‘जयपुर फुट’, से मिला जीने का हौसला
कभी एक टूटी हुई पगडंडी थी, जिस पर न तो कोई साफ़ रास्ता था, न ही उम्मीदों के कोई निशान। यह पगडंडी एक ऐसे घायल इंसान के आंसुओं से भीगी थी — जिसने चलने की चाह तो रखी, पर पांव नहीं थे। और तब कहीं दूर एक...

एक टूटी पगडंडी से शुरू हुई थी यह यात्रा…
कभी एक टूटी हुई पगडंडी थी, जिस पर न तो कोई साफ़ रास्ता था, न ही उम्मीदों के कोई निशान। यह पगडंडी एक ऐसे घायल इंसान के आंसुओं से भीगी थी — जिसने चलने की चाह तो रखी, पर पांव नहीं थे। और तब कहीं दूर एक दिल धड़क रहा था, जो उस पगडंडी को राह बनाना चाहता था। उस दिल का नाम है— डी.आर. मेहता।
उन्होंने न कोई हथियार उठाया, न कोई आंदोलन छेड़ा। उन्होंने बस एक सवाल उठाया— “अगर कोई चल नहीं सकता, तो क्या वह जी भी नहीं सकता?”
इस सवाल का उत्तर बना — ‘जयपुर फुट’।
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‘जयपुर फुट’ केवल रबर और लकड़ी का बना एक कृत्रिम अंग नहीं है। यह मानवता के उन टूटे पांवों के नीचे बिछी वह मिट्टी है, जो उन्हें फिर से खड़ा होने का हौसला देती है। यह वो चप्पल है, जो आत्मसम्मान की खामोश आहट में भी रास्ता ढूंढ लेती है। यह वो लाठी है, जो गिरने नहीं देती, और वो सपना है, जो अंधेरे में भी रोशनी खोज लेता है।
भारत में जब विकलांगता को कलंक की नजर से देखा जाता था, तब ‘जयपुर फुट’ ने यह सिखाया कि शरीर की कमी आत्मा की शक्ति को नहीं रोक सकती। विकलांग व्यक्ति को सहारा नहीं, सम्मान चाहिए— और आत्मनिर्भरता का अवसर।
अब तक 24 लाख लोग को लाभ
भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति (बी.एम.वी.एस.एस.) की स्थापना जब हुई, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी संस्था बन जाएगी, जो विकलांगों को कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण निःशुल्क प्रदान करेगी। आज तक 24 लाख से अधिक लोग इसका लाभ ले चुके हैं। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं— ये नई चाल की रचना, उम्मीद की मरम्मत, और आत्मा की पुनः प्रतिष्ठा के प्रतीक हैं।
इस यात्रा की एक घटना इतिहास में मानवीयता की मिसाल बन गई है— एक पाकिस्तानी सैनिक ने कहा, “मेरा पैर भारत की गोली से गया, लेकिन भारत ने ही मुझे खड़ा किया।” यह उस सेवा की पराकाष्ठा है, जो सीमाओं से परे, केवल मानवता के नाम पर की जाती है। ‘जयपुर फुट’ को महज़ एक तकनीकी उपकरण कहना न्याय नहीं होगा। यह एक दर्शन है— “Mobility for Dignity” का मंत्र। यह सोच है कि किसी को सहारा देकर नहीं, बल्कि उसे अपने पैरों पर खड़ा करके आत्मनिर्भर बनाया जाए।
देसी तकनीक से बनाया ग्लोबल माॅडल
‘जयपुर फुट’ की सफलता इस बात की मिसाल है कि कैसे स्थानीय संसाधनों और देसी तकनीक से एक ग्लोबल मॉडल बनाया जा सकता है। जहां पश्चिमी देशों में कृत्रिम पैर लाखों रुपए में बिकते हैं, वहीं जयपुर फुट निःशुल्क या बेहद कम लागत में उपलब्ध है— और तकनीकी रूप से कहीं भी कमतर नहीं। इस तकनीक को पहचान दिलाने में बॉलीवुड के अभिनेता कमल हासन से लेकर अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी तक का योगदान रहा है। आज यह तकनीक अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों तक पहुंच चुकी है।
बी.एम.वी.एस.एस. की कार्यशालाएं और विशेष शिविर ग्रामीण क्षेत्रों में क्रांति ला रहे हैं। इन शिविरों में मिलने वाले कृत्रिम अंग, व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र और अन्य उपकरणों ने लाखों लोगों को न केवल नई ज़िंदगी दी है, बल्कि आत्मविश्वास भी लौटाया है।
जब करुणा और तकनीक का मिलन होता है, तो चमत्कार जन्म लेते हैं — ‘जयपुर फुट’ इसका सबसे जीवंत उदाहरण है। यह एक ऐसी तकनीक है, जो गले लगाती है, सहलाती है, और फिर से दौड़ने का सपना देती है। आज जब ‘जयपुर फुट’ की यात्रा 50 वर्ष पूरे कर रही है, तो यह केवल एक संस्था की वर्षगांठ नहीं, बल्कि करुणा, तकनीक और आत्मबल के त्रिवेणी संगम की वर्षगांठ है। डी.आर. मेहता की दूरदृष्टि, सेवा भावना और संगठन निर्माण की अद्भुत क्षमता ने जो बीज बोया था, वह आज एक वटवृक्ष बन चुका है— जिसकी छांव में लाखों जीवन न सिर्फ संवर रहे हैं, बल्कि नए सपने भी देख रहे हैं।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का अध्ययन: “दुनिया का सबसे बड़ा भिखारी”
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध सामाजिक शोधकर्ता डॉ. जेम्स हिल्टन द्वारा 1995 में किए गए एक गहन अध्ययन में डी.आर. मेहता को एक विशेष उपमा दी गई— “दुनिया का सबसे बड़ा भिखारी”। यह उपमा साधारण नहीं थी, बल्कि एक गहरा और प्रेरक अर्थ अपने भीतर समेटे हुए थी— जो उनके समर्पण, सेवा भावना, और समाज के प्रति प्रतिबद्धता को उजागर करती है। यहां “भिखारी” शब्द किसी निर्धनता या गरीबी का प्रतीक नहीं था, बल्कि उस व्यक्ति की छवि प्रस्तुत करता है, जो अपनी पूरी जिंदगी समाज की भलाई के लिए अर्पित कर देता है— अपना समय, ऊर्जा और ज्ञान सबकुछ समर्पित कर देता है। मेहता ने कभी भी किसी से व्यक्तिगत लाभ की याचना नहीं की। वे तो सदा समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए सेवा, समर्पण, और संवेदना की ‘भिक्षा’ मांगते रहे— ताकि कोई अपाहिज खड़ा हो सके, कोई टूटा हुआ सपना फिर से उड़ान भर सके। यह उपमा उनके द्वारा किए गए निःस्वार्थ कार्यों और समाज में लाए गए परिवर्तनकारी प्रभाव का प्रतीक है— जो यह सिखाती है कि सच्चा नेतृत्व मांगने में नहीं, देने में होता है।
दीपक की लौ-सा जीवन: डी.आर. मेहता का शब्दचित्र
नब्बे वर्ष की आयु में, जब अधिकांश लोग स्मृतियों की छांव में विश्राम खोजते हैं, डी.आर. मेहता आज भी सेवा के सूर्य की पहली किरण बनने को तत्पर हैं। उनका जीवन एक चिरसंचारी जलधारा की भांति है— न थमता है, न ठहरता। वे उस वटवृक्ष की तरह हैं, जिसकी जड़ें गहराई तक समर्पण में धंसी हुई हैं, और जिसकी छाया ने अनगिनत जीवन को राहत और संबल प्रदान किया है।
प्रशासनिक सेवा में वे एक मूक बांसुरी जैसे रहे— शांत, लेकिन जब भी फूंकी गई, तो समाजहित की स्वर-लहरियां गूंज उठीं। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के उन विरले अधिकारियों में से हैं, जिनकी नीयत, नज़रिया, और निष्ठा— तीनों में अद्भुत संतुलन रहा। उन्होंने अपने पद को सिंहासन नहीं, साधना माना। और जब सेवा से निवृत्त हुए, तो वे उस घड़ीदार की भांति निकले जो आज भी समाज के लिए समय गिनता है, राह दिखाता है।
‘जयपुर फुट’ की कल्पना उनके भीतर उसी क्षण अंकुरित हुई थी, जब उन्होंने एक अपंग युवक को सड़क किनारे गिरते हुए देखा। उस क्षण वे पिघलते मोम की तरह हो गए— भीतर की संवेदना ने उन्हें तपाया, और सेवा का दीपक बनकर उन्होंने रोशनी दी उन तमाम ज़िंदगियों को, जो जीवन की दौड़ से सिर्फ इसलिए बाहर हो गई थीं, क्योंकि उनके पास पैर नहीं थे। उनकी सोच किसी प्राचीन लिपि की तरह है— सरल, फिर भी गूढ़। वे बोलते कम हैं, लेकिन उनके कर्म स्वयं मुखर हैं— जैसे कोई सन्त बिना उपदेश के, केवल जीवन जीकर शिक्षा दे। उनकी दृष्टि में सेवा कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि करुणा की साधना है।
डी.आर. मेहता एक ऐसा दीपक हैं जो स्वयं जलता है, और दूसरों के जीवन में उजाला भरता है। वे उम्र की किताब में भले ही नब्बेवें पृष्ठ पर हों, लेकिन उनका उत्साह आज भी पहले अध्याय-सा ताज़ा है। वे हमें सिखाते हैं कि सेवा का कोई रिटायरमेंट नहीं होता— यदि हृदय में संवेदना की ज्वाला जल रही हो, तो जीवन का हर क्षण उपयोगी बन सकता है। वे समय के उस संतुलित पलड़े की तरह हैं— जिसकी एक ओर अनुभव का भार है, तो दूसरी ओर सेवा की परिपक्वता।
मुस्कानों से रोशन गलियां
कुछ लोग इतिहास की किताबों में दर्ज होते हैं, और कुछ इंसानियत की रगों में बहते हैं। डी.आर. मेहता ऐसा ही एक नाम हैं— जिनके हाथ में कलम है, पर दिल में करुणा का क़लमघर भी धड़कता है। भारत के प्रशासनिक गलियारों में जहां वे नीतियों के शिल्पकार रहे हैं, वहीं ‘जयपुर फुट’ के ज़रिए वे लाखों ज़िंदगियों में आज भी आशा की रीढ़ रोपते आ रहे हैं।
उनके द्वारा प्राप्त पद्म भूषण महज़ एक सम्मान नहीं, उस हर कृतज्ञ पांव की गूंज है, जो आज ज़मीन पर आत्मविश्वास से चल रहा है। ‘राजस्थान रत्न’ उनके लिए राज्य की मिट्टी की ओर से झुकी हुई कृतज्ञता है— जैसे मरुधरा अपने बेटे को आशीर्वाद में मोतियों की माला पहना रही हो। ‘भारत निर्माण पुरस्कार’ उनके उन कदमों की चमक है, जो गांवों की धूल भरी पगडंडियों पर भी उजाले की चादर बिछा रहे हैं। लेकिन यह रोशनी केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रही। जब CNN-IBN और CNBC-TV18 जैसे मंच उन्हें सम्मानित करते हैं, तो लगता है जैसे दुनिया भारत के उस कोने को देख रही है, जहाx सेवा और सरलता साथ-साथ चलते हैं।
डॉ. पॉल ब्रांड अवॉर्ड, टेक म्यूज़ियम अवॉर्ड, रोटरी इंटरनेशनल का ‘Service Above Self’ सम्मान– ये सब उनके उस अंतर्निहित मंत्र के साक्षी हैं: “दूसरों के लिए जियो, यही असली जीवन है।”
Forbes Asia उन्हें “Heroes of Philanthropy” कहता है, लेकिन जिन ज़रूरतमंदों को वे कृत्रिम अंग पहनाते हैं, उनके लिए वे हीरो नहीं— फरिश्ते हैं।
डी.आर. मेहता की उपलब्धियां किसी दीवार पर टंगे तमगों की कतार नहीं हैं, बल्कि वे उन गली-कूचों में दौड़ते बच्चों की हंसी हैं, जो कल तक एक पैर पर ज़िंदगी को घसीट रहे थे। उनका जीवन इस बात का प्रतीक है कि पद, पुरस्कार और प्रसिद्धि से परे भी एक सेवा-संसार है, जहां दिल की धड़कन ही सबसे बड़ी भाषा बन जाती है।






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