आहत पहाड़ का प्रतिशोध
राली, उत्तरकाशी की त्रासदी ने एक बार फिर हिमालयी अस्थिरता की सच्चाई को उजागर कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां चेताती हैं कि यदि नीतियों और विकास मॉडल को तुरंत नहीं बदला गया तो हिमालय और...

क्या विकास की अंधी दौड़ हिमालय को विलुप्ति की ओर ले जा रही है?
रमेश शर्मा,
वरिष्ठ पत्रकार
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‘हिमालय के विनाश का सबसे बड़ा कारण जल विद्युत परियोजनाएं, चार लेन सड़कें, वनों का विनाश, बहुमंजिला इमारतें और अनियंत्रित पर्यटन है। पर्यावरण और पारिस्थितिकी की कीमत पर राजस्व नहीं कमाया जा सकता।’ यह बहुत ही सख्त टिप्पणी धराली, उत्तरकाशी की त्रासदी के ठीक एक सप्ताह पहले सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई 2025 को केन्द्र और हिमाचल प्रदेश सरकार के खिलाफ की और उनकी नीतियों को लेकर जमकर खिंचाई की।
सुप्रीम कोर्ट ने हालात की गंभीरता को उजागर करते हुए साफ शब्दों में चेतावनी दी कि यदि संपूर्ण नीति और व्यवहार नहीं बदले गए तो हिमालय विलुप्त हो जाएगा और हिमालयी राज्यों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट की यह तल्ख टिप्पणी हिमालय क्षेत्र में तेजी से बढ़ते निर्माण और सड़कों पर हो रहे चौड़ीकरण को लेकर दायर जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई।
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हिमालय भारत ही नहीं, पूरी दक्षिण एशिया की जलवायु, नदियों और पारिस्थितिकी का आधार है। यहां की नाजुकता और विविधता पर सुप्रीम अदालत की टिप्पणी जाहिर करती है कि इसके संरक्षण के लिए हमारी नीतिगत व्यवस्थाएं अनुकूल नहीं हैं। इसमें बहुत खोट है।
हिमालय से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों की जीवन रेखा हैं। हिमालय का अस्तित्व संकट में पड़ने का अर्थ है— पानी की गंभीर किल्लत, जिससे भारत समेत कई देशों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। (हालांकि इस मसले पर सुनवाई जारी है, लेकिन यह टिप्पणी हिमाचल प्रदेश ही नहीं, संपूर्ण हिमालय क्षेत्र के लिए प्रासंगिक है।)
आपदा आंकड़ों की जुबानी
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर, तीनों जगह पिछले एक माह में बादल फटने की घटनाओं से आए दिन तबाही के भयानक मंजर दिखाई दे रहे हैं। एक दशक (2013–2023) में इसरो और वाडिया इंस्टीट्यूट की रिपोर्टों के अनुसार, उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में 2200 से अधिक भूस्खलन और 350 से अधिक क्लाउडबर्स्ट दर्ज हुए हैं। आईसीआईएमओडी (इंटरनेशनल सेंटर फार इंटीग्रेटेड माउन्टेन डेवलेपमेन्ट) के अनुसार, हिमालय के ग्लेशियर औसतन 35 फीसदी तेजी से सिकुड़ रहे हैं और इसने पहाड़ की प्राकृतिक भू-रचना पर गहरा असर डाला है। (वर्ष 2024 और 2025 में तीनों राज्यों की भीषण आपदाओं को इसमें शामिल नहीं किया गया है)
दो न्यायाधीशों की पीठ ने इस कथन के माध्यम से उस सच्चाई को उजागर किया है, जिसे दशकों से हमारी सरकारें, हमारी व्यवस्था, वैज्ञानिक, पर्यावरणविद्, और जिम्मेदार आमजन लगातार अनदेखा करते आए हैं। आपदाएं चेता रहीं हैं कि हिमालय भी इस अनदेखी को अब नहीं सहेगा। बादल फटने की बढ़ती घटनाएं बता रही है कि हिमालय की सेहत ठीक नहीं है। संपूर्ण हिमालय क्षेत्र बहुत ही संवेदनशील आपदाओं का केंद्र बना हुआ है।
तबाही के डरावने मंजर
उत्तरकाशी के धराली और किश्तवाड़ के चिशोटी गांव में तबाही के जो वीडियो डरावना मंजर दिखा रहे हैं। वे आज भी अब भी हर किसी के जेहन में चस्पा हैं। कई दिन गुजरने के बाद भी तबाही के जख्म हरे हैं। धराली त्रासदी में सैकड़ों घर, होटल और दुकानें बह गए, जबकि कई लोग मारे गए और हजारों प्रभावित हुए। अब तक पुनर्वास से जुड़े कार्य धीमी गति से चल रहे हैं। बादल फटने पर अथाह पानी किस तरह से पूरे वेग से सामने आने वाली हर चीज को तिनके की तरह बहा ले गया। तबाही दबे पांव आई और किसी को संभलने का मौका भी नहीं दिया। चंद सेकंड में सैकड़ों इमारतें, मकान, होटल आदि जमींदोज हो गए।
पांच अगस्त को उत्तरकाशी के धराली में एक के बाद एक पांच जगह बादल फटने की घटनाओं के बाद हिमाचल प्रदेश के रामपुर, बुशहर, लाहोल स्पीति, कुल्लू, जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़, कठुवा, पुंछ, पहलगाम की घटनाओं ने सोचने पर मजबूर कर दिया है।
बारिश का बदला पैटर्न
हिमालय क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग ने बारिश का पैटर्न बदल दिया है। कम समय में भीषण बारिश होने लगी है। भारत मौसम विज्ञान विभाग, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और इसरो के संयुक्त डेटा के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में वर्ष 2000 की तुलना में अब औसतन 1.3°C अधिक वार्षिक तापमान दर्ज किया गया है। यह बर्फ के पिघलने, जल स्रोतों के सूखने और असमय बारिश का कारण बन रहा है।
ग्लोबल वार्मिंग के चलते हिमनद (ग्लेशियर) के टूटने से पहाड़ों की ऊंची चोटियों में हिमनद की झीलें बन रहीं हैं। तेज बारिश या बादल फटने से भयंकर तबाही हो रही है। यह भविष्य के लिए बहुत बड़ा खतरा बन रहीं है। यह टाइम बम की तरह हैं कभी भी फट सकती हैं। माना जाता है कि वर्ष 2013 में केदारनाथ का हादसा भी ऐसी की हिमनद झील के टूटने से हुआ था। धराली में भी 5 अगस्त को सैलाब आने के बाद हर्षिल (स्विट्जरलैंड ऑफ इंडिया) में कृत्रिम झील बन गई है। यह आने वाले दिनों के लिए पूरे क्षेत्र में संकट पैदा करेगी। इसीलिए पर्यावरणविद् कभी भी पहाड़ों में बड़े बांध बनाने के पक्ष में नहीं रहे। आपदाओं की बढ़ती तीव्रता को देखते हुए इन पर पाबंदी लगनी चाहिए। नदियों से रेत की खुदाई बंद कर बहाव क्षेत्र में पक्का निर्माण सख्ती से रोका जाना चाहिए, ताकि पानी के रास्ते बंद नहीं हों।
सुप्रीम कोर्ट ने जैसी टिप्पणी की है कि पहाड़ी इलाकों के विकास मॉडल पर नए सिरे से विचार करना जरूरी है। संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में बसावट और पक्के निर्माण के लिए नीति निर्धारण के साथ व्यापक आपदा प्रबंधन रणनीति पर समन्वित रूप से कार्य करने की जरूरत है। पहाड़ अध्यात्म के केंद्र हैं, पर्यटन के नाम पर विलासिता के केंद्र नहीं बनने चाहिए। पर्यटन के लिए सख्त नियम बनाने और उन पर अमल करना जरूरी है।
गायब होंगे ग्लेशियर?
जलवायु परिवर्तन (तापमान और मौसम के पैटर्न में लम्बे समय तक बदलाव) का दंश झेलते हुए संपूर्ण हिमालय क्षेत्र बहुत ही संवेदनशील बन गया है। संयुक्त राष्ट्र की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि हिमालय के ग्लेशियर (हिमनद) जिस गति से पिघल रहे हैं, आगामी 25 वर्षों में दक्षिण एशिया के 75 फीसदी जलस्रोतों के सूखने का खतरा है। यानी विकसित भारत बनने का सपना साकार होने तक (लक्ष्य 2047) हिमालय क्या सिर्फ कहानियों में रह जाएगा? आईसीआईएमओडी की 2023 रिपोर्ट कहती है कि हिंदू-कुश हिमालयी क्षेत्र के दो-तिहाई ग्लेशियर यदि मौजूदा दर से पिघलते रहे, तो सदी के अंत तक गायब हो सकते हैं। हिमालयी अस्थिरता का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रमाण यह है कि हिमाचल के कुल्लू, धर्मशाला, मंडी, मनाली जैसे खूबसूरत स्थान भूकंपीय क्षेत्र के लिहाज से जोन 3 में आते थे, ये अब जोन 4 और 5 में शिफ्ट हो गए, अर्थात अति संवेदनशील हो गए।
आपदाओं की जड़ – मानवीय भूल
सवाल उठता है कि पहाड़ी क्षेत्र में तबाही के मंजर में पिछले एक दशक में इतनी तेजी क्यों आई? दरअसल तबाही पहाड़ी क्षेत्रों में इंसानी गतिविधियां बढ़ने का ही नतीजा है। बड़ी संख्या में पेड़ काटने, पर्यटन के नाम पर जंगलों का दोहन, पक्के निर्माण, नाजुक पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल विवेकपूर्ण तरीके से काम नहीं करना इसका बड़ा कारण है। यही टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के जजों ने भी की है।
बाढ़ के विकराल होने के पीछे मूल कारण उसके बहाव क्षेत्र में अवरोध पैदा करना है। नदियों के किनारे पक्के निर्माण कर दिए गए। जहां पानी बहना चाहिए वहां आवास या होटलें बना दी गईं। नदियों में रेत की निरंतर खुदाई, जमीन का कटाव, पहाड़ी क्षेत्र में प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग, पहाड़ के नैसर्गिक वातावरण के साथ निरंतर छेड़छाड़, बेशुमार पावर प्रोजेक्ट और पहाड़ काट कर बनाई जा रही सुरंगें इसे खोखला कर रही हैं। इसीलिए पूरे हिमालय क्षेत्र में एक के बाद एक हो रही क्लाउडबर्स्ट की घटनाएं हमारे सिस्टम के साथ मानवीय भूलों पर कई सवाल खड़े कर रही हैं।
चंद सेकंड में पूरा गांव तिनके की तरह बह गया है तो समझ लें कि यह प्रकृति के प्रति हमारी उदासीनता का आत्मघाती नतीजा है। बेशक बादलों का फटना प्राकृतिक घटनाएं हैं, इसे हम नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन उसके रास्ते पर अवरोध खड़े कर हम कैसे बच सकते हैं? सैलानियों को सहूलियतों के नाम पर हमने पहाड़ों से खिलवाड़ किया है। प्रकृति कोई भेदभाव नहीं करती, वह अपना हिसाब बराबर करती है। कुदरत से अत्याचार हुआ है तो वह बख्शा भी नहीं जाएगा।
पहाड़ की तबाही सिर्फ पहाड़ तक की सीमित नहीं रहती। इससे मैदान भी अछूते नहीं रह सकते। जब भी बाढ़ आती है, उसके मार्ग में आने वाले हर गांव, कस्बे, नगर, महानगर भी चपेट में आते हैं। यही कारण है कि है कि पहाड़ में आई बाढ़ का असर हरिद्वार प्रयागराज, दिल्ली, बनारस पटना जैसे महानगरों में दिखाई दिया और लाखों— करोंड़ों लोग इससे प्रभावित हुए।
धराशायी विकास मॉडल
आज जोशीमठ (ज्योर्तिमठ) राष्ट्रीय स्तर पर चेतावनी का प्रतीक बना हुआ है कि जब प्रकृति की नाजुकता को नजरअंदाज कर निर्माण होते हैं, तो पूरा शहर जमींदोज हो सकता है।
जोशीमठ पांच दशक से संवेदनशील जोन है। 1970 के दशक से ही यहां जमीन धंस रही है, मकानों में दरारें आ रही है। इसे भूस्खलन भी कहा जाता है। हाल के वर्षों में यह और भी बदतर हो गई है। वर्ष 1976 में गढ़वाल के तत्कालीन कमिश्नर एमसी मिश्रा की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने रिपोर्ट दी थी कि जोशीमठ को बचाने के लिए फौरन कदम उठाने चाहिए। निर्माण पर रोक लगाकर हरियाली बढ़ाई जानी चाहिए। पांच दशक बाद भी स्थिति सुधारने की बजाय बिगड़ती ही चली गई। वर्ष 2023 में भूस्खलन से अनेक मकान टूटे, जिससे आबादी को विस्थापन के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे पहले 2021 में चमोली में ग्लेशियर टूटा, धौली गंगा में अचानक बाढ़ आ गई। तपोवन विष्णु गार्डन पन बिजली परियोजना में काम कर रहे अनेक श्रमिकों की जान चली गई। जोशीमठ शहर अतिसंवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र—5 में आता है। आपदाएं रोकने के लिए पर्यावरण संरक्षण के मापदंड अपनाए बिना यहां विकास नहीं हो सकता।
यहां भी बेरहम प्रकृति
जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड ही नहीं, प्रकृति की बेरहमी अनेक बार पूर्वोत्तर के मिजोरम, त्रिपुरा, नगालैंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश, दक्षिण भारत के केरल, महाराष्ट्र आदि जगह भी दिखाई दी। पिछले ढाई दशक में इन प्रदेशों में सबसे अधिक भूस्खलन की घटनाएं हुई है। ये अति—संवेदनशील जोन में माने जाने लगे हैं। इसके अलावा नेपाल और भूटान की पहाड़ियों में भी पिछले वर्षों में बाढ़ और भूस्खलन से हज़ारों लोग विस्थापित हुए हैं, जो बताता है कि संकट केवल भारत तक सीमित नहीं है।






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