‘मौत का ताबूत’ बन गई बस
"अरे! धुआं!" किसी ने चीख कर बताया। ड्राइवर ने बस रोकने की कोशिश की, पर कुछ ही पलों में, जो धुआं था वह आग की लपटों में तब्दील हो गया। वह बस, जिसे 'आरामदेह स्लीपर' बनाने के लिए मॉडिफाई किया गया था, अब...

वह सिर्फ एक बस नहीं थी, वह सपनों का काफिला थी। जैसलमेर की सुनहरी रेत को पीछे छोड़ते हुए, हर पहिया जोधपुर की ओर बढ़ रहा था। बस के भीतर 57 जिंदगियां थीं, जो अपने घरों की ओर लौट रही थीं। कोई अपनी दिवाली की छुट्टी मनाने जा रहा था, कोई प्री-वेडिंग शूट कराकर लौट रहा था, तो कोई महज पांच दिन पहले खरीदी गई इस चमचमाती नई बस में सफर के आराम का आनंद ले रहा था।
उन्हीं यात्रियों में एक थे महेंद्र मेघवाल, जो जैसलमेर में सेना के गोला बारूद डिपो में काम करते थे। उनकी पत्नी और तीन छोटे बच्चों के साथ, वह दिवाली पर अपने गांव सेतरावा जा रहे थे। बच्चों ने स्लीपर बर्थ पर जगह ले ली थी, खुश थे कि पापा घर ले जा रहे हैं। दोपहर के करीब सवा तीन बजे होंगे। बस ने रफ्तार पकड़ी। वार म्यूजियम के पास अचानक पिछले हिस्से से एक पतला धुआं उठा।
“अरे! धुआं!” किसी ने चीख कर बताया।
ड्राइवर ने बस रोकने की कोशिश की, पर कुछ ही पलों में, जो धुआं था वह आग की लपटों में तब्दील हो गया। वह बस, जिसे ‘आरामदेह स्लीपर’ बनाने के लिए मॉडिफाई किया गया था, अब एक धधकता हुआ ताबूत बन चुकी थी।
सबसे पहले आग ने आगे के गेट को अपनी चपेट में लिया। बस का इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम फेल हो गया और गेट लॉक हो गया। यात्री चीखने लगे, एक-दूसरे को धकेलने लगे, मगर संकरी गैलरी और धधकती लपटों ने भागने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा।
“दरवाजा खोलो! बचाओ!” अंदर से सिर्फ चीखें आ रही थीं, जो जलकर राख हो रहे सपनों की आखिरी पुकार थी।
महेंद्र मेघवाल ने अपने बच्चों को बचाने की आखिरी कोशिश की होगी, लेकिन स्लीपर बर्थ के ऊपर उठना और फिर कूदना असंभव था। पीर मोहम्मद भी अपने बच्चों को नहीं बचा पाए, क्योंकि गेट लॉक हो गया था। कांच तोड़कर कुछ भाग्यशाली यात्री कूद पाए, जिनमें से कई 70 प्रतिशत तक झुलस गए थे। जो अंदर फंसे, वे असहाय थे। धुआं और आग, दोनों ने उन्हें निकलने का मौका नहीं दिया।
घटनास्थल पर पहुंचे थईयात गांव के निवासी कस्तूर सिंह के अनुसार, “लोग कांच तोड़कर जान बचाने की गुहार लगा रहे थे। फायर ब्रिगेड आने में देर हुई। आखिर में आर्मी ने जेसीबी लगाकर बस का गेट तोड़ा।”
जब तक आग बुझती, तब तक 20 से अधिक निर्दोष यात्रियों की सांसें थम चुकी थीं। किसी की पहचान तक मुश्किल थी, उनके शवों की पहचान अब डीएनए टेस्ट से ही संभव होगी।
सड़क किनारे जल चुकी बस का ताबूत और उसके अंदर खामोश हो चुके सपनों के अवशेष बता रहे हैं कि यह सिर्फ एक हादसा नहीं था, यह था सिस्टम की लापरवाही और जुगाड़ का भयानक नतीजा। एक नई बस, जिसे सुरक्षित होना चाहिए था, महज पांच दिनों में महेंद्र के पूरे परिवार के लिए और बाकी 19 जिंदगियों के लिए ‘मौत का ताबूत’ बन गई।
आज जोधपुर के अस्पताल में घायलों का इलाज चल रहा है और जैसलमेर से लेकर पूरे राजस्थान में शोक का माहौल है। यह त्रासदी एक सवाल छोड़ गई है, क्या एक आरामदायक सफर की कीमत इतनी दर्दनाक हो सकती है? और कब तक हम इस तरह की अनदेखी को सहते रहेंगे, जब तक कि एक और परिवार का सपना जलकर राख न हो जाए?
दर्दनाक चेतावनी, सुरक्षा उपाय जरूरी
जैसलमेर-जोधपुर बस त्रासदी ने यह कड़वा सच सामने ला दिया है कि चलती हुई बसें, खासकर एसी स्लीपर बसें आग लगने की स्थिति में यात्रियों के लिए ‘मौत का जाल’ बन सकती हैं। जब शॉर्ट सर्किट या आग से इलेक्ट्रॉनिक गेट लॉक हो जाते हैं, तो आपातकालीन निकास के अभाव में यात्री असहाय हो जाते हैं।
इस हृदय विदारक घटना से सबक लेते हुए हमें तत्काल प्रभाव से कुछ आपातकालीन सुरक्षा उपाय अपनाने होंगे:
हर यात्री को सुरक्षा कवच : जिस प्रकार आधुनिक कारों और कुछ विमानों में आपात स्थिति में खिड़की के कांच तोड़ने के लिए विशेष ‘सुरक्षा हैमर’ उपलब्ध होते हैं, उसी प्रकार इसे सभी निजी और सरकारी यात्री बसों में अनिवार्य किया जाना चाहिए।
सीटों के पास उपलब्धता : प्रत्येक दो सीटों या स्लीपर बर्थ के पास और विशेष रूप से हर इमरजेंसी एग्जिट विंडो के पास, यह टूल मजबूत और स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाली जगह पर लगाया जाए। यह टूल यात्रियों को मौका देगा कि वे खुद ही कांच तोड़कर अपनी और दूसरों की जान बचा सकें, भले ही ड्राइवर या परिचालक तक पहुंचना संभव न हो।
बहुआयामी निकास द्वार : बस के अगले मुख्य द्वार के अलावा बस के मध्य और पिछले हिस्से में कम से कम दो या तीन अतिरिक्त यांत्रिक निकास द्वार होने ही चाहिए, जो आग या शॉर्ट सर्किट की स्थिति में भी आसानी से हाथ से खोले जा सकें।
सुरक्षा मानक : मॉडिफाई की गई एसी स्लीपर बसों के लिए सुरक्षा मानक सख्त किए जाएं। यह सुनिश्चित किया जाए कि एसी और वायरिंग की स्थापना ऐसे हो कि शॉर्ट सर्किट की स्थिति में आग तेजी से न फैले।
ट्रेनिंग और जागरूकता : बस ऑपरेटरों को आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए उचित प्रशिक्षण दिया जाए और यात्रियों को बस में सवार होते समय सुरक्षा हैमर के स्थान और उपयोग के बारे में जानकारी दी जाए।
जैसलमेर की यह घटना एक दर्दनाक चेतावनी है। हमें केवल शोक व्यक्त करके नहीं रुकना चाहिए, बल्कि इन सरल, लेकिन जीवन बचाने वाले उपकरणों को अनिवार्य करके, यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी यात्री फिर कभी चलती हुई बस में लाचार होकर न मरे। हर सीट पर एक छोटा-सा औजार, लाखों जिंदगियों का कवच बन सकता है। या इसके अलावा भी जो उपाय जिन्दगियां बचा सकते हैं, करने होंगे।






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