जल्दबाजी का फैसला या चुनावी रणनीति?
मतदाताओं को रिझाने के लिए कई बार सत्ताधारी राजनीतिक दल जल्दबाजी में ऐसे कदम उठा लेते हैं, जो जोखिमभरे होने के साथ ही किसी भी प्रदेश की आर्थिक तबीयत नासाज करने के लिए काफी होते...

राकेश गांधी –
(वरिष्ठ पत्रकार)
मतदाताओं को रिझाने के लिए कई बार सत्ताधारी राजनीतिक दल जल्दबाजी में ऐसे कदम उठा लेते हैं, जो जोखिमभरे होने के साथ ही किसी भी प्रदेश की आर्थिक तबीयत नासाज करने के लिए काफी होते हैं। राजस्थान में भी कुछ ऐसा ही हुआ। पिछली कांग्रेस सरकार ने चुनाव से कुछ ही पूर्व जिलों की संख्या बढ़ाकर अपना वोट बैंक बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन जनता ने उसे सत्ता विहीन ही कर दिया। हालांकि प्रदेश में प्रशासनिक दृष्टि से कई बड़े कस्बों को जिलों में तब्दील करने की मांग लम्बे समय से चली आ रही थी, लेकिन बगैर योजनाबद्ध तरीके के उठाया गया ये कदम कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ। सत्ता जैसे ही भाजपा के हाथों में आई, उसने तत्काल कांग्रेस के इस फैसले को बदल दिया और कई जिलों को फिर से भंग कर दिया। राजनीतिक परिस्थितियां भले ही कुछ भी रही हो, वास्तविक तौर पर विश्लेषण किया जाए तो ये स्पष्ट है कि कांग्रेस ने ठोस व योजनाबद्ध तरीके से जिले बढ़ाने का कदम नहीं उठाया। यदि वित्तीय व प्रशासनिक दृष्टि से पूरी तरह सोच-समझकर ये प्रयास किया जाता तो किसी भी अन्य पार्टी के लिए ये फैसला पलटना आसान नहीं होता।
माना कि जिलों की संख्या बढ़ाना या घटाना सरकारों के दृष्टिकोण और प्राथमिकताओं का प्रतिबिंब है। कांग्रेस ने इसे प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और विकास के लिए आवश्यक समझा होगा, जबकि भाजपा ने इसे प्रशासनिक सरलता और आर्थिक बचत के लिए उचित माना हो। दोनों पार्टियों के फैसलों के पीछे राजनीतिक उद्देश्य भी रहे हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के जिले बढ़ाने के कदम ने जनता के एक हिस्से का समर्थन हासिल किया, लेकिन इसकी दीर्घकालिक सफलता प्रशासनिक क्षमता और नए जिलों में संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर थी। हालांकि, यह निर्णय कई विवादों और आर्थिक बाधाओं के कारण पूर्ण रूप से सफल नहीं माना जा सकता। वहीं भाजपा ने जिलों की संख्या कम करके कांग्रेस को यह संदेश दिया है कि वह राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से कांग्रेस के फैसलों को चुनौती देने और उन्हें कमजोर करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह प्रयास भाजपा द्वारा खुद को “प्रभावी प्रशासन और वित्तीय अनुशासन” की पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने व कांग्रेस को “वोट बैंक राजनीति” और “अव्यवस्थित फैसलों” की पार्टी के रूप में चित्रित करने का भी हो सकता है। यदि प्रदेश के आर्थिक हालात व भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए सही मायने में विश्लेषण किया जाए तो भाजपा सरकार द्वारा जिलों को कम करने का वास्तविक कारण प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना, वित्तीय जिम्मेदारी निभाना और क्षेत्रीय संतुलन को बनाए रखना समझा जा सकता है। साथ ही, यह कांग्रेस की “लोकलुभावन राजनीति” पर सीधा प्रहार और खुद को एक “उत्तरदायी सरकार” के रूप में प्रस्तुत करने की रणनीति का हिस्सा भी कह सकते हैं।
राजस्थान में जिलों की संख्या घटाने का फैसला उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की तुलना से प्रेरित हो सकता है, लेकिन यह सीधे तौर पर उनके मॉडल को अपनाने का प्रयास नहीं था। राजस्थान की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति के मद्देनजर, भाजपा ने शायद यह महसूस किया हो कि छोटे जिलों का निर्माण यहां व्यावहारिक नहीं है। यह कदम राज्य की प्रशासनिक जरूरतों, आर्थिक विवेक, और राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है और राजस्थान की विशिष्ट परिस्थितियों पर आधारित है।
अपने फैसले को भुना नहीं सकी कांग्रेस
जनता के समक्ष ये सवाल उठना लाजिमी है कि कांग्रेस ने चुनाव से कुछ समय पूर्व ही जिलों की संख्या क्यों बढ़ाई? हालांकि जनता अच्छे से समझती है कि जिलों को बढ़ाना या घटाना अक्सर राजनीतिक, प्रशासनिक, और सामाजिक कारणों से जुड़ा होता है। नए जिलों से स्थानीय स्तर पर शासन और विकास कार्यों में तेजी आने की उम्मीद थी। नए जिले बनाना सरकार के लिए एक लोकप्रिय निर्णय हो सकता है, क्योंकि इससे स्थानीय स्तर पर जनता में सकारात्मक संदेश जाता है। यह क्षेत्रीय नेताओं और जनता को खुश करने की रणनीति हो सकती है। नए जिलों से इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार और रोजगार के अवसर बढ़ाने का भी लक्ष्य था। कांग्रेस सरकार द्वारा राजस्थान में जिलों की संख्या बढ़ाने के पीछे कई मंशाएं रही होगी, जो राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जा सकती हैं। बड़े जिलों को विभाजित कर छोटे जिले बनाना कांग्रेस का प्रयास था, जिससे स्थानीय प्रशासन को मजबूत किया जा सके। छोटे जिलों में लोगों की समस्याओं का समाधान जल्दी और प्रभावी तरीके से हो सकता है। कई क्षेत्रों में लंबे समय से नए जिले बनाने की मांग चल रही थी। कांग्रेस ने इन मांगों को पूरा करके जनता का समर्थन पाने की कोशिश की। कुछ क्षेत्रों में जनता ने नए जिलों का स्वागत किया। प्रशासनिक कार्यों में तेजी आई, और कई स्थानों पर विकास परियोजनाओं को बल मिला। जिन क्षेत्रों को नए जिले का दर्जा मिला, वहां कांग्रेस को समर्थन बढ़ाने में मदद मिली। नए जिलों के निर्माण में सरकारी खजाने पर बड़ा बोझ पड़ा। नई प्रशासनिक संरचना स्थापित करने में बहुत खर्च हुआ। कई जगहों पर यह तर्क दिया गया कि सरकार ने जिले तो बना दिए, लेकिन जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और सेवाओं को पूरा करने में असमर्थ रही। कुछ क्षेत्रों में जिलों की सीमाओं को लेकर असंतोष और विवाद उभर कर आए। कई जगह लोग इस बात से नाखुश थे कि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया। भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने इसे “चुनावी चाल” और “अव्यावहारिक कदम” करार दिया। भाजपा ने दावा किया कि यह निर्णय केवल जनता को लुभाने के लिए लिया गया, न कि वास्तविक जरूरतों को देखते हुए। नए जिलों से जनता को उच्च स्तर की सेवाओं की उम्मीद थी, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण यह हमेशा संभव नहीं हो सका।
भाजपा ने दिया प्रशासनिक व आर्थिक दुविधाओं का हवाला
भाजपा सरकार भले ही ये कह दे कि ज्यादा जिलों के कारण प्रशासन पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा था और समन्वय में कठिनाई हो रही थी। ये सही है कि नए जिलों के निर्माण और संचालन में काफी धन खर्च होता है, लेकिन बेहतर तो ये ही होता कि इस फैसले को बदलने से पहले न केवल आर्थिक, बल्कि प्रशासनिक दृष्टि से भी अच्छे से विचार कर लिया जाता, तो शायद इस फैसले में जल्दबाजी नहीं दिखती। केवल कांग्रेस का फैसला ही बदलना है, इसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। भाजपा सरकार ने संभवतः उन क्षेत्रों में लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास किया, जहां कांग्रेस द्वारा बनाए गए नए जिले विवादास्पद साबित हो रहे थे। भाजपा शासित सरकार ने राजस्थान में जिलों की संख्या कम करके कांग्रेस को कई राजनीतिक और प्रशासनिक संदेश दिए हैं। यह कदम न केवल एक प्रशासनिक निर्णय है, बल्कि कांग्रेस की नीतियों और कार्यप्रणाली पर प्रतिक्रिया और राजनीतिक संदेश देने का तरीका भी समझा जा सकता है। भाजपा ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि कांग्रेस द्वारा किए गए जिलों के विस्तार के निर्णय को वह अव्यावहारिक और अल्पकालिक लाभ के लिए उठाया गया कदम मानती है। कांग्रेस ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए नए जिलों का निर्माण किया, लेकिन इसने आर्थिक और प्रशासनिक बोझ को नजरअंदाज किया। भाजपा ने यह संदेश दिया है कि सरकार के फैसले जनता की वास्तविक जरूरतों और दीर्घकालिक विकास पर आधारित होने चाहिए, न कि केवल वोट बैंक की राजनीति पर। कांग्रेस के फैसले को “फिजूलखर्ची” के रूप में प्रस्तुत कर, भाजपा ने खुद को एक जिम्मेदार और व्यावहारिक सरकार के रूप में पेश करने की कोशिश की है। भाजपा ने उन क्षेत्रों में बदलाव किए, जहां कांग्रेस ने नए जिले बनाकर समर्थन जुटाने की कोशिश की थी। यह कदम कांग्रेस के क्षेत्रीय समर्थन आधार को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। यह कदम कांग्रेस की नीतियों को असफल और “नौटंकी” के रूप में दिखाने की भाजपा की बड़ी चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। भाजपा ने यह संकेत भी दिया कि वह कांग्रेस की “बिना गहराई वाली” योजनाओं को पलटने में सक्षम है।
ये कारण हो सकते हैं जिले घटाने के
जिलों की संख्या को कम करने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जो प्रशासनिक, आर्थिक, और राजनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। अधिक जिलों के निर्माण से प्रशासनिक ढांचा जटिल हो जाता है। नए जिलों के निर्माण और संचालन में भारी खर्च होता है, जिसमें कलेक्टर कार्यालय, पुलिस विभाग, न्यायपालिका, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थापना शामिल हैं। कांग्रेस द्वारा बनाए गए कई नए जिले व्यावहारिक रूप से छोटे थे और उनकी स्थापना के लिए पर्याप्त आधारभूत संरचना नहीं थी। पुराने जिलों की बहाली से विवादित क्षेत्रों में शांति और संतुलन लाना। भाजपा ने इसे कांग्रेस के फैसलों को “अस्थिर और अव्यवस्थित” दिखाने का मौका बनाया। यह कदम भाजपा के लिए यह संदेश देने का जरिया हो सकता है कि वह “जिम्मेदार प्रशासन” देने में सक्षम है। कांग्रेस के वोट बैंक को कमजोर करना और अपने समर्थकों को यह दिखाना कि भाजपा निर्णयों को “आर्थिक और प्रशासनिक विवेक” के आधार पर लेती है। आगामी चुनावों के मद्देनजर भाजपा ने यह कदम उठाया, ताकि वह कांग्रेस के “अव्यावहारिक” फैसले को जनता के सामने उजागर कर सके।
प्रतिकूल व अनुकूल, दोनों परिणाम संभव
जिलों की संख्या कम करने के कदम पर जनता क्या सोचती है, ये तो भविष्य के गर्भ में है और आगामी चुनाव में ही पता चलेगा। इस निर्णय से सरकार को सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों प्रकार के परिणाम का सामना करना पड़ सकता है। कुछ ये मान सकते हैं कि जिलों की संख्या घटाने से प्रशासनिक कार्यों में तेजी आएगी और निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी। छोटे जिलों के कारण बढ़े खर्च को नियंत्रित करके सरकार उन संसाधनों का उपयोग अन्य विकास कार्यों में करेगी। जिन क्षेत्रों में नए जिलों के निर्माण से असंतोष था, वहां यह कदम एक समाधान के रूप में देखा जा सकता है। वहीं जिन क्षेत्रों का जिला मुख्यालय हटाया गया है या जिन जिलों को पुनः बड़े जिलों में मिलाया गया है, वहां के लोगों को यह महसूस हो सकता है कि उनका क्षेत्र विकास से वंचित हो जाएगा। प्रभावित क्षेत्रों में लोग इस कदम को “राजनीतिक निर्णय” मानकर भाजपा के खिलाफ नाराजगी प्रकट कर सकते हैं। छोटे जिलों के कारण जिन लोगों को स्थानीय स्तर पर सुविधाएं मिलने लगी थीं, वे अब पुनः बड़ी दूरी तय करने को मजबूर हो सकते हैं। ये तो भविष्य में प्रदेश के विकास से ही पता चल पाएगा कि भाजपा सरकार का ये फैसला गलत था या सही।
परिणाम कुछ भी संभव
भाजपा सरकार को इस कदम के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। यदि सरकार इस कदम के बाद प्रभावी प्रशासन, संसाधनों का सही उपयोग, और क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित कर पाती है, तो यह निर्णय उसके व प्रदेश के लिए लाभकारी हो सकता है। लेकिन, अगर जनता को लगा कि उनकी समस्याओं की अनदेखी की गई है, तो यह कदम राजनीतिक दृष्टि से नुकसान का कारण बन सकता है। सरकार के लिए असंतोष वाले क्षेत्रों को संभालना और यह सुनिश्चित करना कि बड़े जिलों के पुनर्गठन से प्रशासनिक और विकासात्मक लाभ जनता तक पहुंचें, बड़ी चुनौती होगी।






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