दिल की सुनने का समय
आज हमारे युवा दिल जिस तेज़ी से थम रहे हैं, वह सिर्फ़ एक ख़तरा नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का मौक़ा है। ये अब युवाओं व समाज के लिए चिंतन का विषय है कि कैसे हमारी जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव करके हम इस...

युवा दिल का संकट : डर नहीं, समाधान पर ध्यान देना जरूरी
राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
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कभी आपने सोचा है कि क्यों आज किसी शादी में नाचते हुए, जिम में पसीना बहाते हुए, या ऑफिस में काम करते हुए एक स्वस्थ और ऊर्जा से भरा युवा अचानक ज़मीन पर गिर पड़ता है? यह कोई फिल्मों का दृश्य नहीं, बल्कि एक भयानक हक़ीक़त है। हर दिन, सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो सामने आते हैं जो हमें झकझोर कर रख देते हैं। ये वीडियो सिर्फ़ चौंकाने वाले नहीं हैं, बल्कि ये हमारी सामूहिक लापरवाही और ख़ामोशी का एक आईना हैं। ये एक डराने वाली चेतावनी जरूर हैं, पर हमें याद भी दिला रही है कि हम अपनी सबसे क़ीमती पूंजी ‘अपनी युवा पीढ़ी’ को बचाने में कहीं न कहीं कोई कमी छोड़ रहे हैं।
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भारत, जो अपनी युवा आबादी पर गर्व करता है, आज उसी युवा शक्ति को समय से पहले खोने के जोखिम का सामना कर रहा है। लेकिन यह तस्वीर सिर्फ़ ख़तरे की नहीं है, बल्कि एक गहरी पुकार है, एक पुकार जो हमें जगा रही है, हमें अपने जीवन को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर रही है।
आंकड़ों में नजर आती एक चेतावनी, डरे नहीं
भारत में हृदय रोग अब महामारी की तरफ बढ़ रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और स्वास्थ्य मंत्रालय के ताज़ा आंकड़े बेहद परेशान करने वाले हैं। वर्ष 2024 में देश में लगभग 8.9 लाख मौतें सिर्फ़ हृदय रोगों से हुईं। यह कुल मौतों का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा है। लेकिन सबसे ज़्यादा दिल दहला देने वाली बात यह है कि इनमें से 35 प्रतिशत लोग 40 साल से कम उम्र के थे। यह आंकड़ा हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि हमें यह बताने के लिए है कि अब समय आ गया है कि हम जाग जाएं। पिछले तीन सालों का रुझान भी यही दिखाता है कि हर साल मौतों में 8-10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है। यह दिखाता है कि यह समस्या अब हमारे दरवाज़े तक आ चुकी है। यह समय अब हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने का नहीं रहा।
राजस्थान जैसे राज्य भी इस चुनौती से अछूते नहीं हैं। 2024 में यहां हृदय रोग से 35,200 मौतें दर्ज हुईं, जिनमें जयपुर, जोधपुर, कोटा और उदयपुर जैसे शहरी क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा मामले सामने आए। यह एक गंभीर चुनौती है, लेकिन इसका सामना करने के लिए हमारे पास जागरूकता और इच्छाशक्ति जैसे सबसे मज़बूत हथियार हैं। यह लड़ाई किसी और की नहीं, हमारी अपनी ज़िंदगी और हमारे अपनों की ज़िंदगी की है। ये आंकड़े डराने के लिए नहीं, बल्कि हमें समय रहते जागरुक करने व संभलने के लिए हैं।
क्यों बदल गई है दिल की धड़कन?
इस गंभीर समस्या की जड़ें हमारी बदलती जीवनशैली में हैं। एक समय था जब हार्ट अटैक को ‘बुढ़ापे’ की बीमारी माना जाता था। पर आज यह सच बदल गया है। विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं की मानें तो इसके पीछे कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं, जिन्हें समझना और बदलना हमारे हाथ में है।
गलत खान-पान का जाल : आज की युवा पीढ़ी का आहार पूरी तरह से बदल गया है। तुरत-फुरत में काम निपटाने के चक्कर में, हम जंक फूड, प्रोसेस्ड फूड और तैलीय भोजन को अपना चुके हैं। इन खाद्य पदार्थों में ट्रांस-फैट और सोडियम की मात्रा बहुत ज़्यादा होती है, जो कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को बढ़ाकर दिल पर सीधा असर डालते हैं। हम अपने हाथों से ही अपनी थाली में बीमारियों को परोस रहे हैं। लेकिन याद रखिए, हमारे पारम्परिक भारतीय व्यंजन, ताज़े फल और हरी सब्ज़ियां दिल को स्वस्थ रखने का सबसे आसान और स्वादिष्ट तरीक़ा हैं।
नींद की कमी और मानसिक बोझ : देर रात तक जागना, घंटों स्क्रीन पर बिताना और सुबह देर से उठना हमारी प्राकृतिक बायोलॉजिकल क्लॉक को बिगाड़ रहा है। शरीर को पर्याप्त आराम न मिलने से तनाव के हार्मोन, जैसे कोर्टिसोल, का स्तर बढ़ जाता है, जिससे दिल पर दबाव बढ़ता है। हमारा दिमाग़ लगातार काम कर रहा है, पर हमारा शरीर आराम नहीं पा रहा। यह असंतुलन हमें अंदर से खोखला कर रहा है।
शारीरिक निष्क्रियता : वर्तमान जीवनशैली में शारीरिक मेहनत लगभग ख़त्म हो गई है। लोग घंटों तक बैठे रहते हैं, चाहे वह ऑफिस हो या घर। व्यायाम की कमी से शरीर की मेटाबॉलिक प्रक्रिया धीमी हो जाती है, जिससे मोटापा, ब्लड शुगर और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। हम ख़ुद को फिट मानते हैं, पर चिंतन का विषय ये है कि क्या हम सच में फिट हैं?
तनाव एक अदृश्य दुश्मन : आज की तेज़ रफ़्तार से भागती ज़िंदगी में तनाव हर किसी का हिस्सा बन चुका है। ऑफिस का दबाव, परिवार की ज़िम्मेदारियां, आर्थिक परेशानियां और भविष्य की अनिश्चितताएं… ये सभी हमारे दिल पर चुपचाप बोझ डालते रहते हैं। लोग अक्सर तनाव को बहुत ही हल्के में लेते हैं, लेकिन यह दिल की सेहत को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाता है।
आर्थिक और सामाजिक बदलाव की राह
हृदय रोग सिर्फ़ एक व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है। युवा आबादी के अचानक बीमार पड़ने या मृत्यु का सीधा असर उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। एक परिवार का कमाने वाला सदस्य जब चला जाता है, तो पूरा परिवार आर्थिक संकट में आ जाता है। आज जब एकाकी परिवार में लोग बसर करने लगे हैं, ऐसे हालात में पड़ोसियों से मदद की उम्मीद करना बेमानी लगती है। इससे केवल एक परिवार या समाज ही नहीं, देश की अर्थव्यवस्था पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। युवा देश के विकास की रीढ़ होता है। यदि यह युवा वर्ग अस्वस्थ होगा या अपनी जान गंवाएगा, तो देश की उत्पादकता और कार्यक्षमता में भारी गिरावट आएगी। विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि हृदय रोग की यह रफ्तार जारी रही, तो आने वाले पांच वर्षों में यह समस्या भारत की आर्थिक प्रगति पर प्रतिकूल असर डाल सकती है।
समाधान हमारे हाथों में
यह सच है कि सरकार और चिकित्सा व्यवस्था की अपनी भूमिका है, लेकिन सबसे बड़ा बदलाव हमारे खुद के प्रयासों से ही आएगा। हमें यह समझना होगा कि रोकथाम ही सबसे बड़ा हथियार है।
नियमित स्वास्थ्य जांच : 30 वर्ष की उम्र के बाद हर व्यक्ति को साल में कम से कम एक बार ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर की जांच करानी ही चाहिए। यह शुरुआती चेतावनी संकेतों को पकड़ने में मदद करेगा।
संतुलित आहार : जंक फूड, तैलीय और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाना ज़रूरी है। अपने आहार में फल, हरी सब्ज़ियां, और दालों को शामिल करना चाहिए।
व्यायाम और शारीरिक गतिविधि : रोज़ाना 30-40 मिनट की तेज़ वॉक, जॉगिंग या योग करने की आदत डालनी ही होगी। यह न सिर्फ़ दिल को मजबूत करेगा, बल्कि तनाव को भी कम करेगा।
तनाव प्रबंधन : योग, प्राणायाम और ध्यान जैसी गतिविधियां तनाव को कम करने में निश्चित तौर पर मदद करती हैं। इसके अलावा, हॉबी अपनाना, दोस्तों से बात करना और पर्याप्त नींद लेना भी अत्यंत ज़रूरी है। नशे से दूरी : धूम्रपान और शराब जैसी आदतों से पूरी तरह से परहेज़ करना होगा। जीवन को व्यवस्थित व स्वच्छ रखना होगा।
एक नई शुरुआत का आह्वान
भारत में बढ़ते हृदय रोग एक चेतावनी ज़रूर हैं, लेकिन यह एक नई शुरुआत का मौक़ा भी है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपनी सेहत को सबसे ऊपर रखना होगा। यह सिर्फ़ डॉक्टरों या सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है। यह लेख आपको डराने के लिए नहीं, बल्कि आपको जागृत करने और प्रेरित करने के लिए है। ऐसे विषम हालात में हमें सभी को मिलकर इस चुनौती का सामना करना होगा और अपनी युवा शक्ति को इस ख़ामोश महामारी से बचाना होगा। क्योंकि दिल धड़केगा, तभी ज़िंदगी चलेगी।
जान है तो जहान है
हमारी भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि ‘जान है तो जहान है’। पैसा, रुतबा और सफलता पाने की होड़ में हम अपनी सेहत को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन यह सच है कि अगर हमारा शरीर और दिल स्वस्थ नहीं है, तो यह सारा जहान और इसकी सारी दौलत बेमानी है। यह समय है जब हमें यह समझना होगा कि सबसे बड़ा धन हमारी सेहत है। युवाओं के लिए यह बात और भी ज़रूरी हो जाती है कि वे इस मूल मंत्र को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएं और अपने दिल को सबसे ऊपर रखें। किसी भी समस्या या चिंता को जड़ से ख़त्म करने के लिए, सबसे पहले हमें ज़िंदा और स्वस्थ रहना होगा। अगर हम ही नहीं रहेंगे तो इन चिंताओं का क्या मोल? जो हमारे बस में नहीं है, उसे नज़रअंदाज़ करना सीखना होगा, ताकि दिल को हल्का रख सकें। बहुत ज़्यादा दिल को भारी रखने का कोई औचित्य नहीं है।
दिल की धड़कन से जुड़ने का रास्ता है योग और मेडिटेशन
आज की इस तेज़ रफ़्तार दुनिया में, जहां हर तरफ़ शोर है, हमारा दिल अक्सर अकेला महसूस करता है। हम बाहर की दुनिया को जीतने की दौड़ में इतने मशगूल हो जाते हैं कि अपने अंदर की आवाज़ सुनना ही भूल जाते हैं। यहीं पर योग और मेडिटेशन हमारे सबसे सच्चे साथी बनकर सामने आते हैं। ये सिर्फ़ शारीरिक क्रियाएं नहीं, बल्कि अपने दिल और दिमाग़ से फिर से जुड़ने का एक ख़ूबसूरत तरीक़ा हैं। जब हम आंखें बंद करके कुछ पल के लिए ध्यान लगाते हैं, तो हम दुनिया के शोर को पीछे छोड़कर अपने दिल की धड़कन को सुनते हैं। यह पल हमें याद दिलाता है कि सबसे क़ीमती रिश्ता हमारे खुद के साथ है। योग के आसन और प्राणायाम हमें सिखाते हैं कि कैसे एक गहरी सांस लेकर हम तनाव को बाहर निकाल सकते हैं और अपने दिल को हल्का कर सकते हैं। ये प्राचीन पद्धतियां हमें सिर्फ़ शारीरिक रूप से ही मज़बूत नहीं बनातीं, बल्कि हमें मानसिक शांति भी देती हैं, जो हमारे दिल को हर तरह के बोझ से बचाती है। ऐसे में हमें अपनी जिन्दगी के अनमोल समय में से कुछ महत्वपूर्ण पल अपने लिए निकालकर अपने दिल को फिर से स्वस्थ तरीके से धड़कने का मौक़ा देना होगा।
राजस्थान के प्रमुख शहरों का हृदय रोग डेटा (2024)
| शहर | मौतों की संख्या |
| जयपुर | 7,800 |
| जोधपुर | 4,300 |
| उदयपुर | 3,900 |
| कोटा | 3,600 |
| बीकानेर | 2,800 |
| अजमेर | 2,500 |
नोट: ये आंकड़े स्वास्थ्य विभाग की वार्षिक रिपोर्ट पर आधारित हैं।






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