कांग्रेस के कर्णधारों पर संकट!
बीते 11 सालों में कांग्रेस ने राजनीतिक रूप से लगभग हर चुनाव में मात खाई तो पार्टी के शीर्ष नेताओं ने भी लगातार जनाधार खोया। हाल ये हो गए कि कई नेता भ्रष्टाचार के आरोपों में फंस गए तो कई नेताओं के जेल...

नेशनल हेराल्ड केस : क्या होगा सोनिया-राहुल का भविष्य?
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- नेशनल हेराल्ड केस : क्या होगा सोनिया-राहुल का भविष्य?
- व्यक्तिवादी सियासी सोच
- बाहर आया बोतल में बंद जिन्न
- मजबूरी या खीज
- ऐसे फंसे सोनिया-राहुल
- समन के बाद ईडी का संज्ञान
- नियमित जमानत पर हैं बाहर
- जानें मामला आखिर है क्या
- जंगे आजादी की बने थे आवाज
- कांग्रेस ने नियम विरुद्ध दिया कर्जा
- अस्सी फीसदी शेयर होल्डर्स भी गायब
- बेशकीमती संपत्तियों पर थी नजर : स्वामी
- राजस्थान में भी कसा शिकंजा
- क्या जोशी ने घोटाले को अकेले अंजाम दिया?
- गहलोत और जोशी की घनिष्ठता जगजाहिर
- जोशी के खिलाफ ईडी के पास पर्याप्त सबूत
देश की सत्ता पर सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाली कांग्रेस के दुर्दिन खत्म नहीं हो रहे हैं। बीते 11 सालों में कांग्रेस ने राजनीतिक रूप से लगभग हर चुनाव में मात खाई तो पार्टी के शीर्ष नेताओं ने भी लगातार जनाधार खोया। हाल ये हो गए कि कई नेता भ्रष्टाचार के आरोपों में फंस गए तो कई नेताओं के जेल जाने की नौबत आ गई। अनगिनत जांचों और कई कोर्ट केसों में फंसे कांग्रेस नेताओं की मुश्किलें साल-दर-साल बढ़ती ही गईं। इसका असर ये हुआ कि कांग्रेस पर देश की जनता का भरोसा घटता गया और चुनौतियां बढ़ती गईं।
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इसमें भी नेशनल हेराल्ड केस ने तो पार्टी के कर्ता-धर्ताओं को ही बुरी तरह से फंसा दिया। कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी और उनके बेटे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इस केस में बीते 13 सालों से बुरी तरह फंसे हुए हैं। इस केस में यदि आरोप साबित हो जाते हैं तो न केवल कांग्रेस की समस्याएं बढ़ेंगी, बल्कि गांधी परिवार की मुसीबतें भी बढ़ जाएंगी। इन हालात में पार्टी का क्या होगा? इसकी कल्पना की जा सकती है, क्योंकि कांग्रेस की पूरी धुरी सोनिया और राहुल के आस-पास घूमती हैं। कांग्रेस संकट में घिर जाएगी और पार्टी की बची-कुची ताकत भी कमजोर पड़ जाएगी। इतना ही नहीं, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के कांग्रेस मुक्त भारत अभियान को बैठे-बिठाए संजीवनी मिल जाएगी।
व्यक्तिवादी सियासी सोच
मौजूदा दौर में देखें तो राजनीतिक दलों की सोच, विचारधारा और काम करने की शैली व्यक्तिवादी ज्यादा हो गई है। देश के अधिकांश दल कार्यकर्ताओं पर कम और पार्टी के नेताओं पर ज्यादा टिके हैं। कांग्रेस पूरी तरह से सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी पर टिकी हैं तो समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल यादव परिवारों पर। बसपा भी मायावती तक सीमित रह गई तो तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी तक। हाल ही दिल्ली में सत्ता से दूर हुई आम आदमी पार्टी भी अरविंद केजरीवाल की हार के बाद बिखर गईं। बाकी क्षेत्रीय पार्टियां भी केवल उसके शीर्ष नेताओं के भरोसे चलती हैं। हर पार्टी केवल अपने नेताओं को बचाने में लगी है, पार्टी को नहीं।
बाहर आया बोतल में बंद जिन्न
नेशनल हेराल्ड मामले की सुनवाई फिर से अदालत में शुरू हो गई है। विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने प्रवर्तन निदेशालय की याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं। पिछले दिनों प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से विशेष लोक अभियोजक नवीन कुमार मट्टा ने राउज एवेन्यू की विशेष अदालत में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) की धारा-तीन (मनी लॉन्ड्रिंग) और धारा-चार (मनी लॉन्ड्रिंग के लिए सजा) के तहत आरोप पत्र दायर किया गया। चार्जशीट में सोनिया और राहुल गांधी के साथ यंग इंडियन कंपनी के निदेशकों सैम पित्रोदा और सुमन दुबे समेत अन्य के नाम हैं। साल 2012 में भाजपा नेता और अधिवक्ता सुब्रमण्यम स्वामी ने इस मामले को उठाया तो कांग्रेस ने रत्तीभर भी नहीं सोचा होगा कि बोतल में बंद ये जिन्न उनका पीछा नहीं छोड़ेगा।
मजबूरी या खीज
ईडी की चार्जशीट के बाद कांग्रेस ने केन्द्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पार्टी इसे भाजपा की चाल बता रही है। पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर नीचे तक के नेता बोल रहे हैं कि जान-बूझकर उनके नेताओं की छवि खराब की जा रही है। विरोध के दौरान कांग्रेस ने धरना-प्रदर्शन भी किए, जबकि यह स्पष्ट है कि प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई मामले में वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए है।
ऐसे फंसे सोनिया-राहुल
साल 2010 में बनी यंग इंडियन कंपनी का कुल 76 फीसदी शेयर सोनिया और राहुल गांधी (38-38 फीसदी) के पास और बाकी 24 फीसदी शेयर मोतीलाल वोरा और आस्कर फर्नांडीस के पास था। वोरा और फर्नांडीस दोनों का निधन हो चुका है। कांग्रेस ने अपना 90 करोड़ का ऋण नई कंपनी यंग इंडियन को ट्रांसफर कर दिया। ऋण चुकाने में पूरी तरह असमर्थ द एसोसिएट जर्नल (एजेएल) ने सारा शेयर यंग इंडियन को ट्रांसफर कर दिया। इसके बदले में यंग इंडियन ने महज 50 लाख रुपए द एसोसिएट जर्नल को दिए। इस सौदेबाजी की जानकारी सामने आने के बाद भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने एक याचिका दायर कर आरोप लगाया कि यंग इंडियन प्राइवेट ने केवल 50 लाख रुपए में 90 करोड़ वसूलने का उपाय निकाला, जो नियमों के खिलाफ है।
समन के बाद ईडी का संज्ञान
वर्ष 2012 के नवंबर माह में सुब्रमण्यम स्वामी ने केस दर्ज कराया। याचिका में उन्होंने बताया कि यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड ने महज 50 लाख रुपए में 90 करोड़ रुपए वसूलने का जो उपाय निकाला, वह नियमों के खिलाफ है। केस दर्ज होने के दो साल बाद जून 2014 में अदालत ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी को समन जारी किए। इसके बाद अगस्त-2014 में ही प्रवर्तन निदेशालय ने संज्ञान लेकर मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया।
नियमित जमानत पर हैं बाहर
केस दर्ज होने के बाद एक साल बाद 19 दिसंबर 2015 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत अन्य आरोपियों को दिल्ली की पटियाला कोर्ट ने नियमित जमानत मिल गई। वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेताओं के खिलाफ कार्रवाई रद्द करने से इनकार कर दिया। ये कांग्रेस के लिए बड़ा झटका था तो राहत की बात ये रही कि कोर्ट ने सभी आरोपियों को व्यक्तिगत पेशी से छूट दे दी। इस फैसले के दो साल बाद 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने सोनिया और राहुल की आयकर विभाग के नोटिस के खिलाफ दायर याचिका को भी खारिज कर दिया।
जानें मामला आखिर है क्या
वर्ष 1938 में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नेशनल हेराल्ड की स्थापना की। अखबार का मालिकाना हक एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) के पास था। नेशनल हेराल्ड अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाला समाचार पत्र था। यह दो और अखबार भी छापती थी। हिंदी में नवजीवन और उर्दू में कौमी आवाज। 1956 में एजेएल को गैर व्यावसायिक कंपनी के तौर पर स्थापित किया गया और कंपनी एक्ट धारा-25 से कर मुक्त कर दिया गया। कंपनी धीरे-धीरे घाटे में चली गई। कंपनी पर 90 करोड़ का कर्ज चढ़ गया। वर्ष 2008 में वित्तीय संकट के बाद इसे बंद करना पड़ा, जहां से इस विवाद की शुरुआत हुई।
जंगे आजादी की बने थे आवाज
एजेएल के तीनों अखबार देश की आजादी में महत्वपूर्ण कड़ी बनने वाले माध्यम बने थे। स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं के साथ जुड़े होने के कारण इसकी पहचान राष्ट्रवादी समाचार पत्रों में होने लगी। उस समय इसमें प्रकाशित होने वाले लेख इतने प्रभावशाली साबित हुए कि अंग्रेज तक भयभीत हो गए। वर्ष 1942 में इसके प्रकाशन पर रोक लगा दी गई। तीन साल बाद फिर इसका प्रकाशन शुरू हुआ और आजादी के बाद भी प्रमुख समाचार पत्रों के तौर पर छपता रहा। बाद में यह कांग्रेस पार्टी का मुखपत्र बनकर रह गया। वर्ष 2008 में इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया।
कांग्रेस ने नियम विरुद्ध दिया कर्जा
आर्थिक तंगी के कारण एजेएल को कांग्रेस पार्टी ने समय-समय पर 90 करोड़ रुपए उधार दे दिए, जबकि यह द रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल एक्ट- 1950 का उल्लंघन है। इसके मुताबिक कोई राजनीतिक पार्टी किसी को कर्ज नहीं दे सकती। 23 नंवबर 2010 को गांधी परिवार की नॉन-प्रॉफिट कंपनी यंग इंडियन सामने आई, जिसके निदेशक सुमन दुबे और सैम पित्रोदा बने। 13 दिसंबर 2010 को राहुल गांधी को भी निदेशक बोर्ड में शामिल किया गया। इसके बाद एजेएल के शेयर बकायदा सौदा करके यंग इंडियन को ट्रांसफर कर दिए गए। 90 करोड़ का कर्ज केवल 50 लाख रुपए लेकर माफ कर दिया गया। इसके बाद 22 जनवरी 2011 को सोनिया गांधी कंपनी की निदेशक बन गईं। जेएल की बात करें तो भारत में इसकी हजारों करोड़ रुपए की संपत्ति है।
अस्सी फीसदी शेयर होल्डर्स भी गायब
एजेएल कंपनी को शुरू करने वाले शेयर धारकों की संख्या लगभग पांच हजार थी। वर्ष 2010 तक 1057 शेयरधारक ही रह गए। इनमें पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांति भूषण के पिता और इलाहाबाद-मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस मार्कंडेय काटजू शामिल थे। उन्होंने दावा भी किया था कि उनके पिता ने एजेएल की स्थापना पर 300 शेयर खरीदे थे। भूषण ने भी एजेएल का स्वामित्व यंग इंडियन को दिए जाने को गैरकानूनी बताया था।
बेशकीमती संपत्तियों पर थी नजर : स्वामी
साल 2012 में मामले की कलई खुली तो भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कोर्ट में केस करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि ये डील गैर कानूनी तरीके से की गई। देश के सात सात शहरों की प्राइम लोकेशन पर मौजूद एजेएल की जमीनों की कीमत ही 2 हजार करोड़ रुपए से अधिक है। स्वामी ने आरोप लगाए कि यंग इंडिया ने एजेएल खरीदने के दौरान इसकी जानकारी शेयर धारकों को नहीं दी। न ही समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू किया। इससे जाहिर था कि कंपनी की नजर एजेएल की बेशकीमती संपत्तियों पर थीं। उनके इसी मुकदमे के बाद नेशनल हेराल्ड केस देश के सामने आया।
राजस्थान में भी कसा शिकंजा
राजस्थान की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में जलदाय मंत्री रहे महेश जोशी को गत 24 अप्रैल को ईडी ने जलजीवन मिशन घोटाले के आरोप में गिरफ्तार किया। ईडी और अन्य जांच एजेंसियों के अधिकारी करीब 900 करोड़ रुपए के घोटाले में जोशी से पूछताछ करेंगे। राजस्थान में भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बने सवा साल हो गया, लेकिन यह पहला अवसर है जब भ्रष्टाचार के मामले में किसी बड़े नेता की गिरफ्तारी हुई। गत विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बार-बार कहा था कि उनकी सरकार बनने पर पेपर लीक और भ्रष्टाचार करने वाले बड़े मगरमच्छों को पकड़ेंगे, लेकिन सरकार बनने के बाद से प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा इन्हें पकड़ने के लिए सरकार को ललकारते रहे। डोटासरा ने तो यहां तक कहा था कि मगरमच्छों को पकड़ने के वादा करने वाली भाजपा से चूहे तक नहीं पकड़े जा रहे।
क्या जोशी ने घोटाले को अकेले अंजाम दिया?
जोशी की गिरफ्तारी के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। इनमें बड़ा सवाल यह है कि क्या जल जीवन मिशन घोटाले को जलदाय मंत्री महेश जोशी ने अकेले अंजाम दिया? माना कि करोड़ों रुपए के टेंडरों को स्वीकृत करवाने में जोशी की भूमिका थी? पर, इतने बड़े भ्रष्टाचार की भनक तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को क्यों नहीं लगी? सब जानते हैं कि गहलोत के मुख्यमंत्री रहते हुए सरकार में जोशी का जबरदस्त दबदबा था। अशोक गहलोत तीन बार कोरोना से संक्रमित हुए और एक बार एंजियोप्लास्टी करवाई, तब उनका काम जोशी ने किया था। इतना ही नहीं, गहलोत सरकार को बचाने के लिए पुलिस में जो एफआईआर दर्ज करवाई, वह भी महेश जोशी के नाम से हुई। महेश जोशी के पुत्र रोहित जोशी जब बलात्कार के केस में फंसे तो उसे बचाने के लिए सीएम गहलोत और उनकी सरकार पूरी ताकत लगा दी।
गहलोत और जोशी की घनिष्ठता जगजाहिर
प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेश जोशी की घनिष्ठता जगजाहिर है। कांग्रेस सरकार में भी दोनों के गठजोड़ से सब वाकिफ थे। इसी तरह से प्रशासनिक कार्यप्रणाली से जुड़े विशेषज्ञों की मानें तो सभी विभागों की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की होती है। ऐसे में किसी विभाग में भ्रष्टाचार होने पर वे भी जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में जोशी के गिरफ्त में आने के बाद क्या भ्रष्टाचार की आंच गहलोत तक पहुंचेगी, इस पर सबकी नजरें रहेंगी।
जोशी के खिलाफ ईडी के पास पर्याप्त सबूत
ईडी के पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि जेजेएम के भ्रष्टाचार का पैसा महेश जोशी के मित्रों और रिश्तेदारों के खातों में आया। इससे जोशी के लिए बेनामी संपत्तियां तक खरीदी गईं। यह भी देखना होगा कि जोशी तत्कालीन मुख्यमंत्री गहलोत से जुड़े सवालों का क्या जवाब देते हैं? यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ईडी ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, पूर्व मंत्री प्रतापसिंह खाचरियावास सहित कई नेताओं के यहां भी छापामार कार्यवाही की थी। ऐसे में क्या इन पर भी आने वाले दिनों में फिर से कोई कार्रवाई होगी, ये सवाल भी बने रहेंगे।






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