सुनहरा कल, डगर आसान नहीं
देश की शिक्षण व्यवस्था को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने व शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन के उद्देश्य से करीब पांच साल पहले राष्ट्रीय नीति- 2020 के प्रारूप को जारी कर दिया...

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020
– डॉ० श्यामसिंह राजपुरोहित,
सेवानिवृत्त अधिकारी, भारतीय प्रशासनिक सेवा
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देश की शिक्षण व्यवस्था को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने व शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन के उद्देश्य से करीब पांच साल पहले राष्ट्रीय नीति- 2020 के प्रारूप को जारी कर दिया गया। इससे देश का भविष्य उजला व सुनहरा जरूर नजर आने लगा है, लेकिन पुरानी शैक्षिक व्यवस्था को बदलने व नई शिक्षा नीति के पूरी तरह क्रियान्वयन के लिए होने वाली वित्तीय, तकनीकी और प्रशासनिक समस्याओं को देखते हुए ये डगर आसान नहीं लग रही। इसके लिए सरकार, प्रशासन व आमजन की सहभागीदारी सुनिश्चित करनी होगी, तभी इस राह को आसान बनाया जा सकेगा।
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यहां ये जानना जरूरी है कि प्राचीन काल से ही भारतीय ज्ञान परम्परा में शिक्षार्थी को शिक्षा की विभिन्न विधाओं में पारंगत करने की व्यवस्था विद्यमान थी, जो शताब्दियों तक बरकरार रही। इस अति समृद्ध व विपुल संस्कृति से परिपूर्ण शिक्षा पद्धति का कालांतर में अत्यधिक ह्रास प्रारंभ हो गया। पहले मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत के पुरावैभव, सभ्यता और संस्कृति के प्रतिकों के साथ-साथ भारतीय शिक्षण संस्थानों को भी तहस नहस कर दिया। रही सही कसर बाद में अंग्रेजों ने पूरी कर दी। उन्होंने भी गुरुकुल पद्धति से संचालित शैक्षणिक संस्थाओं को नेस्तनाबूद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपनी शासन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए लॉर्ड मैकाले के नेतृत्व में एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था प्रारंभ कर दी गई, जिसका उद्देश्य भारतीयों को अपने शासन की सेवा के योग्य नौकर तैयार करना था। यह व्यवस्था रोजगार उत्पन्न करने वाली न होकर अंग्रेजी मानसिकता वाले नौकरीपेशा समूह को विकसित करने का जरिया बन कर रह गई।
स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही मैकोलियन शिक्षा प्रणाली
अफसोसजनक तथ्य यह भी है कि सन 1947 में स्वतंत्रता के बाद भी कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं आया और उक्त मैकोलियन शिक्षा प्रणाली ही निरंतर जारी रही। प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की ओर लौटने की तरफ कोई प्रतिबद्धता दिखाई ही नहीं गई। स्वतंत्र भारत में शिक्षा नीतियों में कई परिवर्तन यद्यपि किए गए, तथापि भारत की मूल सांस्कृतिक चेतना और शिक्षण व्यवस्था की सर्वांगीण विकासोन्मुखी पद्धति विकसित करने की तरफ सोचा तक नहीं गया। लेकिन कहते हैं नियति समय- समय पर करवट बदलती है। नियति ने भारतीय ज्ञान परम्परा से परिवेष्टित शिक्षा पद्धति को एक सुनहरा अवसर प्रदान किया और उसके पुनरुत्थान के लिए मार्ग प्रशस्त किया। शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन के उद्देश्य से विभिन्न स्तरों पर लम्बे विचार- विमर्श के उपरांत वर्ष 2020 में नई शिक्षा नीति के रूप में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रारूप जारी किया गया।
इस प्रारूप में यह स्पष्ट किया गया था कि नई शिक्षा नीति- 2020 भारत में शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन लाने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयास है, जिसे 29 जुलाई 2020 को जारी किया गया। यह नई शिक्षा नीति इससे पूर्व में लागू 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति को बदल कर नए प्रारूप में लागू की गई थी। इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना तथा शिक्षा क्षेत्र में नैसर्गिक बदलाव लाना था।
क्या खास है नई शिक्षा नीति में
इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विभिन्न आयाम निर्धारित किए गए। इसमें पुराने (पिछले) अकादमिक ढांचे को परिवर्तित किया गया है। जहां पिछले ढांचे में 10+2 (आयुवर्ग 6-16+ 16-18) की व्यवस्था थी, वहीं नई शिक्षा नीति में यह व्यवस्था 5+3+3+4 की गई है।
5- 3 वर्ष से 8 वर्ष तक (स्कूल पूर्व शिक्षा तथा आंगनबाड़ी/बालवाटिका + कक्षा 1 एवं 2)
+3– कक्षा 3 से 5 (आयु 8 से 11)
+3– कक्षा 6 से 8 (आयु 11 से 14)
तथा
+4 कक्षा 9 से 12 (आयु 14 से 18)।
इस प्रकार नई शिक्षा नीति में अकादमिक ढांचा 5+3+3+4 का रहेगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020
बुनियादी शिक्षा (fundamental)में बदलाव –
नई शिक्षा नीति में प्रारंभिक और बुनियादी शिक्षा को एक नवीन रूप देने के लिए काफी सोच विचार किया गया। यह तय किया गया है कि 3 से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए बुनियादी स्तर पर शिक्षा में बड़ा बदलाव किया जाए और इसमें तीन वर्ष की स्कूल पूर्व शिक्षा आंगनवाड़ी के माध्यम से बच्चों के लिए आनन्ददायक और आल्हादकारी शिक्षण व्यवस्था हो। इसके उपरांत 6 से 8 वर्ष तक कक्षा एक और दो की शिक्षा व्यवस्था को शामिल किया गया है। सबसे अहम बदलाव जो इस स्तर की शिक्षा में किया जाना था, उसके लिए यह निर्धारित किया गया था कि इस बुनियादी शिक्षा अर्थात कक्षा 2 तक की शिक्षा एवं इसके आगे कक्षा तीन से पांच तक (आयु वर्ग 8-11) की शिक्षा का माध्यम अनिवार्यतः मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा ही होगी। इससे बच्चों को अपनी स्वयं की भाषा में सहज रूप से मस्तिष्क पर बिना अतिरिक्त बोझ डाले सीखने का अवसर सुलभ होगा।
माध्यमिक शिक्षा (Middle) –
नई शिक्षा नीति 2020 में माध्यमिक शिक्षा में सुझाए गए बदलाव –
(A) आधारभूत संरचना में बदलाव- माध्यमिक शिक्षा को कक्षा 9 से 12 तक के 4 वर्गों में बांटा गया, जिसमें 5 + 3 + 3 + 4 संरचना का हिस्सा बनाया गया है। इसमें 14 से 18 वर्ष की आयु के बच्चों को शामिल किया गया है।
(B) परीक्षा प्रणाली में बदलाव – परीक्षा को हर शैक्षणिक वर्ष में आयोजित न करते हुए स्कूली छात्र केवल तीन परीक्षाएं 2, 5 और 8 में ही भाग लेंगे। कक्षा 10 और 12 के लिए पहले की तरह ही बोर्ड परीक्षाएं जारी रहेगी, लेकिन इनको फिर से डिजाइन किया जाएगा।
(C) मूल्यांकन प्रणाली – परीक्षा में मूल्यांकन केवल परख द्वारा ही किए जाएंगे। इसके अंतर्गत समग्र विकास के लिए प्रदर्शन मूल्यांकन समीक्षा और अर्जित ज्ञान के विश्लेषण की पद्धति अपनाई जाएगी।
(D) कौशल विकास – कक्षा 6 से ही छात्रों को कोडिंग तथा उसी के समान अन्य स्किल भी सिखाई जाएगी। इससे छात्र अपने स्तर पर ही रोजगार परक शिक्षा की ओर अग्रसर होंगे।
उच्च शिक्षा – बुनियादी व माध्यमिक शिक्षा की तरह ही उच्च शिक्षा को लेकर भी कई महत्वपूर्ण और सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं। उच्च शिक्षा को लेकर नई शिक्षा नीति में बनाए गए नियम कुछ इस प्रकार हैं-
(A) बहु प्रवेश और बहु निर्गम – नए नियमों के अनुसार अब छात्रों को अपनी पढ़ाई के दौरान कई बार प्रवेश और निकास का विकल्प मिलेगा। यदि कोई छात्र एक साल बाद कोर्स छोड़ता है तो उसको सर्टिफिकेट, यदि कोई छात्र 2 साल बाद कोर्स छोड़ता है तो उसको डिप्लोमा और 4 साल बाद कोर्स पूर्ण करता है तो उसे डिग्री दी जाएगी।
(B) शिक्षण संस्थाओं का एकीकरण – सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को एकल नियामक एवं नियंत्रक प्राधिकरण के अंतर्गत लाया जाएगा। निजी और सार्वजनिक दोनों संस्थानों की फीस को नियंत्रित किया जाकर सम्यक रूप से शुल्क सरंचना तय की जाएगी। समान कक्षाओं के लिए समान पाठ्यक्रम का निर्धारण होगा और कहीं से भी प्रथम वर्ष उत्तीर्ण छात्र कहीं से भी द्वितीय वर्ष का अध्ययन कर सकेगा।
(C) भारतीय उच्च शिक्षा आयोग – उच्च शिक्षा को छात्रों के लिए नियमित और नियंत्रित करने के लिए भारतीय उच्च शिक्षा आयोग की स्थापना की जाएगी। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में व्यवसायिकता और कौशल आधारित शिक्षा को सर्वाधिक महत्व दिया जाएगा। इसके तहत छात्रों को इंटर्नशिप और इंडस्ट्रीज से जुड़े प्रोजेक्ट करने के लिए अवसर उपलब्ध होंगे।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य बच्चों का शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास करना है। समानता और समावेशिता के तहत सभी छात्रों को समान अवसर प्रदान करना, विशेष रूप से वंचित और आश्रय पर निर्भर रहने वाले समूह के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था करना प्राथमिक उद्देश्य है। इस नीति की प्राथमिकता शिक्षा को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाना है। इसके लिए मातृभाषा में शिक्षा को प्राथमिकता देना भी सम्मिलित है। विशेषकर कक्षा पांच तक की शिक्षा का सार्वभौमीकरण करते हुए वर्ष 2030 तक स्कूली शिक्षा में सौ फीसदी सकल नामांकन अनुपात सुनिश्चित करना है।
शिक्षा में नवाचार
शिक्षा में नवीनतम तकनीकी और नव आविष्कृत पद्धतियों का समावेश कर उसकी वहनीयता बढ़ाते हुए शिक्षा को सभी के लिए सुग्राह्य और सुलभ बनाना तथा शिक्षकों और छात्रों सभी के लिए पारदर्शिता लाना भी राष्टीय शिक्षा नीति का ध्येय है। प्रत्येक स्तर पर सभी के लिए उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना भी प्राथमिकता है। यही नहीं राष्ट्रीय शिक्षा नीति में तकनीकी शिक्षा को भी बहुत बड़ी प्राथमिकता दी गई है और इसके उद्देश्यों में छात्रों को भविष्य की तकनीकी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करना और उनको आधुनिक तकनीक से लैस रखना भी है।
तकनीकी शिक्षा को लेकर नई शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्य –
(A) डिजिटल शिक्षा का विस्तार – छात्रों को ऑनलाइन और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अधिक अवसर मिलेंगे। ई लर्निंग प्लेटफॉर्म से डिजिटल संसाधनों का उपयोग बढ़ाया जाएगा।
(B) तकनीकी कौशल विकास – छात्रों को विभिन्न तकनीकी कौशल जैसे कोडिंग, एआई, रोबोटिक्स और डाटा साइंस में विशेष रूप से प्रशिक्षित कर उनको तकनीकी रूप से सक्षम बनाना है।
(C) नवाचार और शोध – शोध और नवाचार के लिए आवश्यक संसाधन और सुविधाएं प्रदान की जाएगी। राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन की स्थापना की जाएगी, जो उच्च गुणवत्ता वाले शोध को बढ़ावा देगा।
(D) शिक्षकों का विकास – शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण और समर्थन प्रदान करना है, ताकि वे उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा दे सकें।
शिक्षकों के विकास के लिए नई शिक्षा नीति के प्रमुख उद्देश्य –
1. शैक्षणिक योग्यता- 2030 तक शिक्षक बनने के लिए 4 वर्षीय बीएड न्यूनतम आवश्यकता होगी
2. शोध और नवाचार- शिक्षकों को शोध और नवाचार के लिए पृथक से प्रोत्साहित किया जाएगा।
3. तकनीकी साक्षरता- शिक्षकों को डिजिटल शिक्षा और तकनीकी साधनों का उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि वे छात्रों को प्रभावी ढंग से पढ़ा सकें।
4. प्रोत्साहन और पुरस्कार – उत्कृष्ट शिक्षक को प्रोत्साहन और पुरस्कार दिए जाएंगे।
चुनौतियां भी कम नहीं
नई शिक्षा नीति को लागू करने की राह में कई समस्याएं और चुनौतियां भी हैं।
– बुनियादी ढांचे की कमी – कई स्कूलों में अभी भी पर्याप्त पुस्तकें प्रयोगशालाएं और शिक्षक ही उपलब्ध नहीं है।
– पाठ्यक्रम – पुराने पाठ्यक्रम को नए पाठ्यक्रम से बदलने में बहुत अधिक समय लगने की संभावना है।
– राज्यों की सहमति – इस नीति को लागू करने में बहुत से राज्य न केवल उहापोह की स्थिति में हैं, बल्कि कतिपय राज्यों ने तो इस बाबत नकारात्मक मंतव्य भी स्पष्ट कर दिया है। हाल ही में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का इस बाबत दिया गया बयान इसी तथ्य की पुष्टि करता है।
शिक्षकों की कमी
नई शिक्षा नीति की सबसे प्रमुख समस्या यह है कि यहां शिक्षकों की संख्या बहुत ही कम है। कई विद्यालयों में शिक्षकों के पद रिक्त है और कई विद्यालय में तो न्यूनतम आवश्यक शिक्षक ही नहीं है। नीति में कई सुधार और नई शिक्षण विधियां अपनाने के लिए पर्याप्त और योग्य शिक्षकों की आवश्यकता होगी, लेकिन शिक्षकों की कमी बहुत बड़ी समस्या है। नई विधियों और नई तकनीक को समझने के लिए शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता रहेगी, जो सभी शिक्षकों के लिए वर्तमान में उपलब्ध ही नहीं है। ग्रामीण और दूर दराज के क्षेत्रों में तो हालात और भी अधिक चुनौतीपूर्ण होंगे।
वित्तीय बाधाएं
नई शिक्षा नीति को समग्र रूप से लागू करने की दृष्टि से अच्छी गुणवत्ता वाले नए स्कूल व कॉलेज खोलने के लिए अतिरिक्त वित्तीय प्रावधानों की आवश्यकता रहेगी। कमजोर वित्तीय संसाधनों के चलते शिक्षकों को प्रशिक्षित करना भी मुश्किल और दुरूह कार्य है। हर स्कूल में पुस्तकालय और प्रयोगशालाएं सुसज्जित करने के साथ ही वहां कंप्यूटर, इंटरनेट और उसके लिए आवश्यक अन्य डिजिटल सुविधा लागू करने के लिए भी बहुत सा धन चाहिए।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि नई शिक्षा नीति लागू तो कर दी गई है, लेकिन धरातल के स्तर पर अभी कोई विशेष प्रभाव नजर नहीं आ रहा है। हालांकि भारत भर के विभिन्न प्रान्तों के बड़ी संख्या में विश्विद्यालय इस ओर जिस प्रतिबद्धता के साथ अग्रसर हुए हैं और जिस तरह से राजकीय और निजी शिक्षण संस्थानों ने आगे बढ़कर रुचि दिखाई है, उसे देखते हुए कोई संदेह नहीं रहता कि विभिन्न प्रतिकूलताओं और चुनौतियों के बावजूद राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की दिशा में यात्रा गाजे बाजे के साथ प्रारम्भ हो ही चुकी है। विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए कतिपय विलंब से ही सही, लेकिन अंततोगत्वा यह अपनी मंजिल पर पहुंच कर ही रहेगी।
इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने देश भर में विभिन्न विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थानों के साथ सैकड़ों कार्यशालाएं और सेमिनार आयोजित किए हैं। शासन और शिक्षण संस्थानों के बीच प्रभावी सामंजस्य और तारतम्य बिठाने का कार्य किया है और इस तरह नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन का महत्वपूर्ण कार्य शासन के सहयोग से अपने हाथ में लेकर इसे एक सुखद परिणाम तक पहुंचाने के लिए दृढ़ संकल्पित भी है।






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