अदालत ने बचाया भरोसा, राजनीति ने तोड़ा
राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा 28 अगस्त को एसआई भर्ती परीक्षा 2021 को निरस्त करना सिर्फ एक न्यायिक निर्णय नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति, प्रशासन और नैतिकता की असलियत उजागर करने वाला ऐतिहासिक आदेश...

राजस्थान SI भर्ती घोटाला
राजस्थान टुडे,
न्यूज डेस्क
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राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश समीर जैन का 28 अगस्त का आदेश केवल एक परीक्षा निरस्त करने का निर्णय नहीं था, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र पर करारा तमाचा था। न्यायालय ने साफ कहा कि एसआई भर्ती परीक्षा 2021 में गड़बड़ी इतनी व्यापक थी कि इसे वैध मानना न्याय के साथ खिलवाड़ होगा। न्यायपालिका ने उस उम्मीद को जिन्दा किया है, जो बेरोजगार युवाओं ने लंबे संघर्ष के बाद लगभग खो दी थी। 859 पदों के लिए आयोजित इस परीक्षा में हजारों अभ्यर्थियों ने मेहनत और सपनों की कीमत चुकाई थी। लेकिन परीक्षा के पेपरलीक और धांधली ने युवाओं का भरोसा तोड़ा। अदालत का यह निर्णय उन्हें आश्वस्त करता है कि न्याय देर से सही, पर मिलेगा जरूर।
राजनीति का दोहरा चेहरा
यह मामला भाजपा और कांग्रेस, दोनों दलों की सियासी चालबाजियों को नंगा करता है। जब यह परीक्षा कांग्रेस शासन में हुई, तब भाजपा विपक्ष में थी और उसने बड़े जोर-शोर से परीक्षा निरस्त करने की मांग की। उस समय मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसे ठुकरा दिया और आरोपियों को बचाने में लगे रहे। लेकिन सत्ता बदलने के बाद भाजपा ने भी वही रुख अख्तियार किया जो कांग्रेस ने लिया था। भाजपा सरकार ने कोर्ट में पूरी ताकत झोंकी कि परीक्षा निरस्त न हो। सवाल उठता है कि आखिर क्यों? जवाब साफ है—दोनों पार्टियां अपने-अपने नियुक्त लोगों को बचाने और भ्रष्ट तंत्र को संरक्षित करने में बराबर की दोषी हैं। जनता ने यह दोहरापन साफ-साफ देख लिया है। परीक्षा में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार लोग सत्ता की रंग बदलती राजनीति की छत्रछाया में सुरक्षित रहे।
आयोग की भूमिका और संजय क्षोत्रिय का संरक्षण
राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) जैसी संवैधानिक संस्था पर भरोसा होना चाहिए था, लेकिन यही संस्था भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई। परीक्षा के दौरान संजय क्षोत्रिय अध्यक्ष थे, जिनकी नियुक्ति कांग्रेस शासन में हुई। पहले कांग्रेस ने उन्हें बचाया और फिर भाजपा ने। हैरानी की बात यह है कि क्षोत्रिय आराम से सेवानिवृत्त हो गए और नौ महीने बाद भी भाजपा सरकार ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। जब तक कोर्ट ने सख्त टिप्पणी नहीं की, तब तक सरकार मौन साधे रही। यह सवाल भाजपा पर भी भारी है कि “भ्रष्टाचार विरोधी” छवि का दम भरने वाली पार्टी ने क्षोत्रिय को संरक्षण क्यों दिया?
जेल में कटारा और रायका, पर बाकी मुक्त क्यों?
परीक्षा घोटाले में सदस्य बाबूलाल कटारा और रामूराम रायका जेल में बंद हैं। लेकिन बाकी आरोपित सदस्य आज भी पदों पर जमे हुए हैं। क्या यह न्याय है कि कुछ को बलि का बकरा बनाया जाए और बाकी सत्ता के रिश्तों के कारण बचते रहें? हाईकोर्ट की टिप्पणी ने इस दोहरे रवैये को उजागर कर दिया है।
कुमार विश्वास और नैतिकता का सवाल
इस प्रकरण का सबसे संवेदनशील और चर्चित पहलू है—कुमार विश्वास का नाम अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ना। लोक सेवा आयोग की मौजूदा सदस्य मंजू शर्मा, जो हाईकोर्ट की टिप्पणी के दायरे में आई हैं, कुमार विश्वास की पत्नी हैं। कुमार विश्वास रामायण पर प्रवचन देते हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम राम का उदाहरण देकर जनता को नैतिकता और मर्यादा का पाठ पढ़ाते हैं। सवाल यह है कि जब उनकी पत्नी खुद गड़बड़ी के आरोप में घिरी हैं, तब क्या वह नैतिकता का वही पाठ घर में लागू करेंगे? क्या वह सार्वजनिक रूप से पत्नी को इस्तीफा देने के लिए कहेंगे?
संगीता आर्य और अफसरशाही का गठजोड़
दूसरी ओर, आयोग की सदस्य संगीता आर्य का नाम भी हाईकोर्ट ने लिया है। वह पूर्व मुख्य सचिव निरंजन आर्य की पत्नी हैं। निरंजन आर्य गहलोत सरकार के सबसे भरोसेमंद अफसर रहे। उनकी कार्यशैली पर पहले भी सवाल उठते रहे। संगीता आर्य की नियुक्ति में भी यही राजनीतिक संरक्षण साफ दिखता है। ऐसे में उनसे किसी नैतिक त्याग की उम्मीद करना बेमानी है। लेकिन जनता अब यह सब देख और समझ रही है कि अफसरशाही और राजनीति किस तरह से हाथ में हाथ डालकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है।
युवाओं का आक्रोश और टूटा भरोसा
इस परीक्षा घोटाले से सबसे ज्यादा चोट उन युवाओं को लगी है जिन्होंने अपने भविष्य की आस में वर्षों तैयारी की थी। राजस्थान जैसे राज्य में बेरोजगारी पहले से बड़ी समस्या है। जब परीक्षा जैसी प्रक्रिया भी धांधली से दूषित हो, तब युवाओं का भरोसा व्यवस्था से टूटना स्वाभाविक है। हजारों उम्मीदवार मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान और सामाजिक उपहास का शिकार हुए। उनके परिजनों ने उम्मीदें पाली थीं कि मेहनत रंग लाएगी। लेकिन सत्ता की मिलीभगत ने सब कुछ छीन लिया। यह मानवीय पीड़ा किसी भी सरकार के लिए चेतावनी है कि यदि भरोसा खो गया, तो सिर्फ सत्ता ही नहीं, पूरी व्यवस्था अस्थिर हो जाएगी।
नैतिकता बनाम राजनीति
यह प्रकरण हमें सिखाता है कि राजनीति और नैतिकता का रिश्ता आज भी कमजोर है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने सत्ता की सुविधा के अनुसार रुख बदला। आयोग के सदस्य नैतिकता से इस्तीफा देने की बजाय पद पर टिके रहने का रास्ता चुनेंगे। और बड़े नामों से जुड़े रिश्ते समाज के सामने आदर्श के बजाय संदेह खड़ा करेंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ अदालतों पर ही भरोसा करते रहेंगे? क्या राजनीतिक दल और समाज खुद नैतिकता की कसौटी पर खरे उतरने की कोशिश करेंगे?
असली परीक्षा अभी बाकी है
राजस्थान हाईकोर्ट का यह आदेश जनता की जीत और व्यवस्था के लिए आईना है। लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है। क्या सरकार दोषियों पर ठोस कार्रवाई करेगी या फिर राजनीतिक समीकरणों के चलते मामला फिर दबा दिया जाएगा? युवाओं की पीड़ा, न्यायपालिका की सख्ती और जनता की निगाहें अब सरकार पर टिकी हैं। यह सिर्फ एसआई भर्ती परीक्षा का सवाल नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता का प्रश्न है। अगर दोषियों को नहीं सज़ा मिली, तो आने वाली पीढ़ियाँ मान लेंगी कि इस व्यवस्था में मेहनत का कोई मूल्य नहीं और भ्रष्टाचार ही सफलता की कुंजी है।






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