कैंसर का दंश और लचर व्यवस्था के सवाल
राजस्थान में हर साल करीब 15 हजार लोग कैंसर की चपेट में आ रहे हैं। गुटखा और तंबाकू की लत न सिर्फ जान ले रही है, बल्कि परिवारों की जमा-पूंजी भी खत्म कर रही है। आखिर कब तक राजस्व के नाम पर यह खेल चलता...

राजस्थान में बढ़ते मामले और आर्थिक संकट
दुनियाभर में हर साल 4 फरवरी को कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाई जाती है, लेकिन हकीकत यह है कि जागरूकता के सरकारी विज्ञापनों और धरातल की कड़वी सच्चाई में जमीन-आसमान का अंतर है। राजस्थान में कैंसर अब केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि एक आर्थिक महामारी का रूप ले चुका है। विभिन्न स्वास्थ्य रिपोर्टों और विशेषज्ञों के आकलन के अनुसार, प्रदेश में हर साल अनुमानतः 10 से 15 हजार नए कैंसर रोगी सामने आ रहे हैं। जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल की ओपीडी व भगवान महावीर कैंसर चिकित्सालय हो या बीकानेर का कैंसर संस्थान, वहां की भीड़ यह बताने के लिए काफी है कि मौत का यह व्यापार कितनी तेजी से पांव पसार रहा है। इनके अलावा निजी कैंसर चिकित्सालयों में कैंसर रोगियों की गिनती करना शेष हैं। विडंबना देखिए कि जिस गुटखे और तंबाकू पर सरकार ‘कैंसर होता है’ लिखकर बेचती है, उसी की बिक्री से मिलने वाले राजस्व को विकास का आधार माना जाता है। सवाल यह है कि क्या चंद करोड़ों का टैक्स किसी की जान और उजड़ते परिवारों की कीमत से बड़ा हो सकता है?
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पूरे परिवार पर आर्थिक संकट
कैंसर का दंश केवल मरीज को शारीरिक पीड़ा नहीं देता, बल्कि बिना बीमा वाले परिवारों के लिए यह एक आर्थिक मौत की तरह आता है। एक मध्यमवर्गीय परिवार जब कैंसर की चपेट में आता है, तो उसकी पीढ़ियों की ‘गाढ़ी मेहनत की कमाई’ अस्पतालों के बिलों और महंगी दवाओं में स्वाहा हो जाती है। राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में आज भी कैंसर का इलाज शुरू होने का मतलब है खेत बिकना, जेवर गिरवी रखा जाना और जमा-पूंजी का खत्म होना। सरकारी योजनाएं राहत तो देती हैं, लेकिन उन्नत इलाज और लंबी चलने वाली दवाओं का अतिरिक्त बोझ अंततः परिवार की आर्थिक रीढ़ तोड़ देता है। तंबाकू लॉबी की ताकत इतनी है कि विज्ञापनों के जरिए युवाओं को गुमराह किया जा रहा है और व्यवस्था कड़े कानून बनाने के बजाय अक्सर मौन सहमति देती नजर आती है।
भ्रामक विज्ञापनों का मायाजाल
चिंताजनक पहलू यह भी है कि आज की युवा पीढ़ी ‘कूल’ दिखने की चाहत और नामी सितारों द्वारा किए जाने वाले भ्रामक विज्ञापनों के जाल में फंसकर इन जहरीले उत्पादों को अपना रही है। ‘इलायची’ और ‘माउथ फ्रेशनर’ के नाम पर बेचे जा रहे ये ब्रांड असल में तंबाकू और कैंसर के ही छिपे हुए चेहरे हैं। जब बड़े पर्दे के नायक और रोल मॉडल हाथ में केसर या चांदी का वर्क लगा ‘जहर’ दिखाकर उसे सफलता की निशानी बताते हैं, तो एक आम किशोर के लिए इसके पीछे छिपी श्मशान की हकीकत को समझना मुश्किल हो जाता है। यह विज्ञापनों का ही मायाजाल है कि आज राजस्थान के गली-मोहल्लों से लेकर स्कूलों के बाहर तक ये ‘मौत के पाउच’ आसानी से उपलब्ध हैं, जो एक पूरी नस्ल को धीरे-धीरे लाइलाज अंधेरे की ओर धकेल रहे हैं।
बदलाव जनता से ही संभव
बदलाव की जिम्मेदारी केवल सरकार पर ही नहीं, बल्कि हम पर भी है। हमें यह समझना होगा कि यदि हम इन जहरीले उत्पादों का सेवन ही बंद कर दें, तो ये कंपनियां अपने आप भागने को मजबूर हो जाएंगी। जब तक जनता की ओर से ‘ना’ नहीं कहा जाएगा, तब तक ये व्यापारिक इकाइयां हमारे स्वास्थ्य की कीमत पर अपनी तिजोरियां भरती रहेंगी। सरकारों को भी यह सोचना होगा कि क्या एक स्वस्थ नागरिक देश की असली संपत्ति है या तंबाकू के पाउच से निकलने वाला टैक्स? आज जरूरत इस बात की है कि व्यवस्था की इस दोहरी नीति के खिलाफ एक सशक्त सामाजिक विमर्श खड़ा किया जाए। समय आ गया है कि हम अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए इस ‘कानूनी जहर’ का त्याग करें, ताकि किसी और की मेहनत की कमाई कैंसर के दानव की भेंट न चढ़े।






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