रहस्यमय आगंतुक
दक्षिण अमेरिका में पहली बार देखे गए 3I ATLES धूमकेतू ने वैश्विक खगोल विज्ञान को चौंका दिया है। नासा, ईसरो और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसियां इसके स्रोत, संरचना और गति के रहस्य सुलझाने में जुटी हैं।...

हमारे सौर मंडल से गुजरा अन्य सौर मंडल का धूमकेतू
गणपत सिंह मांडोली,
वरिष्ठ पत्रकार
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इसी वर्ष जुलाई माह में हमारे सौर मंडल में एक अनोखी खगोलीय घटना घटित हुई, जो आज भी रहस्य बनी हुई है। जुलाई माह में दक्षिण अमेरिका के चिली स्थित एक वेधशाला में एक ऐसा धूमकेतू देखा गया, जो हमारे सूर्य के एक छोर की दिशा से आया और अत्यंत तीव्र गति से कुछ ही समय में दूसरी दिशा में निकल गया। चिली में पहली बार देखे जाने के कारण इसका नामकरण 3I ATLES या C 2025 NI किया गया।
इसके तुरंत बाद इस विलक्षण घटना की जानकारी दुनियाभर की अंतरिक्ष विज्ञान एजेंसियों को दी गई। सूचना मिलते ही अमेरिका की नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और भारत की ईसरो सहित कई संस्थानों ने इस अन्य सौर मंडल से आए धूमकेतू पर नजर रखना और इससे जुड़ी जानकारियां जुटाना शुरू किया। वर्तमान में भी विश्वभर की स्पेस साइंस एजेंसियां इस धूमकेतू पर निरंतर शोध कर रही हैं।
आखिर यह रहस्य क्यों है
हमारे सौर मंडल के अधिकांश धूमकेतू समय-समय पर दिखाई देते रहते हैं। लंबे समय तक नजर आने के कारण उनकी संरचना, उनसे निकलने वाली गैसों और विकिरण के बारे में पर्याप्त जानकारी मिल जाती है। इसके विपरीत जब कोई खगोलीय पिंड अत्यंत तेज गति से सूर्य के समीप से गुजरकर कम समय में ही सौर मंडल से बाहर निकल जाए, तो वह वैज्ञानिकों के लिए स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा और आश्चर्य का विषय बन जाता है।
इसी कारण भारत में भी ईसरो इस अन्य सौर मंडल के धूमकेतू पर लगातार नजर रखे हुए हैं। इसी क्रम में राजस्थान के माउंट आबू में गुरु शिखर स्थित पीआरएल यानी फिजिकल रिसर्च लेबोरेट्री इस अवलोकन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गई है, जहां 11 नवंबर से हर रात इस धूमकेतू पर निरंतर शोध किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि गुरु शिखर समुद्र तल से 1759 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अरावली पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी है। यहीं समीप भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान की फिजिकल रिसर्च लेबोरेट्री स्थापित है। प्रारंभ में यहां छोटे टेलीस्कोप लगाए गए थे, जबकि अब मेक इन इंडिया पहल के तहत पारस-2 सहित आधुनिक टेलीस्कोप लगाए जा चुके हैं। पारस-2 एक 1.5 मीटर का टेलीस्कोप है। इसके अतिरिक्त 2.5 मीटर क्षमता वाला एक और उन्नत टेलीस्कोप भी यहां स्थापित किया गया है।
अभी तक क्या-क्या दिखाई दिया
11 और 12 नवंबर, इसके बाद 19 नवंबर तथा दिसंबर माह की अलग-अलग तिथियों में यह 3I ATLES धूमकेतू कभी अल सुबह तो कभी रात्रि के चार से छह बजे के बीच दिखाई दिया। यह कभी लगभग 30 मिनट तो कभी उससे अधिक समय तक नजर आया। इस पर निरंतर शोध जारी है, जो फरवरी या मार्च 2026 तक चल सकता है। इसके बाद ही इसके स्वरूप और उत्पत्ति को लेकर अधिक स्पष्ट जानकारी मिल पाएगी।
फिलहाल विश्वभर में इस पर अनुसंधान जारी है, इसलिए आधिकारिक रूप से सीमित जानकारी ही साझा की जा रही है। इसका कारण यह है कि विभिन्न अंतरिक्ष एजेंसियां समन्वय के साथ इस धूमकेतू की उत्पत्ति, संभावित मूल तारा प्रणाली, गैसों, विकिरण और जल की संभावनाओं जैसे पहलुओं पर अध्ययन कर रही हैं। ऐसे में प्रारंभिक निष्कर्ष निकालना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
शहरों और गांवों की रोशनी बन रही बाधा
अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े अध्ययनों के लिए डार्क स्काई यानी अत्यंत कम प्रकाश वाला वातावरण आवश्यक होता है। सिरोही जिले के आसपास तेजी से बढ़ते शहरी और ग्रामीण विस्तार के कारण रात में होने वाला प्रकाश प्रदूषण माउंट आबू स्थित आधुनिक टेलीस्कोपों के लिए बाधा बन रहा है। ये टेलीस्कोप अत्यंत संवेदनशील होते हैं और आसपास की कृत्रिम रोशनी उनके अवलोकन को प्रभावित करती है। यदि नजदीकी क्षेत्रों में स्ट्रीट लाइट्स को शेड्स से ढक दिया जाए, तो शोध कार्य में उल्लेखनीय सहयोग मिल सकता है।
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विशेषज्ञों की राय
3I ATLES या C 2025 NI एक अन्य सौर मंडल से आया खगोलीय पिंड है, जो हमारे सूर्य के समीप से होकर अत्यंत तेज गति से बाहर निकल रहा है। यह सामान्यतः Sagittarius दिशा की ओर से आता हुआ प्रतीत होता है और निरंतर अवलोकन में है।
– शशि किरण गणेशन, प्रोफेसर, पीआरएल अहमदाबाद और माउंट आबू
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हमारे सौर मंडल के धूमकेतू सामान्यतः इतनी तेज गति से सूर्य के पास से नहीं गुजरते। जिस तेजी से यह पिंड कुछ ही समय में दृश्य से ओझल हो जाता है, उससे यह संकेत मिलता है कि यह हमारे सौर मंडल का हिस्सा नहीं है। यही कारण है कि इसे लेकर वैज्ञानिकों की उत्सुकता बढ़ी हुई है और इसका अध्ययन लगातार जारी है।
– सुनील चन्द्रा, प्रभारी और सहायक प्रोफेसर, पीआरएल, माउंट आबू






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