आज भी सोने की चिड़िया है भारत
हम बचपन से सुनते आए हैं कि भारत ‘सोने की चिड़िया’ था। पर यह समृद्धि कहां से आती थी? यह समझ लेना जरूरी है कि हमारे देश की असली आर्थिक ताकत न तो सरकारी खजाने में है, न ही बड़े-बड़े बैंकों में, बल्कि हर...

राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
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‘भारत सोने की चिड़िया था, है और रहेगा।’ यह केवल एक पुरानी उपमा नहीं है, बल्कि हमारी आंतरिक समृद्धि और सांस्कृतिक ताकत का वास्तविक अहसास है। सदियों से भारत ने अपनी भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक पहचान के दम पर विश्व में अपनी अलग छवि बनाई। लेकिन यदि गहराई में देखें, तो पाएंगे कि भारत की सबसे स्थायी ताकत कोई खदान, बैंक रिज़र्व या औद्योगिक क्षमता नहीं, बल्कि हर घर की स्त्री की सोच, समझ और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता रही है। यही वह शक्ति है जिसने भारतीय परिवारों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाए रखा और भारत को आंतरिक समृद्धि दी। यह एक ऐसी व्यवस्था है जो सदियों के अनुभव और व्यावहारिक ज्ञान पर आधारित है, जिसे आधुनिक अर्थशास्त्र अक्सर समझ नहीं पाता।
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सोने की नींव पर टिकी आंतरिक समृद्धि
ये सही है कि भारतीय इतिहास सोने और धातुओं की प्रचुरता के कारण ही समृद्ध रहा। प्राचीन काल में सोने का प्रयोग केवल आभूषण तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सामाजिक प्रतिष्ठा, व्यापारिक लेन-देन और धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा रहा। एक तरह से सोना हमारी अर्थव्यवस्था की धुरी था। विदेशी यात्री और व्यापारियों ने सदियों से भारत की समृद्धि और सोने की प्रचुरता का उल्लेख किया। चाहे वह मार्को पोलो हों या इब्न बतूता, सभी ने भारत को अतुलनीय संपदा वाला देश बताया था। लेकिन यही सोना जब घरों की तिजोरियों और महिलाओं के हाथों में सुरक्षित रहता था, तब इसकी वास्तविक शक्ति और स्थिरता सामने आती थी। यह संपत्ति का विकेंद्रीकरण था, जो किसी सत्ता या बैंक के नियंत्रण में नहीं था।
हर घर में रखे गहनों और सिक्कों ने परिवार को कठिन परिस्थितियों में भी मजबूती दी। यह केवल निवेश नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा, स्वायत्तता और भविष्य की व्यावहारिक योजना थी। यह सुरक्षा-जाल बुनता था, ताकि अकाल, युद्ध या राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान भी परिवार का जीवनयापन सुनिश्चित रहे। यही कारण है कि भारत ने सदियों तक विभिन्न आक्रमणों, अकालों और संकटों के बावजूद अपनी आंतरिक स्थिरता बनाए रखी। हमारी पारिवारिक अर्थव्यवस्था का लचीलापन इसी पारंपरिक बचत में निहित था।
लूट का दंश और अपार संपदा का आकर्षण
यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि भारत ने सदियों तक गुलामी का दंश झेला। इसकी मुख्य वजह यहां की असीम सम्पन्नता थी। मुगलों से पहले और उनके बाद तक कई समूहों ने भारत पर आक्रमण किए, जिसका प्राथमिक उद्देश्य केवल राजनीतिक वर्चस्व नहीं, बल्कि यहां के अक्षय खजाने की लूट थी। महमूद गजनवी का सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण हो या नादिर शाह द्वारा दिल्ली से तख्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) और कोहिनूर हीरा जैसी अमूल्य निधियों की लूट। ये सभी घटनाएं प्रमाणित करती हैं कि भारत धन, विशेषकर सोने, चांदी और जवाहरात के मामले में कितना अधिक समृद्ध था। अंग्रेजों ने तो एक संगठित नीति के तहत भारत के संसाधनों का व्यवस्थित शोषण किया। राजा-महाराजाओं के व्यक्तिगत खजानों से लेकर मंदिरों और व्यापारिक मार्गों तक की लूट ने देश की समृद्धि को छिन्न-भिन्न कर दिया। लेकिन यही वह बिंदु है जहां घर की आंतरिक व्यवस्था की शक्ति सामने आई। जब राजकीय खजाने खाली हुए, तब भी आम आदमी के घरों में स्त्रियों द्वारा सुरक्षित रखा गया सोना, यानी पारिवारिक पूंजी बची रही। यह पूंजी ही राष्ट्र की मूलभूत आर्थिक स्थिरता का अंतिम गढ़ बनी।
स्त्रियों की दूरदर्शिता
भारतीय परिवारों की आर्थिक संरचना में महिलाओं की भूमिका हमेशा से अनमोल और अदृश्य रही है। उन्होंने परिवार की देखभाल के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा की नींव भी रखी। पुरुषों द्वारा कमाई गई आय का एक बड़ा हिस्सा, अक्सर महिलाओं की सलाह और प्रबंधन से, बचत के रूप में सुरक्षित रखा जाता था। प्रत्येक चूड़ी, हर मंगलसूत्र, गहना या सिक्का केवल आभूषण नहीं था, बल्कि यह संकट के समय सहारा, सामाजिक सम्मान और भविष्य की सुरक्षा का प्रतीक रहा। इसे ‘स्त्री-धन’ कहा गया, जिस पर महिला का पूर्ण अधिकार होता था। यह उसे एक ऐसी आर्थिक शक्ति प्रदान करता था जो किसी भी संकट में उसके और उसके बच्चों के काम आ सके।
भारतीय समाज में यह परंपरा रही है कि बेटियों को विवाह के समय सोना दिया जाए। यह न केवल उनकी जीवन सुरक्षा का प्रतीक है, बल्कि संकट के समय उनके लिए आर्थिक सहारा और आत्म-सम्मान भी बनता है। कई परिवार अपनी सीमित आय में भी छोटी-छोटी बचत करके सोना जोड़ते हैं। कभी यह छोटी किस्तों में होता है, कभी त्योहारों के अवसर पर और कभी तिजोरियों में सुरक्षित रखा जाता है। यह व्यावहारिक समझ, बचत का अनुशासन और लंबी अवधि की योजना ही भारत की आंतरिक समृद्धि और स्थिरता की असली वजह है। यह दर्शाता है कि सोने को खरीदने का निर्णय केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि अत्यधिक तार्किक और दूरदर्शी होता है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि ये व्यवस्था आज भी भारतीय समाज में कायम है।
भरोसा, सम्मान व सुरक्षा का प्रतीक
भारत में सोने का महत्व केवल निवेश या आभूषण तक सीमित नहीं है। यह भरोसा, सम्मान और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षा का प्रतीक है। आर्थिक दृष्टि से भी सोना भारतीय घरों की वित्तीय स्थिरता का आधार रहा है। पारंपरिक दृष्टि से घर की महिलाएं इसे बचत, सुरक्षा और परिवार के संकट मोचन के रूप में देखती हैं।
यह एक ऐसा निवेश है जो समय के साथ मूल्यवान होता है और कभी पूरी तरह खोता नहीं है। इतिहास गवाह है कि जब मुद्राएं विफल हुई हैं, शेयर बाज़ार गिरे हैं, और बैंक दिवालिया हुए हैं, तब भी सोने ने अपना मूल्य बनाए रखा है। यही कारण है कि भारत के घरों में सोने की अघोषित संपत्ति बहुत बड़ी है। इसीलिए कहा जाता है कि यह दुनिया के कुछ सबसे बड़े देशों के संयुक्त सरकारी सोने के भंडार से भी अधिक हो सकती है। विभिन्न सर्वेक्षणों और आंकड़ों के अनुसार, भारतीय घरों में रखा सोना देश के केंद्रीय बैंक रिज़र्व से कई गुना अधिक है। इस संपत्ति का भले ही कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं हो, पर यह परिवार की निजी और पारंपरिक सुरक्षा का हिस्सा है, जिस पर उन्हें सबसे अधिक भरोसा है। यह घरेलू सोना वास्तव में भारत का सबसे बड़ा ‘गोपनीय’ आर्थिक बफर है।
औपचारिक अर्थव्यवस्था की चुनौती
आज के समय में भी घर की महिलाएं अपने परिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए सोने को प्राथमिकता देती हैं। यह आदत वित्तीय साक्षरता की कमी नहीं, बल्कि पिछली पीढ़ियों के कड़वे अनुभवों पर आधारित है। सरकार ने भी सोने को अर्थव्यवस्था में लाने के प्रयास किए हैं। उदाहरण के लिए, स्वर्ण मुद्रीकरण योजना और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसी योजनाओं ने घरों के सोने को बैंक और वित्तीय चैनलों में लाने का अवसर दिया है।
इन पहलों का उद्देश्य केवल सोने का औपचारिक वित्तीय उपयोग नहीं था, बल्कि आर्थिक तरलता बढ़ाना और भारत की वित्तीय स्थिरता को मजबूती देना भी था। हालांकि, इसके लिए जनता का विश्वास और परंपरा की आदतें भी महत्वपूर्ण रही हैं। यह सोना भारतीय स्त्री के लिए लक्ष्मी का स्वरूप और सामाजिक सम्मान का प्रतीक है। सरकारी योजनाओं में निवेश पर, इसे वापस अपनी मूल भौतिक अवस्था और डिज़ाइन में प्राप्त करने की अनिश्चितता बनी रहती है। जब तक सरकारें इस भावनात्मक और सांस्कृतिक कारक को नहीं समझतीं और इसे ‘सिर्फ एक कमोडिटी’ के रूप में देखना बंद नहीं करतीं, तब तक घर की तिजोरियां केंद्रीय बैंक की तिजोरियों से अधिक विश्वसनीय बनी रहेंगी। यहीं पर पारंपरिक बुद्धिमत्ता आधुनिक अर्थशास्त्र को चुनौती देती है।
वैश्विक संकटों में ताकत का प्रमाण
भारत में सोने का महत्त्व केवल घरेलू नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय है। विश्व के कुल सोने की मांग में भारत की हिस्सेदारी हमेशा महत्वपूर्ण रही है। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि जहां पश्चिमी देश वित्तीय अस्थिरता, मंदी और मुद्रास्फीति के दौरान बॉन्ड या डॉलर को सुरक्षित आश्रय मानते हैं, वहीं भारतीय परिवार सदियों से सोने को ही सबसे भरोसेमंद वैश्विक मुद्रा मानते आए हैं। 1991 के आर्थिक संकट या हालिया कोविड-19 जैसी महामारी के दौरान भी घरों में सुरक्षित इस ‘पीली धातु’ ने देश की आयात क्षमता को अप्रत्यक्ष रूप से सहारा दिया। जब भी रुपए का अवमूल्यन होता है, सोना एक स्थिर वैश्विक संपत्ति के रूप में अपनी कीमत बनाए रखता है। इसका मतलब है कि हमारा पारंपरिक निवेश केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सिद्ध, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय समझ पर आधारित है। यह हमें वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव से एक हद तक बचाता है, और हमारी संप्रभुता को अप्रत्यक्ष मजबूती प्रदान करता है।
भारत की आंतरिक शक्ति का प्रमाण
हमें ये मानना चाहिए कि भारत की समृद्धि केवल खदानों, रिज़र्व या औद्योगिक उत्पादन में नहीं है। भारत की असली समृद्धि घर की महिलाओं की सोच, समझ और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता में बसी है। उनकी यह दूरदर्शिता और संयम ही भारत को पहले भी, आज भी और भविष्य में ‘सोने की चिड़िया’ बनाए रखेगी। हर चूड़ी, हर मंगलसूत्र, हर गहना केवल आभूषण नहीं, बल्कि सुरक्षा, भविष्य की योजना और देश की अटूट आंतरिक ताकत का प्रतीक है। यही वजह है कि भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता सदियों तक बनी रही।
‘भारत सोने की चिड़िया था, है और रहेगा’
यह केवल उपमा नहीं, बल्कि हमारी आंतरिक ताकत और स्थिरता का प्रमाण है। असली समृद्धि संख्या में नहीं, बल्कि सोच और समझ में है, और यह सोच हमारी महिलाओं की विरासत है।






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