कभी आंतरिक विकास और जीवन की दिशा थी शिक्षा
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य संकट को देखते हुए हमें माता-पिता की भूमिका को भी समझना होगा। कई बार माता-पिता अपने अधूरे सपनों को बच्चों पर थोप देते हैं। उन्हें ऐसी पढ़ाई और करियर में धकेलते हैं, जो उनकी...

भारत में शिक्षा: गुरुकुल से भव्यता तक
बी.एस. यादव,
– निदेशक, दिल्ली पब्लिक स्कूल, जोधपुर
Table Of Content
- भारत में शिक्षा: गुरुकुल से भव्यता तक
- जीवन का हिस्सा था गुरुकुल मॉडल
- मैकाले ने बदल डाली पूरी तस्वीर
- आंकड़ों का खेल बनी आधुनिक शिक्षा
- बच्चों पर उम्मीदों व प्रतिस्पर्धा का बोझ
- माता-पिता के अधूरे सपनों में दबा बचपन
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: एक नई उम्मीद
- बच्चे से महानता तक: शिक्षा का असली लक्ष्य
- नवाचार की ओर कदम
- आइए बदलाव की पहल करे
“शिक्षा मनुष्य में पहले से विद्यमान पूर्णता की अभिव्यक्ति है।” – स्वामी विवेकानंद
“सच्चे शिक्षण का पहला सिद्धांत यह है कि कुछ भी सिखाया नहीं जा सकता… मन को अपनी स्वयं की वृद्धि में परामर्श करना होता है।” – श्री अरविंदो
यह केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि शिक्षा की एक मौन जागृति है। एक ऐसी चेतना जो हमें याद दिलाती है कि शिक्षा कभी केवल परीक्षा की तैयारी या आंकड़ों का खेल नहीं थी, बल्कि आत्मा की खोज, आंतरिक विकास और जीवन की दिशा थी। चार दशकों से इस क्षेत्र में काम करते हुए मैंने शिक्षा की यात्रा को देखा है– उस गुरुकुल की जीवंतता से लेकर आज के डिजिटल युग की प्रतिस्पर्धा तक।
जीवन का हिस्सा था गुरुकुल मॉडल
भारत का प्राचीन गुरुकुल मॉडल केवल एक संस्थान नहीं था, वह जीवन का हिस्सा था। वहां शिक्षा पढ़ाई तक सीमित न होकर जीवन के हर पहलू में गहरी छाप छोड़ती थी। छात्र गुरु के सान्निध्य में रहते थे, जो न केवल ज्ञान के वेद, गणित, संगीत, खगोल विज्ञान, चिकित्सा जैसे विषय सिखाते, बल्कि विवेक, श्रद्धा, निस्वार्थ सेवा और चरित्र निर्माण भी करते। गुरु केवल शिक्षक नहीं, मार्गदर्शक, दार्शनिक और नैतिक प्रेरणा का स्रोत थे।
नालंदा विश्वविद्यालय, जो विश्व की प्राचीनतम शिक्षण संस्थाओं में से एक था, भारत के ज्ञान-संस्कृति की जीवंत मिसाल थी। पूरे एशिया से विद्वान यहां ज्ञान की गंगा में डूबने आते थे। इस विश्वविद्यालय में बहु-विषयक अध्ययन और वाद-विवाद की परम्परा थी, जिसने भारत को वैश्विक ज्ञान का केंद्र बनाया।
भारत की शिक्षा परम्परा में महिलाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान था। गार्गी, मैत्रेयी जैसे विदुषी दार्शनिकों ने ज्ञान के क्षेत्र में पुरुषों के साथ बराबरी से भाग लिया। यह दिखाता है कि शिक्षा यहां किसी विशेष वर्ग या लिंग का अधिकार नहीं, बल्कि सार्वभौमिक सम्पदा थी।
मैकाले ने बदल डाली पूरी तस्वीर
ब्रिटिश काल में शिक्षा ने एक भटकाव लिया। 2 फरवरी 1835 को थॉमस बबिंगटन मैकाले ने भारतीय शिक्षा के स्वरूप को पूरी तरह बदलने वाली नीति पेश की। अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी ज्ञान को प्राथमिकता दी गई, जिससे संस्कृत, फारसी और स्वदेशी ज्ञान की उपेक्षा हुई। यह केवल शिक्षा में बदलाव नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का क्षरण था। इसके परिणाम आज भी भारतीय शिक्षा प्रणाली में झलकते हैं।
स्वतंत्रता के बाद शिक्षा को राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आधार माना गया। साक्षरता बढ़ी, स्कूल और विश्वविद्यालय बढ़े। परंतु, शिक्षा का केन्द्रित उद्देश्य बदल गया। वह समग्र विकास से रोजगारोन्मुखता की ओर बढ़ गया। कक्षाएं क्षमता से अधिक भीड़भाड़ वाली हो गईं, और गुरु-शिष्य संबंध औपचारिकता बनकर रह गए। आज की शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल अंक और प्रमाण-पत्र बनकर रह गया है। गुणवत्ता की जगह मात्रात्मक विस्तार ने ले ली। बच्चे केवल परीक्षा परिणामों के आंकड़े बन गए हैं।
आंकड़ों का खेल बनी आधुनिक शिक्षा
आज की शिक्षा प्रणाली एक प्रतियोगिता का मैदान बन गई है। बोर्ड के परिणाम पदकों की तरह प्रदर्शित होते हैं, टॉपर्स की शेखी बघाई जाती है, और कोचिंग उद्योग फल-फूल रहा है। सीखने का आत्म-सात होना कहीं खो गया है। छात्रों को आश्चर्य, सवाल करने और कल्पना करने के बजाय, निर्धारित पैटर्न के उत्तर लिखने पर मजबूर किया जा रहा है। शिक्षण नहीं, परीक्षा पास करना प्राथमिकता बन गई है। छात्र परीक्षा की चिंता से ग्रस्त, सीखने की प्रक्रिया से कट गए हैं।
सीबीएसई ने दो बोर्ड परीक्षा आयोजित करने का विकल्प दिया है, जिसका उद्देश्य तनाव कम करना है। यह प्रयास सराहनीय है, लेकिन परीक्षा की अधिकता से छात्रों पर और बोझ पड़ सकता है। अधिकांश समय पढ़ाई, परीक्षा तैयारी और पुनः परीक्षा में ही व्यतीत होता है, जिससे वास्तविक सोच-विचार और समझ के लिए जगह नहीं बचती।
बच्चों पर उम्मीदों व प्रतिस्पर्धा का बोझ
आज के बच्चे केवल किताबें नहीं, बल्कि माता-पिता की उम्मीदें, समाज के दबाव, और साथियों के प्रतिद्वंद्विता का बोझ भी उठाते हैं। उनकी सहज हंसी चिंता में बदल चुकी है। उनकी स्वाभाविक जिज्ञासा दब चुकी है। कोचिंग क्लास और करियर की डोर उन्हें उस मार्ग से दूर ले जाती है, जिसे वे स्वयं चुनना चाहते हैं।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था, “सीखने के लिए सोचने और कल्पना करने की स्वतंत्रता आवश्यक है।” पर आज, अनेक बच्चे इस स्वतंत्रता से वंचित हैं। उनके लिए शिक्षा एक दबाव, दमघोंटू वातावरण बन चुकी है। जब बच्चों को विषय और करियर चुनने की स्वतंत्रता मिलती है, तभी सीखने का अनुभव खुशी और उत्साह से भर जाता है। उन्हें डर के बिना अपने सपनों और चिंताओं को व्यक्त करने की आज़ादी होनी चाहिए।
माता-पिता के अधूरे सपनों में दबा बचपन
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य संकट को देखते हुए हमें माता-पिता की भूमिका को भी समझना होगा। कई बार माता-पिता अपने अधूरे सपनों को बच्चों पर थोप देते हैं। उन्हें ऐसी पढ़ाई और करियर में धकेलते हैं, जो उनकी रुचि के विरुद्ध होते हैं। यह दबाव बच्चों की आवाज़ दबा देता है। माता-पिता को शिक्षा के सहयोगी के रूप में देखना चाहिए, न कि शासक के रूप में। उनकी समझ और सहानुभूति बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ा सकती है। जब बच्चे कहें, “मैं इतिहास पढ़ना चाहता हूं,” या “मुझे कला पसंद है,” तो उन इच्छाओं को खुले दिल से स्वीकारना चाहिए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: एक नई उम्मीद
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 शिक्षा के पुनर्जागरण का संदेश लेकर आई है। यह नीति छात्र-केंद्रित शिक्षा की ओर बढ़ती है, जहां अंकों से नहीं, बल्कि संभावनाओं से मूल्यांकन होता है। यह नीति अंतर-विषयी अध्ययन को बढ़ावा देती है, जहां ज्ञान के विभिन्न क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यह न केवल कठोर विषय विभाजन को समाप्त करती है, बल्कि कक्षा को एक ऐसा स्थान बनाती है जहां जिज्ञासा, सहयोग और रचनात्मकता फलती-फूलती है। इस नीति की सफलता शिक्षकों, समुदाय और शासन की भागीदारी पर निर्भर है।
बच्चे से महानता तक: शिक्षा का असली लक्ष्य
आज भी सवाल बना रहता है– वह बालक कहां है? वह बच्चा जो सीखने की जिज्ञासा और आत्मविश्वास से भरा था, रैंकिंग की दौड़ में खो गया है। अभिभावक अपनी महत्वाकांक्षा से बच्चों का भविष्य निर्धारित करते हैं, जबकि अंक केवल एक औजार हैं, न कि अंतिम मापदंड।
शिक्षक वह प्रकाश स्तंभ हैं जो ज्ञान के द्वार खोलते हैं। पर आज शिक्षकों की स्थिति कमजोर हुई है, उनका सम्मान घटा है। शिक्षा के मंदिर में शिक्षक की उपस्थिति के बिना केवल कागजी इमारतें हैं। हमें शिक्षकों को पुनः सम्मानित करना होगा।
नवाचार की ओर कदम
अगर मुझसे शिक्षा के बारे में अपना दृष्टिकोण साझा करने के लिए कहा जाए, तो यह जॉन डेवी और मारिया मोंटेसरी के स्थायी ज्ञान के साथ प्रतिध्वनित होगा।
“विद्यार्थियों को कुछ करने को दें, कुछ सीखने को नहीं; और ऐसा करना इस तरह का होना चाहिए कि सोचने की आवश्यकता हो। स्वाभाविक रूप से सीखने का परिणाम मिलता है।” – जॉन डेवी
बचपन की शिक्षा का लक्ष्य बच्चे की सीखने की प्राकृतिक इच्छा को सक्रिय करना होना चाहिए (मारिया मोंटेसरी)
वर्तमान समय की आवश्यकता है- गुरुकुल प्रणाली का नए रूप में पुनर्गठन। जिसमें अतीत की नक़ल न हो, बल्कि सादगी, अखंडता, खोज और परस्पर जुड़ाव के जीवन मूल्यों की अवधारणा निहित हो।
आइए बदलाव की पहल करे
आधुनिक समय में गुरुकुल प्रणाली का पुनर्गठन एक जरूरी आवश्यकता है, जिसमें सादगी, अखंडता, खोज और परस्पर जुड़ाव जैसे जीवन मूल्यों को शामिल किया जा सके। हमें केवल टॉपर्स तैयार करने के बजाय विचारकों को तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रदर्शन को मापना नहीं होना चाहिए, बल्कि छात्रों की उपस्थिति और आत्म-अन्वेषण की यात्रा को प्रोत्साहित करना चाहिए।
अंत में जे. कृष्णमूर्ति के विचारों को साझा करना चाहूंगा, ‘हमें यह समझने की आवश्यकता है कि शिक्षा केवल बाहरी ज्ञान की प्राप्ति नहीं है, बल्कि यह आंतरिक प्रकृति की समझ और आत्म-अन्वेषण की यात्रा भी है। जब हम दोनों दिशाओं में सीखने को प्रोत्साहित करते हैं। बाहर की ओर दुनिया में और भीतर की ओर स्वयं में- तो हम न केवल बच्चों को शिक्षित करते हैं, बल्कि उन्हें जागृत भी करते हैं।’
आइए हम शिक्षा को एक नए दृष्टिकोण से देखें और छात्रों को आत्म-अन्वेषण की यात्रा पर ले जाएं, जहां वे न केवल ज्ञान प्राप्त करें, बल्कि बुद्धि और समझ भी विकसित करें।






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