बेटियों ने लहराया तिरंगा
भारत की महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार विश्व कप जीतकर न सिर्फ खेल का इतिहास रचा, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि हौसले और हुनर की कोई सीमा नहीं होती। यह जीत सिर्फ ट्रॉफी की नहीं, बल्कि उस विश्वास की है...

हर ‘मन’ की ‘स्मृति’ में बना रहेगा ‘दीप्ति’ का समर्पण
अजय अस्थाना,
वरिष्ठ पत्रकार
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रविवार की रात भारतीय खेल इतिहास की स्मृतियों में सदा के लिए दर्ज हो गई। महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार आईसीसी वर्ल्ड कप जीतकर वह सपना पूरा कर दिया, जिसका इंतजार एक पीढ़ी से चल रहा था। यह जीत सिर्फ 52 रनों की नहीं थी, बल्कि यह जीत उन अनगिनत सपनों की थी जो वर्षों से ‘संभावना’ बनकर ठहरे हुए थे।
शुरुआती ठोकरें भी नहीं डिगा पाई
टूर्नामेंट की शुरुआत भारत के लिए सहज नहीं रही। शुरुआती हार के बाद आलोचकों ने सवाल उठाए। यहां तक कि संयोजन, कप्तानी और रणनीति पर चर्चा हुई। पर कप्तान हरमनप्रीत कौर ने टीम से एक ही बात कही, ‘हम हार नहीं रहे, हम रास्ता बना रहे हैं।’
धीरे-धीरे यही आत्मविश्वास टीम की पहचान बन गया। जेमिमा रोड्रिग्स ने सेमीफाइनल में नाबाद 127 रन बनाकर ऑस्ट्रेलिया जैसी दिग्गज टीम को अपने खेल से आनन्दित किया। उस जीत ने पूरे ड्रेसिंग रूम का माहौल बदल दिया। अब हर खिलाड़ी को यकीन हो गया कि ‘हम कुछ नया कर सकते हैं।’
फाइनल के दबाव में दमदार प्रदर्शन
फाइनल में भारत का सामना दक्षिण अफ्रीका से हुआ। टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने सम्मानजनक 298 रन बनाए। इसमें शैफाली वर्मा के नायाब 87, स्मृति मंधाना के 45 और हरमनप्रीत के संयमित 20 रन शामिल थे। दीप्ति शर्मा ने अपने आक्रामक 58 रन व रिचा घोष ने दमदार 34 रन का योगदान कर टीम को मज़बूत स्थिति में ला खड़ा किया।
दक्षिण अफ्रीका ने भी जोरदार शुरुआत की। कप्तान लौरा वूलवार्ड ने 101 रनों की बेहतरीन पारी खेली। लेकिन, जैसे ही दीप्ति शर्मा ने उनका विकेट लिया, मैच का रुख ही पलट गया।
अंतिम ओवरों में भारतीय गेंदबाजों की दृढ़ता देखने लायक थी। मानो हर गेंद देश की इज़्ज़त का सवाल हो। और जब आखिरी विकेट गिरा, मैदान में झंडे लहराने लगे, आंखें नम थीं, पर दिल गर्व से भरा था।
समर्पण की मिसाल दीप्ति
इस जीत की आत्मा अगर किसी को कहा जाए, तो वह दीप्ति शर्मा हैं। न केवल बल्ले व गेंद से, बल्कि पूरे टूर्नामेंट में निरंतर दमदार प्रदर्शन से उन्होंने टीम की पताका को थामे रखा।
लखनऊ की इस खिलाड़ी ने कभी सीमित संसाधनों से शुरुआत की थी। पिता रेलवे में काम करते थे, मैदान तक पहुंचने के लिए रोज़ कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। पर आज वे ‘वर्ल्ड कप विनर’ हैं। दीप्ति की सफलता यह बताती है कि भारतीय बेटियां जब ठान लेती हैं, तो वे सिर्फ रिकॉर्ड नहीं बनातीं, इतिहास बदल कर रख देती हैं।
कप्तान नहीं, प्रेरणा है हरमनप्रीत
हरमनप्रीत की कप्तानी इस पूरे अभियान की रीढ़ रही। उन्होंने आक्रामकता को संयम में पिरोया और टीम को परिवार की तरह जोड़े रखा। मैच के बाद उन्होंने कहा, ‘ये ट्रॉफी सिर्फ हमारी नहीं, उन सभी लड़कियों की है जो गली-मोहल्लों में क्रिकेट खेलते हुए यह सपना देखती हैं।’
उनकी आंखों की चमक में वही संतोष था जो एक लम्बी यात्रा पूरी करने के बाद मिलता है।
उन्होंने साबित कर दिया कि नेतृत्व आदेश देने से नहीं, भरोसा जगाने से बनता है।
महिला क्रिकेट की नई सुबह
यह जीत महिला क्रिकेट के लिए एक नया सूर्योदय है। एक समय था जब महिला मैचों के लिए दर्शक जुटाना मुश्किल होता था। पर अब स्टेडियम भरे रहते हैं, टिकट बिकते हैं, और मैच टीवी पर हॉटस्पॉट बन जाते हैं। महिला आईपीएल की शुरुआत ने खिलाड़ियों को बड़ा मंच दिया, और अब यह वर्ल्ड कप जीत उसी मेहनत का फल है।
अब भारतीय महिला टीम सिर्फ एक खेल टीम नहीं, बल्कि ‘रोल मॉडल’ बन चुकी है।
गांव की लड़कियां अब यह सोचने लगी हैं कि ‘अगर दीप्ति कर सकती है, तो मैं क्यों नहीं?’
मीडिया और समाज का बदलता नजरिया
पहले महिला खिलाड़ियों की खबरें ‘स्पोर्ट्स बुलेटिन’ के आखिरी हिस्से में आती थीं। आज वे मुख्य शीर्षक बन रही हैं। सोशल मीडिया पर #WomenInBlue ट्रेंड कर रहा था। लोग देर रात तक जागकर मैच देख रहे थे और हर चौके-छक्के पर देश गर्व से गूंज रहा था।
यह सिर्फ मीडिया परिवर्तन नहीं, मानसिक परिवर्तन है। भारत का समाज अब बेटियों को ‘प्रतिभा’ नहीं, ‘संभावना’ मानने लगा है।
सफलता की छाया में चुनौतियां भी
हालांकि यह विजय जितनी चमकदार है, उतनी ही जिम्मेदारी भी साथ लाई है।
भारत की फील्डिंग अब भी सुधार चाहती है। कैच छोड़ना कई बार महंगा साबित हो सकता है।
मध्यक्रम की अस्थिरता और विकेटकीपिंग में तकनीकी कमजोरी आने वाले वर्षों की चुनौती हैं। लेकिन अगर यही टीम अपने अनुशासन और आत्मविश्वास को बनाए रखे, तो यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा, यह युग बनेगा।
यह जीत किसकी है
यह जीत उस मां की है जिसने बेटी को गुड़िया के बजाय बल्ला थमाया। यह जीत उस पिता की है जिसने खेत बेचकर किट खरीदी। ये जीत उस कोच की है जिसने मैदान की मिट्टी में सपनों को सींचा। और ये जीत उस समाज की है जिसने आखिरकार अपनी बेटियों को ‘खेल’ नहीं, ‘खिलाड़ी’ मानना शुरू किया। उस पर भरोसा करना शुरू किया।
जब भारतीय खिलाड़ी राष्ट्रगान के दौरान झंडे की ओर देख रहीं थीं, तो वह दृश्य केवल एक समारोह नहीं था, वह इस देश के आत्मविश्वास की झलक थी।
जिम्मेदारी और उम्मीद दोनों
दुनिया अब भारत को ‘चैलेंजर’ नहीं, ‘चैंपियन’ कहेगी और हर टीम उसे हराने की कोशिश करेगी।
इसलिए ज़रूरत है कि बोर्ड और सरकार मिलकर महिला क्रिकेट के बुनियादी ढांचे को और मजबूत करें। ज़िला स्तर तक टूर्नामेंट, आधुनिक प्रशिक्षण, मनोवैज्ञानिक तैयारी भी करें। तभी यह लहर स्थायी बनेगी।
यह जीत सिर्फ मैदान की नहीं, मन की भी है
यह जीत उस सोच की जीत है जो कहती है,
‘हुनर को मंज़िल की नहीं, मौका चाहिए।’
भारत की बेटियों ने रविवार रात यह साबित कर दिया कि सपने सिर्फ देखे नहीं जाते, पूरे भी किए जाते हैं। उन्होंने इतिहास नहीं, भविष्य लिखा है और वह भविष्य अब सिर्फ उनका नहीं, पूरे भारत का है।






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