वह विश्व विजय
दादा ध्यानचंद के सपूत बेटे के इस गोल ने देश को दिलाया पहला विश्व कप। इसके 8 साल बाद वर्ष 1983 में कपिल देव की टीम ने भारत को दिलाया था क्रिकेट का विश्व...

महेन्द्र सिंह लालस
लेखक व कमेन्टेटर
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हॉकी विश्व कप विजय की स्वर्ण जयंती पर उस जीत को याद कर रहे हैं हॉकी के अंतरराष्ट्रीय कॉमेंटेटर और विश्व कप, ओलंपिक, राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों जैसी स्पर्धाओं में भारतीय हॉकी के प्रदर्शन के साक्षी रहे लेखक लालस
50 साल पहले मलेशिया में उठाया था भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने पहला विश्व कप
बरसात रोकने के लिए टोने टोटकों का सहारा शायद कुछ काम आया होगा। ख़ासतौर पर भारत के लिए, जिसने सेमीफाइनल में मेज़बान मलेशिया को शिकस्त दे फाइनल में जगह बनाई। 15 मार्च 1975 को खचाखच भरे मरडेका स्टेडियम में दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वी टीमें आमने- सामने थीं। पहले विश्व कप का विजेता पाकिस्तान और दूसरे विश्व कप का उपविजेता भारत। 17वें मिनट में ज़ाहिद शेख ने गोल कर पाकिस्तान को 1–0 से आगे कर दिया। हाफटाइम में जब दोनों टीमें अपने- अपने खेमों में लौटीं तो दबाव भारत पर था। कोई 70,000 दर्शक थे और उनका शोर पाकिस्तान के ही पक्ष में था। मध्यांतर के बाद नवें मिनट में पिछले विश्व कप के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रहे और दुनिया के सबसे मज़बूत रक्षक कहलाने वाले सुरजीत सिंह ने कॉर्नर से गोल कर भारतीय टीम को बराबरी पर ला खड़ा किया। अब मैच एकतरफा नहीं था और पाकिस्तान को अपने ही देश में बनी ट्रॉफी अपने ही देश में ले जाने के लिए एक गोल की दरकार थी। हमले तो निरंतर होते रहे और लेस्ली फर्नांडीज की जगह भारत का गोल पोस्ट संभाल रहे अशोक दीवान ने ये सारे हमले संभाल लिए। मगर ये दिन भारतीय हॉकी के लिए अपने पसीने को जीत में बदलने के लिए ही बना था शायद। 50 मिनट हो चुके थे। एक बेहतरीन पास अशोक कुमार की स्टिक पर आया और उसने पाकिस्तान की गोल पोस्ट को भेद दिया। दादा ध्यानचंद के सपूत बेटे के इस गोल ने देश को दिलाया पहला विश्व कप। इसके 8 साल बाद वर्ष 1983 में कपिल देव की टीम ने भारत को दिलाया था क्रिकेट का विश्व कप।
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अशोक कुमार विनम्रता से कहते हैं, ‘मुझे लगता है मुझे वो पास नहीं मिलता तो शायद गोल नहीं हो पाता, ये मेरा गोल नहीं था टीम का गोल था।’
कप्तान अजित पाल सिंह जब ये ट्रॉफी लेकर वतन पहुंचे तो देश ने इन खिलाड़ियों को पलक पावड़ो पर बिठा लिया। प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी, राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद तक इस ख़ुशी में शामिल हुए। इन खिलाड़ियों ने फिल्म स्टार्स के साथ मुंबई के खचाखच भरे स्टेडियम में हॉकी भी खेली।
ये भारत की पहली विश्व विजय थी। इसके बाद से भारत अपने दूसरे विश्व कप की तलाश में जुटा है। वर्ष 1975 के बाद भारत ने चार बार विश्व कप हॉकी की मेज़बानी ज़रूर की, लेकिन इनमें एक बार भी हमारी टीम सेमीफाइनल तक नहीं पहुंच पाई। अशोक कुमार बताते हैं, “टर्फ आने के बाद से यकायक हमारा प्रदर्शन गिरता गया और यूरोपीय टीमों का बोलबाला बढ़ता गया।”
विश्व कप विजेता टीम के सदस्य एच.जे.एस. चिमनी कहते हैं, “पिछले दशक से हमने हॉकी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन किया है, लेकिन विश्व कप में पिछले पांच दशकों से उस प्रदर्शन की हमें दरकार है।”
टीम के कोच बलबीर सिंह सीनियर ने जीत के बाद कहा, “बच्चों ने मेरी लाज रख ली। पूरे टूर्नामेंट में हम रंग दे बसंती चोला गीत गाते थे।”
टीम की सेमीफाइनल में मलेशिया के विरूद्ध जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ब्रिगेडियर हरचरण सिंह बताते हैं, “मेरा जर्सी नंबर 15 था और हम 15 मार्च को ही कुआलालंपुर में विश्व कप जीते।
कौन भूल सकता है सब्स्टीट्यूट असलम शेर खान का सेमीफाइनल में वह गोल। असलम कहते हैं, ” शायद वह गोल न आता तो टीम सेमीफाइनल की बाधा पार ही नहीं कर पाती। इस विजय में शायद मेरी भी आहुति लग गई।”
क्रिकेट टीम की 1983 की विजय जैसी ही थी ये विजय
2 मार्च को पूल-बी के अपने पहले मैच में भारत ने इंग्लैंड को 2–1 से हरा कर शुरुआत तो अच्छी की, लेकिन अगला मैच ऑस्ट्रेलिया से 1–1 की बराबरी पर खेला। घाना को 8 मार्च को 8–0 से रौंदा, मगर अर्जेंटीना से अगले ही दिन टीम 2–1 से हार गई। एकमात्र गोल हरचरण सिंह ने ही किया। भारत की इस विश्व विजय पर पुस्तक लिख चुके ए.अरुमुगम कहते हैं, “गनीमत ये रही कि हमने पश्चिम जर्मनी को अच्छे अंतर से हराया और उसको अपने पूल में दूसरे स्थान पर धकेलने में सफल रहे, इस तरह सेमीफाइनल में भी हम पाकिस्तान के सामने नहीं थे।”
पचास साल से बना हुआ है इंतजार
वर्ष 1975 के इस विश्व कप के बाद भारत ने 1982, 2010, 2018 और 2023 में विश्व कप हॉकी का आयोजन तो किया, लेकिन ट्रॉफी पिछले 50 सालों से भारत वापस नहीं लौटी। 1982 और 1994 के विश्व कप में इसके बाद भारत का श्रेष्ठ प्रदर्शन रहा जब टीम पांचवें स्थान पर रही। भारत, जर्मनी, नीदरलैंड्स और स्पेन ही ऐसे देश हैं, जो अब तक हुईं सभी 15 विश्व कप प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं। अगले साल बेल्जियम और नीदरलैंड्स में होने वाले विश्व कप में 16 टीमें हिस्सा लेंगी और सितंबर में राजगिर में तय हो जाएगा कि भारतीय टीम क्वालीफाई कर पाती है या नहीं। पिछले दो ओलिंपिक खेलों के कांस्य पदक और एफ आई एच प्रो लीग में भारत का अच्छा प्रदर्शन उम्मीद तो जगाता है कि टीम पोडियम पर शायद पहुंच जाए।
टीम के मुख्य प्रशिक्षक क्रेग फुल्टन कहते हैं, ” हम अच्छी हॉकी खेल रहे हैं, हमारे पास अच्छा संतुलन है और खिलाड़ियों में कुछ कर गुजरने का माद्दा भी, लेकिन हमारा पहला लक्ष्य है क्वालीफाई करना।” फुल्टन और हरमनप्रीत की टीम अगर यूरोपीय टीमों को उन्हीं के घर में हॉकी के पाठ पढ़ा दे, तो शायद 51 साल बाद ये देश खेलों की शायद सबसे खूबसूरत ट्रॉफियों में से एक विश्व कप हॉकी की ट्रॉफी का दुबारा स्वागत कर पाएगा।
युद्ध के कारण प्रतियोगिता स्पेन में
विश्व कप हॉकी की ट्रॉफी पाकिस्तान में ही बनी थी और वहीं 1971 में पहले विश्व कप का आयोजन होना था, लेकिन भारत और पाकिस्तान के युद्ध की वजह से प्रतियोगिता स्पेन में हुई। एयर मार्शल बशीर मुजीद की डिजाइन की हुई इस ट्रॉफी को पाकिस्तानी सेना ने ही बनाया और जब 1975 का विश्व कप जीतने के बाद इस ट्रॉफी को प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने हाथ में लिया तो उन्हें पाकिस्तान के नक्शे में जम्मू और कश्मीर देख कर ऐतराज हुआ। लेकिन ये ट्रॉफी इसी स्वरूप में आगे बंटती रही। वर्ष 2018 में तत्कालीन विश्व हॉकी संघ (एफआईएच) के अध्यक्ष नरेंद्र ध्रुव बत्रा ने साफ कह दिया था कि अगर इसे सुधारा न गया तो भारतीय सीमा अधिकारी इस ट्रॉफी का भारत में प्रवेश नहीं होने देंगे। लिहाजा एफआईएच ने इस ट्रॉफी में बनी देश की सीमाओं को हटा कर सिर्फ महाद्वीपों की सीमाओं को रखा।






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