा 370 हटने के बाद ‘आजाद सांस’ ले रहे धऱती के स्वर्ग जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल की दोपहर हुए वीभत्स आतंकी हमले में 26 लोगों की जान चली गई। इसके बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर हैं। देश के लोगों में गुस्सा उबाल पर है। कूटनीतिक युद्ध शुरू हो चुका है। दोनों तरफ से जवाब दिए जा रहे हैं और लोग आशंकित हैं कि आगे क्या होगा? कई लोग भारत- पाकिस्तान के बीच पांचवे युद्ध की आशंका से सहमे हुए हैं तो कई लोग इसे लेकर कयास लगा रहे हैं कि मोदी सरकार का आर या पार इस बार किस किस्म का होगा। क्या बालाकोट या एयर स्ट्राइक जैसा कोई दृश्य फिर सामने आएगा या फिर इस बार कूटनीति के बाद क्या पाकिस्तान को जंगे मैदान में भी एक बार और धूल चटाने की तैयारी की जा रही है।
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वैसे तो पहलगाम के नामी पर्यटक स्थल बैसरन घाटी में कत्ले आम के तुरंत बाद मोदी सरकार हरकत में आ गई थी और खुद मोदी अपना सऊदी अरब का दौरा बीच में छोड़ कर दिल्ली लौट आए। इसी दिन भारत ने पाकिस्तान पर ‘कूटनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक’ कर दी और पाकिस्तान से राजनयिक व व्यापारिक सम्बन्ध तोड़ने के साथ पाकिस्तानी नागरिकों को बाहर निकालने के साथ 1960 में हुए सिंधु जल समझौते को स्थगित करने जैसे कदम उठा लिए गए। पाकिस्तान ने भी अगले दिन कड़ी प्रतिक्रिया दी और रेसिप्रोकल कदमों के साथ भारतीय विमानन कम्पनियों पर अपने एयर स्पेस के इस्तेमाल पर रोक के साथ लगभग चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि सिंधु जल समझौते को रोकना ‘युद्ध जैसी’ कार्रवाई मानी जाएगी। उसने भी भारतीय नागरिकों को तत्काल देश छोड़ने का हुक्म दे दिया।
ऐसा प्रतिशोध लिया जाएगा, जिसकी कल्पना भी नहीं की होगी
पहलगाम हमले के बाद बिहार में अपनी पहली ही आमसभा में प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि इस घटना का ऐसा प्रतिशोध लिया जाएगा, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। इसके बाद से लोगों के मन में सवालों पर सवाल उमड़ रहे हैं कि आगे होगा क्या? कहां होगा, कैसे होगा?
खैर, ये बात लिखे जाने तक तक भारत और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण माहौल में आशंकाओं के बादल ही उमड़- घुमड़ रहे हैं, लेकिन जब हम समूचे मामले की गहराई में जाते हैं तो कई सवाल सामने आते हैं। मसलन, कश्मीर से धारा 370 हटने और कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा स्थगित कर उसे केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद से सरकार लगातार दावे कर रही थी कि कश्मीर से दहशतगर्दी को खत्म कर दिया गया है। पिछले ही साल विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री ने अपने दौरे में कहा था कि अब तो कश्मीर के लोग आजादी से सांस ले पा रहे हैं। पर्यटन के साथ स्थानीय लोगों का काम धंधा भी फलने-फूलने लगा है। सरकार ने कितनी ही बार संसद में दिए गए जवाबों में भी दावा किया कि आंतकी घटनाएं लगभग खत्म प्रायः हो गई है और लोग बेखौफ होकर पर्यटन के लिए कश्मीर आ-जा रहे हैं। पर्यटकों की संख्या पिछले दो साल में ही डेढ़ करोड़ से बढ़कर इस साल अब तक ढाई करोड़ के करीब पहुंच जाने के आंकड़ों के साथ ये दावे बैसरन की घटना के दो दिन पहले तक होते रहे, तो सवाल उठता है कि ये हमला कैसे हो गया? क्या सरकार ने मान लिया था कि अब कोई आतंकी बंदूक चलाने की हिम्मत नहीं जुटा सकेगा? यदि ऐसा नहीं था तो ‘कश्मीर का स्विटजरलैंड’ कहे जाने वाले बैसरन में सुरक्षा व्यवस्था को क्यों भुला दिया गया? घटना के बाद सर्वदलीय बैठक में भी यह सवाल उठा और सरकार ने भी माना कि कहीं न कहीं चूक तो रही है, लेकिन टार्गेट किलिंग जैसी इस घटना ने इसे और भी अहम बना दिया है। कुछ पर्यटकों के दावे के आधार पर कहा गया कि आंतकियों ने धर्म और जाति पूछकर लोगों को निशाना बनाया। सिर्फ पुरुषों को कत्ल किया गया। वह भी ऐसे वक्त में जब अमरीका के उप राष्ट्रपति जे.डी. वैंस भारत की यात्रा पर थे, ताकि वैश्विक स्तर पर दब सा गया कश्मीर मुद्दा फिर दुनिया में प्रमुखता से गिनाया जा सके।
इधर, जिस तरह से घटना को सोशल मीडिया के जरिए साम्प्रदायिक रूप से पेश किया गया, वह कुछ और ही इशारा करता है। इस आतंकी घटना के बाद जगह- जगह सामने आ रहा साम्प्रदायिक तनाव किसी सियासी ध्रुवीकरण की ओर भी इशारा कर रहा है।
आतंकियों ने उठाया मौके का फायदा
बिना किसी संदेह के कहा जा सकता है कि आतंकियों को पाकिस्तान में बैठे आका निर्देशित कर रहे थे। पाकिस्तानी फौज और आतंकी संगठनों के प्लान के हिसाब से पहलगाम हमले को अंजाम दिया गया, लेकिन कई विशेषज्ञ मोदी सरकार की कश्मीर नीति पर भी सवाल उठाते हैं। इनका कहना है कि धारा 370 हटने के बाद कश्मीर में जरूरी आधारभूत विकास में तेजी आई है। अनिश्चितता के बादल छंटने लगे। पर्यटकों की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन आतंकी घटनाएं खत्म होने के मामले में सरकार अतिआत्मविश्वास में ही रही और छिटपुट घटनाएं होती रही और सरकार कहती रही कि अब हालात सामान्य है। इससे देश के अन्य हिस्सों से लोग सैर- सपाटे के लिए बड़ी संख्या में पहुंचे भी, लेकिन सुरक्षा बलों के बेहतरीन इस्तेमाल पर जैसे अतिआत्मविश्वास की गर्द चढ़ती रही और आतंकियों ने मौके का फायदा उठा लिया।
सवाल सुरक्षा बलों के घटना के करीब दो घंटे बाद मौके पर पहुंचने को लेकर भी है, क्योंकि जहां हमला हुआ वहां से सीआरपीएफ का कैम्प महज सात और सेना की राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) का कैम्प सिर्फ पांच किलोमीटर दूर था। इसे लेकर हताहत हुए लोगों के परिजनों ने भी सवाल उठाए हैं। अब प्रश्न उठता है कि आखिर हमला क्यों हुआ और क्या इसे सुरक्षा में चूक माना जाए? कश्मीर मामलों की जानकार और वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा भसीन बीबीसी से बातचीत में इस पर अचम्भा जताती है कि पहली बार उन्होंने देखा-सुना कि पहलगाम के प्रमुख पर्टयन स्थल के आस- पास सुरक्षाकर्मी तैनात नहीं थे। वे इस बात पर भी संदेह खड़ा करती हैं कि देरी से पहुंचे सुरक्षाकर्मियों ने कुछ घंटे बाद ही हमलावर आतंकियों के नाम और स्कैच जारी कर दिए। वे कहती हैं कि सुरक्षा एजेंसियों ने कभी इस इलाके से आतंक खत्म होने की बात नहीं की। वे हालात को नियंत्रण में ही बताते रहे, लेकिन राजनीतिक रूप से यह ज्यादा प्रचारित हुआ कि अब कश्मीर से आतंक पूरी तरह खत्म हो चुका है। जबकि हकीकत है कि कश्मीर में नजर आ रही शांति सुरक्षा बलों के नियंत्रण के कारण ही नजर आ रही थी।
फिर क्या कारण रहा कि इतना बड़ा आतंकी हमला पहलगाम में हो गया? इस पर कश्मीर मामलों पर नजदीक से नजर रखने वाले पत्रकार आनंद मणि त्रिपाठी कहते हैं कि सरकार ने धारा 370 हटाने का राजनीतिक फैसला तो कर लिया और इसके आधार पर कई बड़े दावे भी लगातार किए जाते रहे, लेकिन सरकार की राजनीतिक पहल में ध्रुवीकरण ज्यादा रहा। भाजपा के नेता लगातार ऐसे बयान देते रहे हैं, जिससे मुस्लिम आबादी में अलगाव पैदा होता है और हिन्दू आबादी उत्तेजित। उनका कहना है कि असल में आतंकी भी यही चाहते हैं कि हिन्दू- मुस्लिम एकता को निशाने पर लिया जाए। इसी को आतंकियों ने जिहाद का सहारा बना रखा है। पहलगाम हमले में भी यही दृष्टिगोचर होता है। हालांकि इस बार स्थानीय कश्मीरियों से आतंकियों को वह समर्थन नहीं मिल रहा और साम्प्रदायिक तरीके से की गई हत्याओं से उनमें भी रोष है। घटना के खिलाफ पूरे प्रदेश में कश्मीरी लोगों के प्रदर्शन और मस्जिदों से इमामों की ओर से हत्याओं की निंदा, इस बात की गवाही दे रहे हैं। सरकार को इसका फायदा लेना चाहिए और कश्मीर में ध्रुवीकरण की बजाय जम्मू- कश्मीर को भारतीयता की पहचान में लाया जाना चाहिए, अन्यथा कश्मीर को भारत की मुख्यधारा में लाने के सभी प्रयास अधूरे ही रह जाएंगे।
बहरहाल, पहलगाम हमले के बाद से भारत-पाकिस्तान में तनाव चरम पर है। आम लोग भी मान चुके हैं कि हमले का रिमोट पाकिस्तान में बैठे आतंकी आकाओं और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के हाथों में था, लेकिन निशाना सैलानियों को ही क्यों बनाया गया, यह पहेली सुलझना आसान नहीं है। भले ही हम मान लें कि कश्मीर और सीमा पार सक्रिय आतंकियों के बीच अब टैरर का हमास मॉडल पहुंच गया है। आपको याद दिला दें कि इस्रायल और हमास की जंग के बीच साल 2023 में पहली बार हमास ने ही इस्रायल के नोवा म्यूजिक फेस्टिवल में आम लोगों और पर्यटकों को निशाना बनाया था, ताकि आम लोगों की भावनाओं को भड़काया जा सके।






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