गहलोत का पटना मंत्र: तेजस्वी के चेहरे से महागठबंधन ने बदला बिहार चुनावी समीकरण
बिहार चुनाव में सीट बंटवारे के घमासान और महागठबंधन के टूटने की आशंकाओं के बीच अशोक गहलोत के अचानक पटना पहुंचने से समीकरण पलट गए। उन्होंने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री और मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री...

बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान रोजाना कोई न कोई अप्रत्याशित सियासी घटनाक्रम सामने आ रहा है। सीट बंटवारे को लेकर मचे घमासान के बीच जब साफ होने लगा था कि एसआईआर और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा से बिहार में सत्ता विरोधी माहौल बनाने की दिशा में बढ़ रहा कांग्रेस व राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की अगुवाई वाला विपक्षी दलों का महागठबंधन चुनावी पिच पर हिट विकेट होते हुए ताश के पत्तों की तरह ढहने की कगार पर है, उसी दौरान 23 अक्टूबर को बाजी एकदम बदली हुई नजर आई।
राजनीति के जादूगर माने जाने वाले राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अचानक बीती रात पटना पहुंचे और महागठबंधन में पड़ रही गांठ को ऐसे खोला कि किसी को अब भी भरोसा नहीं हो रहा। गहलोत ने पहले लालू यादव के घर जाकर बंद कमरे में बैठक की और कहा कि सुबह तक इंतजार कीजिए। फिर आज सुबह महागठबंधन की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में राजद नेता व लालू के वारिश तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर माहौल को एकदम बदल दिया। साथ ही उन्होंने विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के नेता और बिहार के महादलित चेहरे मुकेश सहनी को उप मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर बिखराव की सारी आशंकाओं को खत्म कर दिया।
दरअसल, महागठबंधन के इस ऐलान और संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में नजर आई एकता से सियासी माहौल बदलने की सम्भावना बनी है। अब चुनाव में सीधे तौर पर तेजस्वी के रूप में एक युवा और सियासी भविष्य की आशंकाओं से घिरे 74 साल के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच सीधे मुकाबले में युवा मतदाताओं का रुख बदल सकता है। तेजस्वी की हर परिवार को नौकरी और प्रदेश में योजनाबद्ध औद्योगिक विकास के जरिए रोजगार-विकास बढ़ाने की योजनाओं को युवाओं को आकर्षित करने की रणनीति माना जा सकता है। महिलाओं के लिए भी उन्होंने जीविका दीदी योजना का ऐलान कर रखा है। ऐसे में महागठबंधन को लेकर उठ रही आशंकाओं के बीच माहौल तो बदला हुआ नजर आ ही रहा है, लेकिन अब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को कमतर आंकना भूल होगी।
वैसे महागठबंधन के इस कदम ने मोदी-शाह की जोड़ी को एक तरह से उलझन में डाल दिया है। कारण कि महागठबंधन में सारा लफड़ा ही मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर था और वह खत्म हो गया, लेकिन एनडीए के लिए इस कदम से मुश्किल हो गई लगती है। कारण कि एनडीए चुनाव तो पिछले बीस साल से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में लड़ रहा है, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से खुद केंद्रीय गृह मंत्री व भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह परोक्ष रूप से इनकार कर चुके हैं। उन्होंने पिछले दिनों एक इंटरव्यूह में कहा था कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा, यह चुनाव परिणामों के बाद तय होगा। तब से बिहार में यह सियासी अवधारणा बनी हुई है कि नीतीश कुमार शायद ही चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री बने। इससे पहले एनडीए के सीट बंटवारे में भाजपा और जनतादल यूनाइडेट (जदयू) को बराबर 101 सीट मिलने और चिराग पासवान की पार्टी को 29 सीटें मिलने से भी इस अवधारणा ने घर करना शुरू कर दिया था। अब एनडीए के सामने मुश्किल यह हो सकती है कि या तो वह मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करे या फिर नीतीश व विपक्षी दलों की आलोचना झेले।






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