पग- पग पर पीड़ा परेशानी
लाखों श्रद्धालु पहाड़ी ट्रैक से 3584 मीटर ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ मंदिर में महादेव के दर्शन करने जाते हैं, उनके लिए कितनी असुविधाएं उस मार्ग पर मौजूद रहती है। गौरी कुंड से 16 किलोमीटर के ट्रैक पर पग-...

केदारनाथ पैदल यात्रा
मनोज वर्मा,
वरिष्ठ पत्रकार
बारह ज्योतिर्लिंगों में एक बाबा केदारनाथ में हेलीकॉप्टर हादसा होने पर हर बार चर्चा होती है कि नियमों की पालना नहीं होने से श्रद्धालु यात्रियों की जान जाती हैं। लेकिन कभी इसको लेकर चर्चा नहीं होती है कि जो लाखों श्रद्धालु पहाड़ी ट्रैक से 3584 मीटर ऊंचाई पर स्थित मंदिर में महादेव के दर्शन करने जाते हैं, उनके लिए कितनी असुविधाएं उस मार्ग पर मौजूद रहती है। गौरी कुंड से 16 किलोमीटर के ट्रैक पर पग- पग पर परेशानी का आलम है। देश के हर क्षेत्र से आने वाले श्रद्धालु यह देख हताश होते हैं। अचरज इस बात का भी है कि देश का मीडिया हमेशा इन परेशानियों को नजर अंदाज करता है। सोशल मीडिया पर इन्फ्लूर्स कभी यह नहीं बताते कि यह राह कितनी परेशानी भरी है। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर मीडिया हाउस के रिपोर्टर और इन्फ्लूर्स हैली सर्विस से ही वहां पहुंचते है और मंदिर प्रांगण की रिपोर्ट और रील हम तक पहुंचाते है। जिन्हें देख श्रद्धालु जब उस राह पर पहुंचते है तो सिर्फ आह ही निकलती है। उसे राहत तब ही मिलती है जब कठिन राह पार कर जैसे तैसे ऊपर पहुंच कर बाबा केदार के दर्शन हो जाए। गौरी कुंड से शुरू होने वाले इस ट्रैक पर न तो सड़क सही है, रात को रोशनी भी पूरी नहीं होती है। जगह- जगह पर खड्डे हैं। खाई में गिरने से बचने के लिए लगी रेलिंग टूट रही है। पैदल यात्री को खच्चर, घोड़े और पालकी वालों के साथ चलने के लिए हर आठ से दस फीट चौड़े ट्रैक पर हर 50 कदम पर सड़क पर जगह ढूंढनी पड़ती है।
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राजस्थान टुडे, जुलाई 2025
मैंने 14 जून को यह यात्रा पूरी की थी। इस दौरान साथ चलने वाले उत्तराखंड के ही रहने वाले विनोद रावत बताते हैं कि 2013 की आपदा में मूल ट्रैक खत्म हो गया था। इसके बाद नया ट्रैक बना, लेकिन इसका रखरखाव नहीं होने से यात्री परेशान होते हैं। सरकार और समिति ध्यान नहीं देती है। मंदिर के आस पास करोड़ों खर्च कर कॉरिडोर बन रहा है, लेकिन यात्रा से पहले और यात्रा के दौरान ट्रैक के खड्डे तक ठीक नहीं होते। सरकार लाइट तक सही नहीं करवाती। लखनऊ निवासी अनुपम अग्रवाल दूसरी बार यहां आए हैं। वे कहते है कि बारिश की सीजन है। खच्चर घोड़े पर रोक नहीं है। एक समय तय होना चाहिए इनके चलने का। इनके मल मूत्र की सफाई नहीं होने से राह में यात्रियों का गिरकर चोटिल होना आम बात है। इनकी इतनी ज्यादा संख्या है कि पैदल यात्री का चलना दूभर हो जाता है।
हर जगह लाइन की दिक्कत
जून में केदारनाथ जाने वालों के लिए संघर्ष की शुरुआत सोनप्रयाग पहुंचने से ही होने लगती हैं। गौरीकुंड में आगे भीड़ होने पर गाड़ियां सीतापुर पार्किंग में रखवाई जाती है। यहां से तीन से चार किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। सोनप्रयाग में रजिस्ट्रेशन चेक करवाने और फिर यहां से गौरी कुंड जाने के लिए फिर से लाइन में लगना पड़ता है। सरकार ने स्थानीय लोगों को रोजगार देने और वाहन भीड़ नियंत्रित करने के लिए स्थानीय सवारी गाड़ियों को सोनप्रयाग से गौरी कुंड ले जाने के लिए अधिकृत किया है। एक जानकारी के अनुसार इस समय 250 गाड़ी लगाने का दावा है, लेकिन अगर आप परिवार के साथ आए हैं तो भीड़ में इन गाड़ियों में जगह पाना आसान नहीं होता, जिससे घंटों लग जाते हैं। कुल मिलाकर छह किलोमीटर का यह सफर काफी दुर्गम है।
खच्चर वालों से झगड़ा आम बात
गौरी कुंड से शुरू होने वाले इस ट्रैक से पहले एक भव्य द्वार है। जिसे देख लगता है कि आगे सफर काफी आनंदित होने वाला है, लेकिन इसके आगे घोड़ा पड़ाव को पार करने में पसीने छूट जाते हैं। पूरे रास्ते में पहले पांच किलोमीटर पर एक डायवर्शन के पास ही इक्का- दुक्का पुलिस कर्मी नजर आते हैं। इसके बाद नंदी बेस कैंप तक कोई सुरक्षाकर्मी नजर नहीं आता। खच्चर वालों के साथ श्रद्धालुओं को रास्ता देने को लेकर झगड़े होते रहते हैं और कई बार तो नौबत हाथापाई तक आ जाती है, लेकिन वहां सुनने वाला कोई नहीं है। कोई चोटिल हो जाए तो स्पॉट पर चिकित्सा सुविधा नहीं है। आरोग्य मंदिर बने हैं, लेकिन उनको सूचना देने को कोई संचार व्यवस्था नहीं है, जिससे कोई घायल तक पहुंच सके।
संकरी गली से हजारों यात्रियों का निकलना चुनौती
गौरी कुंड टैक्सी स्टैंड से ट्रैक की ओर जाना आसान नहीं हैं। करीब 500 मीटर का 8 फीट चौड़े रास्ते को पार करना होता है, जिसके दोनों ओर दुकानें, गेस्ट हाउस हैं। खच्चर समान लेकर साथ में चलते हैं। इस दौरान एक जगह ऐसी आती है, जिसमें सीढ़ियां है यहां यात्री अटकते हैं तो उनकी जान अटक जाती है। बुजुर्गों की स्थिति और ज्यादा खराब होती है। रेंग- रेंग कर भीड़ चलती है। सबको इसी बात का डर रहता है कि यहां भगदड़ हो गई तो समझो जान गई। हालांकि स्थानीय लोग बताते हैं कि बाबा की कृपा से ऐसा हुआ नहीं है। यह रास्ता चौड़ा करना सरकार के लिए भी आसान नहीं है, प्रयास भी नहीं हुए।
वीआईपी कल्चर बड़ी परेशानी
ऊपर पहुंचने के बाद भी केदारनाथ मंदिर दर्शन करना आसान नहीं है। हेलीकॉप्टर के अलावा आने वाले सभी यात्रियों के लिए यहां अपने रजिस्ट्रेशन को दिखाकर टोकन लेना पड़ता है। इसके बाद घंटों लाइन में लग अपने आराध्य की झलक पा सकते हैं। इस दौरान हेलीकॉप्टर से आने वालों को हेलीपेड पर ही 2500 की रसीद कटवा कर वीआईपी दर्शन करवाए जाते हैं, ताकि वे जल्द वापस जा सके। लेकिन इसके साथ- साथ राज्य सरकार के अतिथि, पुलिस के अतिथि, पंडितों के यजमान और अन्य अघोषित वीआईपी सामान्य श्रद्धालु को अपने दर्शन की राह में रोड़े की तरह नजर आते हैं।
अब राहत की बात
मोदी सरकार ने इस वर्ष मार्च में ही सोनप्रयाग से केदारनाथ तक करीब चार हजार करोड़ रुपए की लागत से 12.9 किलोमीटर लंबा रोपवे बनाने का निर्णय किया है। रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव ने इसकी घोषणा करते हुए कहा था कि रोपवे की क्षमता 1,800 पीपीएचपीडी होगी और यह प्रतिदिन 18,000 यात्रियों को ले जाने में सक्षम होगा। इसके साथ हेमकुंड साहिब के लिए भी रोपवे बनेगा। लेकिन कब? तब तक बाबा केदार की जय बोलते हुए अव्यवस्थाओं के बीच पैदल श्रद्धालुओं को यह यात्रा पूरी करनी होगी।






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