‘परीक्षा के प्रति डर नहीं, गंभीरता जरूरी’
“नीतियां खराब नहीं होतीं, उनका क्रियान्वयन कमजोर होता है।” उन्होंने शिक्षा व्यवस्था की जमीनी सच्चाई, नीतिगत कमियों और भविष्य की दिशा पर बड़े व्यावहारिक व दूरदर्शी विचार रखे...

साक्षात्कार
भारत की शिक्षा प्रणाली सदैव अपनी गहराई और परंपरा के लिए जानी जाती रही है। लेकिन समय की तेज़ दौड़ में जब आंकड़े, रैंकिंग और नीतिगत रिपोर्टें शिक्षा की असल भावना को ढंकने लगी हैं, तब शिक्षा-जगत की अनुभवी आवाज़ें और भी मूल्यवान हो जाती हैं। राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (SIERT) के पूर्व निदेशक व माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पूर्व सचिव शरतचंद्र पुरोहित उन चुनिंदा शिक्षा-प्रशासकों में हैं, जिन्होंने न केवल नीतियों को समझा बल्कि उन्हें ज़मीनी हकीकत देने का प्रयास भी किया। वरिष्ठ पत्रकार मधुलिका सिंह के साथ विशेष बातचीत में अपने प्रशासनिक अनुभव और गहन अवलोकन के आधार पर वे स्पष्ट रूप से कहते हैं, “नीतियां खराब नहीं होतीं, उनका क्रियान्वयन कमजोर होता है।” उन्होंने शिक्षा व्यवस्था की जमीनी सच्चाई, नीतिगत कमियों और भविष्य की दिशा पर बड़े व्यावहारिक व दूरदर्शी विचार रखे हैं। पढ़िए यह महत्वपूर्ण बातचीत-
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सवाल- वर्तमान स्कूली शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी संरचनात्मक कमी क्या है, जिस पर तुरंत ध्यान देना आवश्यक है?
शरतचंद्र- भारत की शिक्षा प्रणाली की संरचना हमेशा से मजबूत रही है, लेकिन इसे मजबूत बनाए रखने की जिम्मेदारी जिन पर है, वे उसे कितने समय तक और कितनी दूरदृष्टि से संभालते हैं, यही असली प्रश्न है। अभी जो सबसे बड़ी कमी दिख रही है वह है नई भर्तियों की कमी। वर्षों से शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं, जिससे पूरी शैक्षणिक संरचना प्रभावित हो रही है।
यह समस्या केंद्रीकरण के कारण और बढ़ी है। स्थानीय अधिकारियों से नियुक्ति अधिकार छिन जाने के बाद प्रक्रिया धीमी और जटिल हो गई है। इसलिए भर्ती प्रक्रिया में तत्काल सुधार और विकेन्द्रीकरण आवश्यक है।
सवाल- क्या हम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के बजाय केवल साक्षरता दर और संख्यात्मक परिणामों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं?
शरतचंद्र- हम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सामग्री तैयार कर रहे हैं- किताबें, पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण सब सुधरे हैं। लेकिन असली चुनौती है इन सबका बच्चों तक प्रभावी रूप से पहुंचना। शिक्षा का लक्ष्य केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि कौशलपूर्ण और जीवन-उपयोगी ज्ञान देना होना चाहिए। जब तक शिक्षा नीति प्राथमिकता नहीं बनेगी, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है।
सवाल- सरकारी और निजी स्कूलों के बीच की गुणवत्ता के अंतर के पीछे मुख्य नीतिगत कारण क्या हैं?
शरतचंद्र- सरकारी और निजी स्कूलों में वास्तविक अंतर ढांचे और मॉनिटरिंग प्रणाली का है। ग्रामीण क्षेत्रों के कई स्कूल अब भी जर्जर हैं, बजट सही जगह इस्तेमाल नहीं हो रहा और सबसे बड़ी समस्या है शिक्षकों की भारी कमी। निजी स्कूलों में मॉनिटरिंग कड़ी है और पद खाली नहीं रहते, जबकि सरकारी स्कूलों में भर्ती ही नहीं होती। यह प्रशासनिक निष्क्रियता ही सरकारी स्कूलों के प्रति धारणा को कमजोर करती है।
सवाल- करियर की दौड़ में मूल्य-आधारित शिक्षा को प्रभावी ढंग से पाठ्यक्रम में कैसे समाहित किया जा सकता है?
शरतचंद्र- आज भी शिक्षा ज्ञान आधारित है, जबकि जरूरत है मूल्य आधारित शिक्षा की। जो बात स्कूल में सिखाई जाती है, वही समाज और घर में दिखनी चाहिए, तभी उसका असर होगा। यदि घर में लड़का-लड़की में भेदभाव है, तो स्कूल में दी गई समानता की शिक्षा अर्थहीन हो जाती है। इसलिए मूल्य शिक्षा केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि व्यवहार और संस्कृति में उतारना जरूरी है।
सवाल- माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के सचिव के रूप में आप रटने की प्रवृत्ति और परीक्षा तनाव को कम करने के लिए कौन से दो ठोस परीक्षा सुधार सुझाएंगे?
शरतचंद्र- मेरे अनुसार, थोड़ा परीक्षा तनाव जरूरी है। जैसे वाद्ययंत्र के तार हल्के खिंचने पर ही सही सुर निकलते हैं। परीक्षा के प्रति गंभीरता बनी रहनी चाहिए, लेकिन डर नहीं। अगर शिक्षक अच्छा पढ़ाएं और विद्यार्थी समझें, तो न रटने की जरूरत रहेगी, न तनाव की।
सवाल- SIERT निदेशक के तौर पर, शिक्षकों के प्रशिक्षण मॉड्यूल में कौन से मूलभूत बदलाव जरूरी हैं?
शरतचंद्र- शिक्षा जनमत से बननी चाहिए, केवल कक्षाओं से नहीं। जब मैं SIERT का निदेशक था, तब हमने कई परिवर्तन के प्रयास किए। हमने कम्युनिटी ओपिनियन बेस्ड करिकुलम की अवधारणा विकसित की, जिसमें हर तबके के लोगों को जोड़ा गया। हमने अलग-अलग क्षेत्रों के प्रधानों, कृषकों, व्यापारियों और शिक्षकों से राय लेकर जन-सम्मत शिक्षा कार्यक्रम तैयार किया। इसी आधार पर 2000 की शिक्षा नीति बनी, जो 20 वर्षों तक सफल रही। शिक्षा तभी प्रासंगिक बनती है जब उसमें जनमत और अनुभव का समावेश हो।
सवाल- अच्छी शिक्षा नीतियां ज़मीन पर क्यों विफल हो जाती हैं?
शरतचंद्र- कोई भी नीति खराब नहीं होती। 1986 की नीति से लेकर अब तक की हर नीति उत्कृष्ट रही है- समस्या केवल जमीनी क्रियान्वयन की है। यदि नीति का अनुपालन ग्रामीण स्तर तक सुनिश्चित हो जाए, तो शिक्षा व्यवस्था स्वयं सुधर जाएगी।
सवाल- क्या शिक्षा में प्रौद्योगिकी (Ed-Tech) ग्रामीण-शहरी खाई को बढ़ा रही है या घटा रही है?
शरतचंद्र- तकनीक भावना रहित है, इसलिए निष्पक्ष है। मेरा तो स्पष्ट मत है कि Ed-Tech ग्रामीण-शहरी खाई नहीं बढ़ा रही, बल्कि ज्ञान के प्रसार का माध्यम बन रही है। इसका उद्देश्य ज्ञान देना है, प्रतिस्पर्धा बढ़ाना नहीं।
सवाल- भविष्य की स्कूली शिक्षा कैसी होनी चाहिए जो छात्रों को केवल सूचना नहीं बल्कि 21वीं सदी के कौशल से भी लैस करे?
शरतचंद्र- भविष्य की शिक्षा में केवल ज्ञान नहीं, बल्कि जीवनोपयोगी कौशल और व्यावहारिक समझ सिखाई जानी चाहिए। शिक्षा वही सार्थक है जो जीवन में उपयोगी हो, न कि केवल परीक्षा में।
सवाल- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लागू करने के लिए राज्य स्तर पर किन दो प्रमुख परिवर्तनों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए?
शरतचंद्र- NEP 2020 के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए दो चीजें सबसे आवश्यक हैं।
पहला सक्रिय और उत्तरदायी प्रशासनिक तंत्र तथा दूसरा स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप लचीले परिवर्तन। राज्य स्तर पर नीतियों का कार्यान्वयन तभी सफल होगा जब प्रशासनिक इच्छाशक्ति और व्यावहारिक समझ दोनों साथ हों।






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