वोट चोरी बनाम शुद्धिकरण: बिहार के बहाने उठे बड़े सवाल
SIR विवाद और वोट चोरी के आरोपों के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार चुनावों को शांतिपूर्ण बताते हुए चुनाव आयोग की खुलकर तारीफ की। यह बयान विपक्ष के नरेटिव को चुनौती देता है और चुनावी संस्थाओं की...

देश की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनाव आयोग पर भरोसा किया जाए या नहीं। विपक्ष चीख-चीखकर कह रहा है कि वोट चोरी हो रही है, SIR के नाम पर मतदाता सूचियाँ काटी-छांटी जा रही हैं, और चुनाव आयोग सरकार की जेब में चला गया है। ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव आयोग को “देश का गर्व” बताना एक सीधा राजनीतिक संदेश है और यह संदेश विपक्ष के नरेटिव पर सीधा प्रहार भी करता है।
प्रधानमंत्री ने बिहार में एनडीए की बड़ी जीत के बाद जो कुछ कहा, वह सिर्फ पुराने दिनों की याद नहीं थी, बल्कि आज की राजनीति को दिशा देने वाला बयान था। उन्होंने कहा कि 2005 से पहले बिहार में चुनाव मतलब हिंसा, बैलट बॉक्स चोरी और बड़े स्तर पर पुनर्मतदान। यह बात सही है, लेकिन इसे कहने का समय और मंच यह साफ कर देता है कि यह टिप्पणी सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि आरजेडी के तथाकथित ‘जंगल राज’ को चुनावी विमर्श में वापस खड़ा करने की रणनीति भी है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि इस बार बिहार में एक भी पुनर्मतदान की जरूरत नहीं पड़ी, मतदान शांतिपूर्ण रहा, और चुनाव आयोग ने शानदार काम किया। यह सब कहते हुए उन्होंने साफ संकेत दिया कि जो लोग आज आयोग पर सवाल उठा रहे हैं, वे या तो चुनावी हार से परेशान हैं या जानबूझकर संस्थाओं में अविश्वास फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। यह टिप्पणी किसी तकनीकी विवरण से ज्यादा एक राजनीतिक मुद्रा है। एक ऐसी मुद्रा जो सरकार को चुनावी संस्थाओं का संरक्षक और विपक्ष को अविश्वास का सौदागर बनाती है।
मजेदार बात यह है कि यह सब तब हो रहा है जब SIR को लेकर विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची से लाखों नाम हटाए गए, और यह सब सत्तारूढ़ दल के फायदे के लिए किया गया। ऐसे समय में प्रधानमंत्री का यह कहना कि युवा मतदाता ‘शुद्धिकरण’ को गंभीरता से लेते हैं, दरअसल विपक्ष की आलोचना का प्रतिउत्तर है। यह तर्क दिया जा रहा है कि फर्जी नाम हटाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, जबकि विपक्ष कहता है कि इसी प्रक्रिया के बहाने असली मतदाताओं के नाम गायब किए गए। इसीलिए ‘शुद्धिकरण’ आज सिर्फ प्रशासनिक शब्द नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार बन चुका है।
प्रधानमंत्री ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर भी बिना नाम लिए तंज कसा कि वे हर संस्था पर हमला करते हैं, ‘वोट चोरी’ जैसे मुद्दे खड़े करते हैं, लेकिन देश के लिए कोई सकारात्मक दृष्टि नहीं दे पाते। यह तीर सीधे विपक्ष की राजनीति पर छोड़ा गया था। आज राजनीति की असली लड़ाई नीतियों की नहीं, नैरेटिव की है, कौन संस्थाओं को विश्वसनीय बताता है और कौन संदेह का धुंध फैलाता है। और पीएम मोदी का पूरा भाषण इसी नैरेटिव पर केंद्रित था।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री की यह प्रशंसा चुनाव आयोग के लिए ढाल बनेगी? कागज़ों पर बिहार चुनाव शांतिपूर्ण रहे, यह बात सही है। लेकिन क्या इससे SIR पर उठ रहे सवाल खत्म हो जाते हैं? बिल्कुल नहीं। लोकतंत्र में भरोसा सिर्फ बयानबाज़ी से नहीं बनता, प्रक्रियाओं की पारदर्शिता से बनता है। विपक्ष यह मुद्दा यहीं नहीं छोड़ेगा, और चुनाव आयोग को भी समझना होगा कि निष्पक्ष होना ही काफी नहीं, निष्पक्ष दिखाई देना उससे भी बड़ा काम है।
भारतीय राजनीति में बयान युद्ध तो चलता रहेगा, लेकिन इस पूरी बहस का केंद्र वही रहेगा, मतदाता सूची, उसकी शुद्धता और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता। प्रधानमंत्री की प्रशंसा सरकार की तरफ से संस्थाओं को मिल रहा समर्थन दिखाती है, लेकिन विपक्ष के सवाल कहीं नहीं जा रहे। लोकतंत्र की असली परीक्षा तभी होगी जब प्रक्रिया स्वयं बोलेगी, न कि सिर्फ नेता।






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