जड़ी-बूटियों की ओर लौटती दुनिया
दुनिया आधुनिक दवाओं के दुष्प्रभाव, महंगे इलाज और सीमित विकल्पों से जूझ रही है। ऐसे समय भारत ने आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा को वैश्विक मंच पर विज्ञान के साथ जोड़कर स्वास्थ्य की एक नई राह दिखाई...

जब विज्ञान और परंपरा साथ चलते हैं, बदलती है वैश्विक स्वास्थ्य नीति
रमेश शर्मा,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- जब विज्ञान और परंपरा साथ चलते हैं, बदलती है वैश्विक स्वास्थ्य नीति
- ‘पारंपरिक चिकित्सा’ का वैश्विक नेतृत्व
- परंपरा—विज्ञान का वैश्विक केंद्र है जीसीटीएम
- दूसरा वैश्विक शिखर सम्मेलन भी भारत में
- भारत का वैश्विक नेतृत्व
- भारत में पारंपरिक चिकित्सा की ताकत
- भारत में पारंपरिक चिकित्सा, ताकत और पहचान
- उम्मीद की रोशनी
जब दुनिया के लाखों लोग आधुनिक दवाओं के साइड इफेक्ट्स, खर्च और सीमाओं से जूझ रहे हैं, तब भारत ने प्रकृति और विज्ञान को जोड़ती स्वास्थ्य यात्रा का नया रास्ता दिखाया है। यहां देश की धड़कनों में आयुर्वेद, योग और हमारी धरती से जुड़ी हजारों वर्ष पुरानी परंपराएं अब जाग उठी हैं। भारत ही नहीं, पूरी दुनिया उनमें उम्मीद तलाश रही है। आयुर्वेद, योग, होम्योपैथी और यूनानी जैसी प्रणालियां अब केवल भारत की विरासत या सांस्कृतिक धरोहर ही नहीं रहीं, वे वैश्विक स्वास्थ्य नीति का चर्चित विषय बन रही हैं।
भारत ने इस दिशा में कई ठोस कदम उठाए हैं। भारत न सिर्फ अपने अतीत को पुनर्जीवित कर रहा है, बल्कि भविष्य के स्वास्थ्य का संतुलन भी तय कर रहा है, जहां विज्ञान और परंपरा एक साथ आगे बढ़ें। हर व्यक्ति को स्वास्थ्य का अधिकार मिले। भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के साथ मिलकर पारंपरिक चिकित्सा को संस्थागत स्वरूप दिया है। आयुर्वेदिक दवाओं के वैज्ञानिक परीक्षण, योग को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रसारित करने और यूनानी-सिद्ध पद्धतियों को आधुनिक चिकित्सा के साथ जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
‘पारंपरिक चिकित्सा’ का वैश्विक नेतृत्व
आज जब पूरी दुनिया आधुनिक चिकित्सा पर निर्भर है, यकीन मानिए तब एक और स्वास्थ्य क्रांति चुपचाप आगे बढ़ रही है, और वह है पारंपरिक चिकित्सा की वापसी। अचरज और गौरव की बात यह है इसमें भारत विश्व का नेतृत्व कर रहा है। याद कीजिए दादी-नानी के उस कड़वे काढ़े को, जिसने न जाने कितनी बार हमारी सर्दी-ज़ुकाम को ठीक किया। अनेक योग शिक्षक तो विदेश में जाकर भारतीय जीवन पद्धति का परचम लहरा रहे हैं। भारत की मिट्टी से जुड़ी ये कहानियां अब दुनिया भर के लाखों लोगों की प्रेरणा बन रही हैं।
कोरोना संकट के समय भारत ने आयुर्वेद और योग के माध्यम से न सिर्फ अपने लोगों को स्वस्थ किया, बल्कि दुनिया भर के लिए वैकल्पिक चिकित्सा की शक्ति दिखाई। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और टेलीमेडिसिन के माध्यम से दूर-दराज़ इलाकों तक स्वास्थ्य सेवा पहुंची, यही असली स्वास्थ्य की समावेशिता है।
परंपरा—विज्ञान का वैश्विक केंद्र है जीसीटीएम
साल 2022 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत सरकार की मदद से ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन (जीसीटीएम) की स्थापना की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक की उपस्थिति में गुजरात के जामनगर में डब्ल्यूएचओ-जीसीटीएम की आधारशिला रखी।
यह डब्ल्यूएचओ का पहला और एकमात्र वैश्विक केंद्र है जो पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा पर वैज्ञानिक अनुसंधान, मानकीकरण, प्रशिक्षण और वैश्विक सहयोग पर काम कर रहा है। भारत ने इसके प्रारंभिक बुनियादी ढांचे के लिए लगभग 250 मिलियन डॉलर की प्रतिबद्धता जताई थी। जुलाई 2024 में भारत और डब्ल्यूएचओ के बीच 10 साल के लिए 85 मिलियन डॉलर के परिचालन सहयोग का समझौता हुआ।
इस केंद्र की स्थापना ने साफ कर दिया कि भारत इस क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। जीसीटीएम आज अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिकी देशों के विशेषज्ञों के लिए एक शोध-हब बन चुका है। यह केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिक विज्ञान के साझे भविष्य का प्रतीक है।
दूसरा वैश्विक शिखर सम्मेलन भी भारत में
विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने 17–18 अगस्त 2023 को गुजरात के गांधीनगर में पहला वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन आयोजित किया। अब दूसरा ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन समिट 17–19 दिसंबर 2025, नई दिल्ली में होने जा रहा है। भारत ने हाल ही में दुनिया भर के राजदूतों और उच्चायुक्तों के समक्ष इस सम्मेलन की रूपरेखा, इसके वैश्विक महत्व और साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा में बहुपक्षीय सहयोग की संभावनाओं को प्रस्तुत किया।
भारत का वैश्विक नेतृत्व
1 जीटीएमसी — विश्व का पहला और एकमात्र पारंपरिक चिकित्सा केंद्र
जामनगर में स्थापित ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन विश्व का पहला और एकमात्र डब्ल्यूएचओ द्वारा मान्यता प्राप्त वैश्विक केन्द्र है जो दुनिया भर में पारंपरिक उपचारों के वैज्ञानिक शोध, नीति-निर्माण, और डिजिटल डोक्यूमेंटेशन का प्रमुख हब है।
2. ग्लोबल डिजिटल ट्रेडिशनल मेडिसिन डेटाबेस
भारत सरकार और डब्ल्यूएचओ द्वारा एक ग्लोबल डिजिटल ट्रेडिशनल मेडिसिन डेटाबेस तैयार किया जा रहा है, जिससे दुनिया भर के शोधकर्ताओं को प्रामाणिक जानकारी मिले।
3. डब्ल्यूएचओ सदस्य देशों का रुझान
डब्ल्यूएचओ रिपोर्टों के अनुसार करीब 90% सदस्य देशों ने पारंपरिक चिकित्सा के उपयोग की सूचना दी है। यानी लगभग 170 प्लस देश किसी न किसी रूप में परंपरागत मेडिसिन का उपयोग कर रहे हैं।
4. विश्व जर्नलों में बढ़ती वैज्ञानिक रिपोर्टें
कई अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में आयुर्वेद, योग और हर्बल-आधारित उपचारों पर शोध-पत्र बढ़े हैं। कैंसर, मधुमेह और मानसिक स्वास्थ्य में इनसे जुड़े अध्ययन प्रकाशित हुए हैं।
भारत में पारंपरिक चिकित्सा की ताकत
पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी और होम्योपैथी को बढ़ावा देने के लिए 2014 में आयुष मंत्रालय स्थापित किया गया।
हाल ही में भारतीय आयुष मंत्रालय ने आयुष ग्रिड (Ayush Grid) लॉन्च किया। यह एक डिजिटल हेल्थ इकोसिस्टम है, इसके जरिए पारंपरिक चिकित्सा की सेवाएं ऑनलाइन कहीं भी उपलब्ध होंगी।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र के ‘इंटरनेशनल डे ऑफ योग’ को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई। 2024 में इस दिवस पर रिकॉर्ड 24.53 करोड़ लोगों ने भागीदारी निभाई। विश्व योग दिवस 2015 से मनाया जा रहा है।
कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार आयुष बाजार 2014 में 2.85 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2023 में 43.4 बिलियन डॉलर हो गया है। निर्यात 1.09 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2.16 बिलियन डॉलर हो गया है। यह आयुष में बढ़ते आर्थिक प्रभाव को दिखाता है।
भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए 100 देशों में आयुष सूचना केंद्र बनाए गए। पारंपरिक औषधियों की गुणवत्ता नियंत्रण और स्वास्थ्य कर्मियों के प्रशिक्षण पर भी विशेष जोर दिया गया।
जामनगर की तरह ही चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका भी ऐसे केंद्र खोलने की योजना बना रहे हैं। अफ्रीका, जापान, और यूरोप के कई देशों में भारतीय पारंपरिक चिकित्सा के प्रशिक्षण प्रोग्राम शुरू किए गए हैं, जिससे भारतीय मॉडल का वैश्विक प्रसार हो रहा है।
भारत में आयुष मंत्रालय डिजिटल हेल्थ, एआई समाधान और टेलीमेडिसिन में पारंपरिक चिकित्सा को समाहित कर रहा है। यह नवाचार दिखाता है कि किस तरह पुरातन ज्ञान वैश्विक डिजिटल स्वास्थ्य में एकीकृत हो रहा है।
भारत में साढ़े 7 लाख से अधिक पंजीकृत आयुष चिकित्सक 886 स्नातक, 251 स्नातकोत्तर महाविद्यालय और तीन उन्नत राष्ट्रीय आयुष संस्थान हैं।
आयुष अनुसंधान पोर्टल पर 43,000 से अधिक अध्ययन उपलब्ध हैं।
भारत में पारंपरिक चिकित्सा, ताकत और पहचान
पारंपरिक चिकित्सा केवल उपचार नहीं, यह भारत की सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक ज्ञान और प्रकृति-आधारित जीवनदर्शन का विस्तार है। केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा, भारत और डब्ल्यूएचओ मिलकर पारंपरिक चिकित्सा को विज्ञान और नीति दोनों के स्तर पर वैश्विक मुख्यधारा में लाने की दिशा में काम कर रहे हैं। जीटीएमसी में अफ्रीकी, एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों के विशेषज्ञों का प्रशिक्षण यह दर्शाता है कि भारत अब मॉडल, उत्पाद, तकनीक और चिकित्सा प्रणाली सभी के स्तर पर ज्ञान का निर्यातक बन गया है।
उम्मीद की रोशनी
भारत की पारंपरिक चिकित्सा केवल अतीत नहीं, यह भविष्य की स्वास्थ्य प्रणाली का महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभर रही है। जब आधुनिक चिकित्सा अपनी सीमाओं से जूझ रही है, तब भारत का अनुभव, योग का विज्ञान और आयुर्वेद की साक्ष्य-आधारित प्रगति दुनिया को एक नया रास्ता दे रही है। भारत आज विश्व को सिर्फ उपचार नहीं दे रहा, बल्कि समग्र स्वास्थ्य का दर्शन दे रहा है। यही वजह है कि दुनिया का झुकाव फिर से जड़ी-बूटियों, योग, और प्राकृतिक चिकित्सा की ओर है, और इस परिवर्तन के केंद्र में है भारत।






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