मैं जोधपुर हूं! (आत्मव्यथा)
मुझे कई नामों से पुकारा जाता है— सूर्य नगरी, ब्लू सिटी, जोधाणा। "सूर्य नगरी" इसलिए क्योंकि यहां सूरज की रोशनी सबसे अधिक दर्ज की गई...

जोधपुर स्थापना दिवस विशेष
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ पत्रकार
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मैं जोधपुर हूं— मारवाड़ की शान, इतिहास के पन्नों में दर्ज एक जीवंत गाथा। मेरा अस्तित्व रामायण काल से माना जाता है। कहा जाता है कि रावण की पत्नी मंडोदरी का पीहर यहीं था, इसलिए लोग मुझे रावण का ससुराल भी कहते हैं। यह नाम सुनकर कुछ लोग हंसते हैं, तो कुछ तंज कसते हैं, लेकिन इतिहास अपनी जगह अटल है। समय बदला, राजे-रजवाड़े आए और गए, लेकिन मैं अडिग खड़ा रहा— बलुआ पत्थरों की नींव पर, अपनी पहचान के साथ।
मेरे नाम की गूंज
मुझे कई नामों से पुकारा जाता है— सूर्य नगरी, ब्लू सिटी, जोधाणा। “सूर्य नगरी” इसलिए क्योंकि यहां सूरज की रोशनी सबसे अधिक दर्ज की गई है। मौसम विज्ञानियों ने भी कहा कि देश में सबसे ज्यादा धूप यहीं पड़ती है। लेकिन जब मई-जून की तपती गर्मी में लोग झुलसते हैं, तो कभी-कभी लगता है कि यह नाम सम्मान से ज्यादा, धूप सहने की सजा बन गया है। “ब्लू सिटी” मेरी पहचान का दूसरा नाम है। मेरे पुराने शहर की गलियां, हवेलियां और मकान नीले रंग से रंगे हैं। यह रंग कभी ब्राह्मणों की पहचान हुआ करता था। फिर धीरे-धीरे पूरे शहर ने इसे अपनाया। वैज्ञानिक कहते हैं कि नीला रंग गर्मी को कम करता है, लेकिन मैं जानता हूं कि इस रंग में जोधपुरवासियों का अपनापन और सादगी झलकती है।
मेरी पहचान—मेरा पत्थर
मैंने सदियों तक बलुआ पत्थरों को अपने सीने में संजोया है, और यही पत्थर मेरी पहचान बन गए। जोधपुर के प्रसिद्ध “छीतर पत्थर” (Jodhpur Sandstone) से बनी इमारतें दुनियाभर में मशहूर हैं। दिल्ली का राष्ट्रपति भवन, किंग जॉर्ज मेमोरियल (मुंबई), और ब्रिटेन की पार्लियामेंट तक में मेरे पत्थर लगे हैं। मेरी कारीगरी का लोहा पूरी दुनिया ने माना। लेकिन आज यही पत्थर मेरी पीड़ा बन चुके हैं। दिन-रात इन्हें खोदकर निकाला जा रहा है, मानो मेरे ही शरीर को काटा जा रहा हो। मेरे आंगन में बसे गांव, जहां कभी शांति थी, आज पत्थर की खदानों के शोर में दब चुके हैं। मेरे अपने लोग मेरी छाती पर खनन मशीनें चला रहे हैं और उन घरों को तोड़ रहे हैं, जिनके लिए मेरे पत्थरों ने सदियों तक नींव बनाई थी। जब मेरे पत्थरों से दुनिया के महल सज सकते हैं, तो मेरी ही पहचान क्यों मिट रही है?
मेरी बोली की मिठास भी कम नहीं
मेरे जोधपुर वाले बोलने में इतने मीठे व सलीके वाले हैं कि यहां गुस्से में भी लोग “सा” लगाए बिना किसी को गरिया नहीं सकते।
“पधारो सा, हटो सा, मूड खराब मत करो सा!”
अब सामने वाला गाली खाकर भी खुद को राजा-महाराजा समझने लगे तो हमारा क्या कसूर? दुनिया में किसी से “सा” जोड़कर बोलो, तो वो सोचेगा कि उसे नवाबी सम्मान दिया जा रहा है, लेकिन जोधपुर में यही “सा” हथियार भी है और प्यार भी।
अब बताइए, हमने तहजीब में भी हद कर दी या नहीं?
मेरी चिंता और उम्मीद
आज मैं खुद से सवाल करता हूं—
जब मैं “सूर्य नगरी” हूं, तो मुझमें इतनी उदासी क्यों है?
जब मैं “ब्लू सिटी” हूं, तो मेरा रंग फीका क्यों पड़ रहा है?
जब मैं “पत्थरों का शहर” हूं, तो मेरी बुनियाद ही क्यों हिल रही है?
लेकिन फिर मैं अपने अतीत को देखता हूं—मैंने युद्ध देखे, राजे-रजवाड़ों की सत्ता देखी, ब्रिटिश शासन सहा, और फिर भी मैं खड़ा रहा।
मैं जानता हूं, मैं जोधपुर हूं—सूरज की तपिश सहना भी जानता हूं और अपनी शान बचाना भी।
बस, लोग मुझे देखने से ज्यादा समझने की कोशिश करें, तो शायद मेरी आत्मव्यथा कुछ कम हो जाए।






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