बेरोजगारी की भयावह कतारें
राजस्थान में हर साल बांटी जाने वाली डिग्रियों और बेरोजगारों की बढ़ती तादाद में एक बहुत गहरा और खतरनाक विरोधाभास है। एक ओर यहां 88 विश्वविद्यालय हैं और दूसरी ओर हर साल लाखों शिक्षित बेरोजगार खड़े हो...

नई शिक्षा नीति : कागज पर क्रांति, धरातल पर खामोशी
रमेश शर्मा,
वरिष्ठ पत्रकार
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राजस्थान में शिक्षा की इमारतें बेहद ऊंची हैं, परन्तु इसकी नींव एकदम खोखली नजर आती है। यह राज्य आज देश के उन चुनिंदा प्रदेशों में है, जहां विश्वविद्यालयों की बाढ़ आई हुई है। कुल 88 विश्वविद्यालय हैं। इनमें 53 निजी, 28 राज्य वित्तपोषित और 7 अन्य विश्वविद्यालय शामिल हैं। यह संख्या देखकर लगता है, मानो राजस्थान शिक्षा का महाकुंभ बन चुका हो, लेकिन हकीकत यह है कि इन विश्वविद्यालयों के बावजूद शिक्षित बेरोजगारों की फौज लगातार बढ़ती जा रही है। यह आंकड़ा लगातार भयावह हो रहा है।
विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी, पर अवसर नहीं
हर साल हजारों छात्र-छात्राएं बीए, एमए, बीएड, बीएससी जैसी डिग्रियों के साथ बाहर निकलते हैं, लेकिन बाजार में उनके लिए जगह नहीं है। यानी हर साल बेरोजगारों की बड़ी फौज खड़ी हो रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र (सीएमआईई) के हालिया आंकड़ों के अनुसार राज्य की बेरोजगारी दर करीब 28 फीसदी बनी हुई है, जो राष्ट्रीय औसत से तीन गुना से भी ज्यादा है। यह विडंबना है कि डिग्रियों का सबसे बड़ा उत्पादन केंद्र होकर भी राजस्थान रोजगार सृजन में सबसे पिछड़ों में गिना जाता है। असल समस्या यह है कि शिक्षा अब ‘ज्ञान’ नहीं, ‘कारोबार’ बन चुकी है। निजी विश्वविद्यालयों ने प्रदेश में ‘डिग्री वितरण केंद्रों’ का साम्राज्य खड़ा कर लिया है। प्रवेश आसान, फीस भारी, और प्लेसमेंट का नाम तक नहीं।
रैंकिंग मे पिछड़े
राज्य के सरकारी विश्वविद्यालय भी किसी बेहतर स्थिति में नहीं हैं। आधारभूत सरचनाएं हैं, लेकिन दिशा नहीं है। इसकी बानगी देखिए कि एनआईआरएफ (नैशनल इन्स्टिच्यूशनल रैंकिंग फ्रेम वर्क) की ओवर ऑल रैंकिंग में राजस्थान के बमुश्किल गिने चुने संस्थान जगह बना पाते हैं, यह दर्शाता है कि गुणवत्ता और नवाचार का स्तर कितना कमजोर है। वर्ष 2025 की रैंकिंग मे भी बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी पिलानी 16वीं रैंक पर व मालवीय नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी 77वीं रैंक पर रहा है।
आरपीएससी : ‘रोजगार व्यवस्था’ की सच्चाई
राजस्थान में युवाओं की पूरी पीढ़ी राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) के इर्द-गिर्द घूम रही है। यह संस्था राज्य की सबसे बड़ी भर्ती एजेंसी है। एक तरह से यह ‘उम्मीद और अविश्वास’ दोनों का प्रतीक है। रीट से लेकर प्रशासनिक सेवा, पटवारी, पुलिस, जूनियर अकाउंटेंट, व्याख्याता आदि तक हर परीक्षा मे लाखों युवाओं की किस्मत यहीं से तो तय होती है, लेकिन हाल के वर्षों में जो हुआ, उसने व्यवस्था की साख पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया। पेपर लीक का दंश, भर्ती प्रक्रियाओं में लंबी देरी, रद्द की गई परीक्षाएं और भ्रष्टाचार के आरोपों की धुंध ने युवाओं के मन में गहरी निराशा भर दी है।
आरपीएससी से जुड़े हालिया विवादों में पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में विसंगतियां और सदस्यों पर लगे आरोप शामिल हैं, जिसके कारण आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। इन विवादों के चलते ही राजस्थान हाईकोर्ट ने भी कई सदस्यों को भर्ती प्रक्रिया को कमजोर करने का दोषी ठहराया।
वर्ष 2021 की एसआई भर्ती परीक्षा में पेपर लीक हुआ, जिसकी वजह से राजस्थान हाईकोर्ट ने परीक्षा रद्द कर दी और आरपीएससी के कुछ सदस्यों को इसमें शामिल पाया। आरपीएससी विवाद एक ऐसा मुद्दा है जो बार-बार चर्चा में रहता है और इससे आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं। इससे भविष्य में होने वाली भर्तियों पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि राजस्थान में डिग्री तो जल्दी मिल जाती है, पर नौकरी की परीक्षा पास करने में ज़िंदगी निकल जाती है। आरपीएससी का हाल उस तंत्र की तस्वीर है, जहां ‘योग्यता’ से ज़्यादा ‘प्रक्रिया’ बोझिल है। एक परीक्षा से परिणाम तक पहुंचने में दो से तीन साल का औसत समय लग जाता है। इस बीच, हजारों युवा उम्र सीमा पार कर जाते हैं। इस तरह से शिक्षित बेरोजगारों की फौज हर साल बढ़ती ही जाती है।
यह उठते हैं सवाल
– जब राज्य में 88 विश्वविद्यालय हैं, तो क्या इन संस्थानों का कोई उत्तरदायित्व नहीं कि वे अपने छात्रों को सरकारी नौकरी से इतर विकल्पों के लिए तैयार करें?
– क्या सभी रास्ते सिर्फ़ आरपीएससी की सीढ़ी पर जाकर खत्म होंगे?
– क्यों कोई विश्वविद्यालय अपने परिसर में उद्योग-प्रशिक्षण, स्किल सेंटर या स्टार्टअप हब को विकसित नहीं कर सकता?
– क्या विश्वविद्यालयों की भूमिका सिर्फ़ परीक्षा केंद्र और दीक्षांत समारोह तक सीमित रह गई है?
नई शिक्षा नीति और जमीनी सच्चाई
नई शिक्षा नीति 2020 में शिक्षा को कौशल और व्यावसायिक दृष्टि से जोड़ने का वादा किया गया था। लेकिन राज्य में इसका असर अब तक ऊपरी परत तक ही सिमटा है। बहु-विषयक पढ़ाई, इंटर्नशिप-आधारित सीख और उद्योग-सम्बद्ध पाठ्यक्रमों की बात सिर्फ़ सिलेबस तक सीमित है। ज्यादातर विश्वविद्यालयों ने एनइपी को ‘अनिवार्य कार्य’ की तरह अपनाया है, ‘सुधार’ की तरह नहीं। ऐसे में तो इसका नतीजा फिर वही होगा कि वही पुराने विषय, वही अप्रासंगिक कोर्स और वही बेरोज़गार युवाओं कि फौज।
बेरोजगारी: समाज और व्यवस्था दोनों की भूमिका
राजस्थान में बेरोजगारी नीतिगत नहीं, मानसिकता की बीमारी भी है। यहां अब भी ‘सरकारी नौकरी’ को ही प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। कौशल आधारित प्रशिक्षण या उद्यमिता को ‘कमतर’ समझा जाता है। यानी, सरकार नीति बनाए भी तो समाज उसे अपनाने में पीछे है या युवाओं मे इसके प्रति रुचि लेने का माहौल ही नहीं है।
क्या होना चाहिए
अब राजस्थान को शिक्षा के संख्यात्मक विस्तार से आगे बढ़कर गुणवत्तात्मक क्रांति की जरूरत है। हर विश्वविद्यालय में उद्योग-अनुकूल विभाग अनिवार्य हों। ताकि पढ़ाई सीधी नौकरी या उद्यम से जुड़ सके। आरपीएससी जैसी संस्थाओं में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित हो, ताकि युवाओं का विश्वास लौट सके।
निजी विश्वविद्यालयों की वार्षिक गुणवत्ता रैंकिंग जारी की जाए, ताकि वे सिर्फ़ फीस वसूलने का ठेका न बनें।राज्य-स्तर पर ‘स्किल ट्रस्ट मिशन’ शुरू हों, जो विश्वविद्यालयों और उद्योगों को एक मंच पर लाएं।
नई शिक्षा नीति कि प्रगति रिपोर्ट हर साल सार्वजनिक की जाए, ताकि यह दिखे कि नीति सिर्फ कागज पर नहीं, जमीन पर भी चल रही है।






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