रेगिस्तान का रॉबिनहुड
भारत–पाक युद्ध 1971 में थार के रेगिस्तान से उठे एक असाधारण नागरिक योद्धा बलवंत सिंह बाखासर ने अपनी सूझबूझ और साहस से भारतीय सेना की राह आसान की। यह आलेख उस रॉबिनहुड की कहानी है, जिसकी बहादुरी आज भी...

1971 युद्ध के सिविल हीरो बलवंत सिंह बाखासर की अमर गाथा
धर्मसिंह भाटी,
वरिष्ठ पत्रकार
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पश्चिमी मोर्चे पर भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 का जिक्र आते ही अंतरराष्ट्रीय सीमा से करीब 100 किलोमीटर भीतर पाकिस्तान में स्थित छाछरो पर तिरंगा ध्वज लहराता हुआ दिखाई देता है। इस युद्ध की सुनहरी यादों में भारतीय सेना के साथ-साथ इस क्षेत्र के सिविल हीरो की यादें भी ताजा हो जाती है। 54 वर्ष पुराने इस युद्ध की यादें यूं तो कभी विस्मृत होती ही नहीं, लेकिन 13 दिसंबर को भारत-पाक बॉर्डर पर स्थित बाखासर गांव में हुए एक समारोह में विधिवत तौर पर ऐतिहासिक युद्ध को याद किया गया। रेगिस्तान के रॉबिन हुड कहे जाने वाले 1971 युद्ध के सिविल हीरो बलवंतसिंह बाखासर की अश्वारूढ़ प्रतिमा का अनावरण कर युद्ध के मैदान में दिए गए उनके योगदान को चिरस्थाई बनाया गया।
लोकगीतों, चारणों की बातों व ख़्यातों में स्थाई रूप से स्मरण किए जाने वाले किरदार बलवंत सिंह बाखासर के पास 52 गांव की जागीर थी। 1947 में भारत- पाक विभाजन व देश की आजादी के साथ ही नई लोकतांत्रिक व्यवस्था में जागीरदारी प्रथा समाप्त हो गई, लेकिन थार के रेगिस्तान में हिंदुस्तान व पाकिस्तान दोनों की सरजमी पर बलवंत सिंह का रुबाब कायम रहा। उनकी दबंग व आक्रामक शैली नई नवेली लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी अलग पहचान लिए हुए चल रही थी। इस क्षेत्र का आम जनमानस तत्समय अपने कामकाज के लिए बलवंत सिंह की तरफ देखा करता था। खासकर भारत-पाकिस्तान के बीच तारबंदी नहीं होने के कारण पाकिस्तान से आने वाले लुटेरों द्वारा यहां के माल मवेशी को लूट कर ले जाने की घटनाएं बलवंत सिंह से देखी नहीं जाती थी। लूट या अपहरण की किसी वारदात की जानकारी मिलते ही बलवंत सिंह घोड़े पर सवार होकर अपने साथियों के साथ लुटेरों का पीछा करते और माल मवेशी, जिसमें गाय, भेड़,बकरी, ऊंट इत्यादि रेगिस्तान पशु होते थे, उन्हें वापस लाकर उनके मालिकों को सुपुर्द करते। महिलाओं व बालिकाओं का अपहरण होने पर भी वह अपनी इसी स्टाइल से न्याय करते। इस तरह पूरे क्षेत्र में उनकी छवि रॉबिनहुड की बन गई। रॉबिनहुड की इस छवि के चलते उनके खिलाफ हत्या, अपहरण व डकैती के मुकदमे भी दर्ज हुए, लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की। उन पर मुकदमे भले ही दर्ज हुए, लेकिन थानों की पुलिस कभी उनके सामने जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।
जब पाक सैनिक भागते नजर आए
इस तरह देश की आजादी को 24 वर्ष हो गए और 1971 की भारत-पाक जंग छिड़ गई। पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेना की 10 पैरा ब्रिगेड ने युद्ध का मोर्चा संभाला। जयपुर के महाराजा कर्नल भवानी सिंह के नेतृत्व में जोधपुर से सेना की रवानगी बाड़मेर बॉर्डर के लिए हुई। तीन दिसंबर को भारतीय सेना अग्रिम मोर्चे तक पहुंच गई। इस बीच कर्नल भवानी सिंह ने स्थानीय नागरिकों की मदद लेने का निश्चय किया। कर्नल भवानी बलवंत सिंह बाखासर के व्यक्तित्व को निजी रूप से जानते थे। लिहाजा उन्होंने बलवंत सिंह से मुलाकात की और सीमा पार के दुर्गम रेगिस्तानी रास्तों के बारे में जानकारी ली। इस दौरान ठाकुर बलवंत सिंह ने अपनी टीम के साथ युद्ध क्षेत्र में उतरने का विकल्प भी कर्नल को दिया। भवानी सिंह ने तुरंत ही हामी भर ली और बलवंत सिंह अपनी टीम के साथ युद्ध के मैदान में उतर गए। पाकिस्तान के कराची तक के रास्तों के जानकारी रखने वाले बलवंत सिंह ने सेना की राह आसान कर दी। सेना ने पाकिस्तान फतेह के लिए कूच कर दिया। भारतीय सीमा से पाकिस्तान के छाछरो के रास्ते के बीच में एक जगह पाकिस्तान की टैंक रेजीमेंट नजर आई। उससे पार पाने के लिए बलवंत सिंह ने तरकीब बताई कि जोंगा जीपों के साइलेंसर खोल दिए जाएं और उन्हें एक साथ रवाना किया जाए। रेतीले धोरों में साइलेंसर खुली जोंगा जीपों की आवाज टैंकों की तरह गरज उठी। इससे पाकिस्तान की टुकड़ी को लगा कि भारत की टैंक रेजीमेंट ने धावा बोल दिया है। अधिकांश पाक सैनिक भाग खड़े हुए। बचे खुचे जवानों को भारतीय सेना ने मार गिराया। छह दिसंबर की आधी रात को भारतीय सेना छाछरो पहुंच गई और पाकिस्तान के करीब 80,000 वर्ग मील क्षेत्र पर अपना कब्जा कर लिया। छाछरो में आधी रात को तिरंगा लहरा दिया गया। शिमला समझौता होने तक करीब 13 महीने तक यह क्षेत्र भारतीय सेना के कब्जे में रहा। युद्ध समाप्त होने के 13 महीने बाद हुए शिमला समझौते में भारत में यह क्षेत्र वापस पाकिस्तान को सुपुर्द कर दिया। 10 पैरा ने ठाकुर बलवंत सिंह बाखासर के इस योगदान के लिए उनकी विशेष तौर पर सराहना की और पुणे स्थित अपने मुख्यालय में इसका खास जिक्र किया। राज्य सरकार ने भारत सरकार के निर्देशानुसार बलवंत सिंह व उनके साथियों पर 1971 से पूर्व दर्ज सभी मुकदमे वापस ले लिए गए और सम्मान व सुरक्षा स्वरूप बलवंत सिंह को दो हथियारों का लाइसेंस दिया गया, जिन्हें लेकर वहां देश भर में कहीं भी आज सकते थे। इस तरह रेगिस्तान के रॉबिनहुड का व्यक्तित्व अमर हो गया। वर्ष 1991 में अपने गांव बाखासर में बलवंत सिंह का निधन हुआ।
प्रतिमा का अनावरण
युद्ध के 54 साल बाद बाखासर गांव के मुख्य चौक पर 13 दिसंबर को केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बलवंत सिंह की प्रतिमा का अनावरण किया। प्रतिमा अनावरण कार्यक्रम में राजस्थान व गुजरात क्षेत्र से हजारों की संख्या में लोग शरीक हुए और अपने युद्ध नायक व रक्षक को पुष्पांजलि अर्पित की। हालांकि इस कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह व कर्नल भवानी सिंह की पोती उपमुख्यमंत्री राजस्थान दियाकुमारी के आने का कार्यक्रम बना था, लेकिन ऐनवक्त पर वह नहीं आए। फिर भी योद्धा बलवंत सिंह के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में कोई कमी नहीं रही।






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