उच्च शिक्षा में ‘गफलत’ का बंटाधार
सवाल यह उठता है कि क्या शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय के उच्चाधिकारी कुंभकर्णी नींद में सोए हुए थे? जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के स्पष्ट निर्देश थे कि इन संस्थानों का भौतिक निरीक्षण किया जाए,...

आखिर कब तक जवाबदेही की बलि चढ़ाता रहेगा तंत्र?
शिक्षा किसी भी राष्ट्र और समाज की रीढ़ होती है, लेकिन जब इस रीढ़ को ही भ्रष्टाचार और प्रशासनिक उदासीनता का घुन लग जाए, तो भविष्य की इमारत का ढहना निश्चित है। राजस्थान की उच्च शिक्षा व्यवस्था में इन दिनों जो कुछ घट रहा है, वह न केवल चिंताजनक है बल्कि उस पूरे सिस्टम की शुचिता पर कालिख पोतने जैसा है, जिस पर प्रदेश के लाखों युवाओं का भविष्य टिका है। हाल ही में राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने प्रदेश के कुलपतियों की बैठक में जिस कड़े लहजे में “सुधरो या बंद करो” की चेतावनी दी, उसने उस कड़वे सच को बेपर्दा कर दिया है जिसे शिक्षा विभाग के आला अधिकारी सालों से फाइलों के नीचे दबाकर बैठे थे।
जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय (JNVU) से संबद्ध 51 कॉलेजों का मामला कोई सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं है। ये संस्थान पिछले तीन से पांच वर्षों से बिना सरकारी ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ (NOC) के धड़ल्ले से संचालित हो रहे थे। सवाल यह उठता है कि क्या शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय के उच्चाधिकारी कुंभकर्णी नींद में सोए हुए थे? जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के स्पष्ट निर्देश थे कि इन संस्थानों का भौतिक निरीक्षण किया जाए, तो आखिर किस ‘अदृश्य दबाव’ या ‘गफलत’ के चलते विश्वविद्यालय की निरीक्षण टीमें इन कॉलेजों की दहलीज तक नहीं पहुंचीं? यह लापरवाही उस समय और भी गंभीर हो जाती है जब प्रशासन निरीक्षण करने के बजाय केवल ‘जुर्माना’ (Penalty) वसूल कर छात्रों के परीक्षा फॉर्म भरवा देता है। क्या जुर्माना भर देना ही नियमों के उल्लंघन को वैधता प्रदान करने का लाइसेंस बन गया है?
गुणवत्ता के नाम पर खिलवाड़
उच्च शिक्षा के इन तथाकथित ‘मंदिरों’ में शैक्षणिक गुणवत्ता के नाम पर जो खिलवाड़ हो रहा है, वह किसी अपराध से कम नहीं है। बिना मानक वाले लैब, अपर्याप्त फैकल्टी और कागजी एनओसी के सहारे चल रहे ये कॉलेज डिग्री बांटने वाली दुकानें बनकर रह गए हैं। ऐसी गफलत न केवल शिक्षा के स्तर को गिराती है, बल्कि उन अभिभावकों के भरोसे की हत्या भी करती है जो पाई-पाई जोड़कर अपने बच्चों को सुनहरे भविष्य का सपना दिखाते हैं। यदि राज्यपाल को हस्तक्षेप कर यह याद दिलाना पड़े कि शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता नहीं होगा, तो यह मान लेना चाहिए कि निचले और मध्य स्तर का प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है।
महज कुछ कॉलेजों पर ताला लगाना या नए प्रवेश पर रोक लगा देना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। असली कार्रवाई तो उन ‘कुर्सियों’ पर होनी चाहिए जो इन फाइलों पर कुंडली मारकर बैठी थीं। जब तक उन उच्चाधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में सब ‘ऑल इज वेल’ दिखाया, तब तक ऐसी ‘दुकानदारियां’ फलती-फूलती रहेंगी। राजस्थान की उच्च शिक्षा को इस बंटाधार से बचाने के लिए अब सर्जरी की जरूरत है, महज मरहम-पट्टी की नहीं। राजभवन की सख्ती एक सकारात्मक शुरुआत है, लेकिन इसे एक तार्किक अंजाम तक पहुँचाना सरकार और जागरूक समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।






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