अरावली पर उबाल
अरावली पर्वत शृंखला को लेकर सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत नई परिभाषा ने पर्यावरणविदों और समाज को चिंता में डाल दिया है। खनन, भूजल और पारिस्थितिकी से जुड़ा यह विवाद अब पुनर्विचार याचिकाओं और जन आंदोलन के...

राधा रमण,
वरिष्ठ पत्रकार
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दुनिया की प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शुमार अरावली पर्वत श्रृंखला पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अरावली पर्वत श्रृंखला हिन्द – गंगीय मैदानी इलाकों को रेगिस्तानी रेत से बचाने में बैरियर का काम करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह पर्वत श्रृंखला न होती तो भारत का उत्तरी क्षेत्र रेगिस्तान में तब्दील हो गया होता। इस पर्वत माला की वजह से ही रेगिस्तान गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक नहीं फैल पाया। इसकी वजह से ही दिल्ली से गुजरात तक लगभग 700 किलोमीटर की आबोहवा सुरक्षित रहती रही है। इसीलिए अरावली की पहाड़ियों को उत्तर भारत का फेफड़ा कहा जाता है। इन पूरे इलाके में जैव विविधता और भूजल के प्रबंधन में अरावली पर्वत श्रृंखला की अहम भूमिका रही है। अरावली में कुल एक लाख 19 हजार छोटी-बड़ी पहाड़ियां हैं। इसका फैलाव चार राज्यों के 39 जिलों तक है। तो फिर अचानक अरावली पर्वत श्रृंखला पर संकट के बादल क्यों मंडराने लगे हैं ?
दरअसल, पिछले करीब 35 वर्षों से अरावली पर्वत माला से सटे इलाकों में खनन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गयी थीं। इन याचिकाओं का मकसद अरावली क्षेत्र में खनन के लिए कड़े और साफ -सुथरा नियम बनाना था। सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं की सुनवाई करते हुए पिछले साल मई में खनन की एक समान परिभाषा की सिफारिश करने के लिए केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी। अदालत का मकसद था कि अरावली के दायरे में आनेवाले राज्यों दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में नियमों की अलग-अलग व्याख्या के कारण उनका उल्लंघन रोका जाए। कमेटी में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली के प्रतिनिधियों के साथ-साथ तकनीकी निकायों के प्रतिनिधि भी शामिल थे। कमेटी ने पिछले दिनों अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंप दी है और अदालत ने 20 नवंबर 25 को पर्यावरण, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत गठित अरावली पहाड़ियों और पर्वत मालाओं की परिभाषा संबंधी कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था। अदालत का यह कदम लंबे समय से चले आ रहे विवादों को सुलझाना था। लेकिन इस परिभाषा के सीमित पारिस्थितिक दृष्टिकोण ने पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को लेकर नई चिन्ताएं खड़ी कर दी है। विवाद का असली कारण यही है।
सरकार व सुप्रीम कोर्ट ने लगाई खनन पर रोक
पर्यावरणविद और समाजसेवी इसे आम जनता के हितों के विरुद्ध बता रहे हैं और इसे लेकर सरकार को कसूरवार ठहरा रहे हैं। हालांकि सरकार व सुप्रीम कोर्ट ने विवाद पर विराम लगाने के लिए समूचे अरावली क्षेत्र में फिलहाल किसी तरह के खनन पर रोक लगा दिया है। लेकिन मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। सरकार के सुझाव पर अदालत द्वारा सुलगाई गयी चिनगारी का आखिरी निदान भी शीर्ष अदालत को ही करना होगा।
नई परिभाषा का विरोध क्यों
नई परिभाषा के अनुसार स्थानीय धरातल से 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियां ही अरावली की पहाड़ियां मानी जाएगी। ऊंचाई का मापदंड समुद्र तल से तय होता है। अगर दिल्ली की बात करें तो समुद्र तल से इसकी ऊंचाई करीब 260 मीटर पड़ती है। यही हाल फरीदाबाद और गुरुग्राम का भी है। जबकि दिल्ली –एनसीआर में अरावली पहाड़ियों की ऊंचाई 300 मीटर के आसपास पड़ती है। ऐसे में दिल्ली-एनसीआर में नई परिभाषा के हिसाब से अरावली की ज्यादातर पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम हो जाती है। अगर यहां खनन की इजाजत मिलती है तो एनसीआर के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो जाएगा। वैसे भी यह इलाका भूकंप के खतरनाक जोन में आता है। अरावली की पहाड़ियों की वजह से ही भूकंप से इसकी रक्षा हो पा रही है। हरियाली और भूजल स्तर नियंत्रण में भी अरावली की पहाड़ियों का बड़ा योगदान है। तकरीबन यही हाल हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के कुछ इलाकों का भी है। यही कारण है कि अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा का देहात से दिल्ली तक जगह-जगह विरोध शुरू हो गया है। वाटरमैन के नाम से विख्यात मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेन्द्र सिंह ने तो ‘अरावली पर नया संकट’ नाम से 60 पेज की एक पुस्तिका छपवा ली है जिसमें अरावली को लेकर तरुण भारत संघ के संघर्ष और नजरिये का विस्तार से उल्लेख किया गया है। ज्ञात रहे कि तरुण भारत संघ काफी पहले से अरावली की पहाड़ियों के संरक्षण की लड़ाई लड़ता रहा है। अरावली पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के खिलाफ राजस्थान के जोधपुर, सिरोही, राजसमन्द, अजमेर, उदयपुर और दिल्ली-एनसीआर में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। लोगबाग अरावली की अस्मिता को अपने जीवन की अस्मिता से जोड़ रहे हैं। पर्यावरणविद, समाजसेवी संगठन और सियासी दल भी इस आंदोलन को हवा दे रहे हैं। उनका कहना है कि अरावली में खनन की अनुमति देकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अरावली की भूमि भूमाफिया और बिल्डरों को देने की खुली छूट दे दिया है। अदालत को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।
पुनर्विचार के लिए याचिका
केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गयी अरावली की नई परिभाषा और उस पर सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृति के खिलाफ जाने-माने पर्यावरणविद एवं सेवानिवृत्त वन संरक्षक डॉ आर पी बालवान ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। डॉ बालवान का कहना है कि अदालत के नये फैसले से एनसीआर में लोगों का जीवन संकट में पड़ जाएगा। अरावली पर्वत श्रृंखला है न कि एक पहाड़। ऐसे में इसकी परिभाषा ऊंचाई से तय करना सही नहीं है। यह जितना ऊपर है उससे कहीं अधिक नीचे है। अरावली की परिभाषा बनाने वालों को इसका अहसास होना चाहिए कि इसके बिना यहां सांस लेना दूभर हो जाएगा। राजस्थान की रेतीली हवाएं दिल्ली का दम घोंट देंगी। उनका यह भी कहना है कि भूमाफिया और खनन माफिया के दबाव में सरकार ने नई परिभाषा बनाई है। एक तरफ सरकार अरावली ग्रीन वाल प्रोजेक्ट बनाने की बात करती है, दूसरी तरफ अरावली को ही ख़त्म करने का कुचक्र करती है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी कहते हैं कि अजीब बात है कि राजस्थान सरकार के जिस प्रस्ताव को 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने गलत बताकर खारिज कर दिया था, 2025 में 15 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसी प्रस्ताव को अपने फैसले का आधार बना दिया है। अच्छी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने डॉ बालवान की याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। साथ ही केन्द्र सरकार के अलावा दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात सरकार को नोटिस भेजकर अपना पक्ष रखने को कहा है। यानी कि अरावली का मामला अभी समाप्त नहीं हुआ है। इस पर सुनवाई चलती रहेगी।
सरकार की सफाई
केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव कहते हैं कि यह कहना सही नहीं है कि सरकार अरावली की अस्मिता से खिलवाड़ कर रही है। अरावली के कुल एक लाख 44 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में महज 277 वर्ग किलोमीटर ही खनन के लिए योग्य है। यह कुल क्षेत्रफल का मात्र 0.19 फीसदी है। बाकी अरावली पूरी तरह सुरक्षित और संरक्षित है। 100 मीटर की ऊंचाई की सीमा रेखा को स्पष्ट करते हुए केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि इसका तात्पर्य पहाड़ी के शीर्ष से नीचे तक के फैलाव से है। साथ ही दो पर्वत श्रृंखलाओं के बीच का अंतर भी अरावली श्रृंखला का हिस्सा माना जाएगा। इस परिभाषा के अनुसार 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र संरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सतत खनन के लिए एक प्रबंधन योजना तैयार करने का निर्देश दिया है। इसके बाद, किसी भी गतिविधि को आगे बढ़ाने से पहले भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद से अनुमति लेना आवश्यक होगा। उन्होंने जोर देकर बताया कि दिल्ली-एनसीआर में अरावली पहाड़ियों पर खनन पहले से ही पूरी तरह प्रतिबंधित है। हमारी सरकार पिछले दो वर्षों से ‘हरित अरावली’ कार्यक्रम चला रही है। हम अरावली के प्रति बहुत सजग हैं।
बहरहाल, अरावली पर शीर्ष अदालत के आदेश से उठे तूफान का निदान अदालत को ही करना होगा। देखना होगा कि शीर्ष अदालत इस मामले का निराकरण कैसे और कब तक करती है।






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